३% श्रीपरमात्मने नमः 47

पातञ्जलयोगप्रदीप

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३% श्रीपरमात्मने नम: 047

_पातञ्जलयोगप्रदीप

| त्वमेव माता पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव॥

ग्रन्थकार--

| Fenn श्रीस्वामी ओमानन्द तीर्थ डल |

[47 ] पां० यो० प्र०

प्रथम संस्करणसे पचीस पुनर्मुद्रणतक १,२६,००० सं० २०६३ छब्बीसवाँ पुनर्मुद्रण | ७,५०० योग १,३३,५००

मूल्य--एक सौ रुपये

ISBN 81-293-0011-7

प्रकाशक एवं मुद्रक-गीताप्रेस, गोरखपुर---२७३००५ गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान फोन : (०५५१ ) २३३४७२१; फैक्स : २३३६९९७

website : www.gitapress.org | e-mail: booksales@ gitapress.org

अक्र रळ. म्य लमान ८. पॉ.

पातझलयोगप्रदीप--

परम पूज्यपाद योगिराज श्रीस्वामी सियारामजी महाराज

“मेरा यह लक्ष्य था कि मैं पुरुषों तथा स्त्रियोंमें इस बातकी जागृति करा दूँ कि यदि वे व्यवहारको शुद्ध और आहारको सात्विक बनाकर शरीरको ठीक रखें और विषयोंसे मनको हटाकर अन्तर्मुख करें तो उनको अपने भीतरके खजानेका पता लग सकता है।'

--सियाराम

विषयानुक्रमणिका

चित्र--परम पूज्यपाद योगिराज श्रीस्वामी सियारामजी महाराज द्वितीय संस्करणके प्रकाशकका वक्तव्य १--प्राक्‌ वक्तव्य (१) श्रीमान्‌ डॉ° मङ्गलदेवजी शास्त्री (२) स्वामी श्रीदिव्यानन्दजी महाराज (३) बाबू श्रीगंगाप्रंसादजी (४) म° म० डॉ” गोपीनाथजी कविराज २--अन्थकारका वक्तव्य चित्र---ब्र० स्वामी श्रीओमानन्दतीर्थजी चित्र--पूज्यपाद योगिराज श्री १०८ श्रीयुत स्वामी सोमतीर्थजी महाराज आरीर्वाद--पूज्यपाद स्वामी श्रीसोमतीर्थजी महाराज ३-- भूमिर्का-रूप षड्दर्शन-समन्वय पहला प्रकरण वेद और दर्शन दूसरा प्रकरण पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा अर्थात्‌ मीमांसा और वेदान्तदर्शन “द्रा सुपर्णा सयुजा” मन्त्रके अर्थका द्योतक चित्र तीसरा प्रकरण न्याय और वैरेषिक दर्शन चौथा प्रकरण सांख्य और योगदर्शन रूपकद्वारा योगका चित्रण षड्दुर्रन-सदुपयोग-समन्वय-सूत्र ४--पातञ्जलयोगप्रदीप समाधिपाद कोरासम्बन्धी चित्र ओंकारका भावनामय चित्र साधनपाद उड्डियान तथा नौली-सम्बन्धी चित्र आसनोंके चित्र सूर्यभेदी व्यायामसे सम्बन्धित आसनोंके चित्र षट्चक्रद्योतक चित्र (चतुर्थ प्राणायाम--पाँचवीं विधि)

सूत्र ३२ के विशेष वक्तव्यका परिशिष्ट (ओषधिद्वारा शरीर-शोधन)

विभूतिपाद कैबल्यपांद ५--परिशिष्ट-- परिशिष्ट मूलसूत्र परिशिष्ट वर्णानुक्रमसूत्रसूची परिशिष्ट राब्दानुक्रमणी परिशिष्ट विषय-सूची परिशिष्ट पुस्तक छप जानेके बाद बढ़ाये हुए विषय

न्न्न्न्न्न्न्त् जरर न्न्न्न्न्न्न्त

६८

१२६ ००० १३८ * १३९--५९८ * १३९ ००० १७९ - २१६ - २७५ * ३९२ - ४२८-४३४ - ४३७-४३८ ००० ४५३ ४०७ ०० ४७८ - ५९५५ ०००॥०९९--६२९ ००० CS ०० ६०४ --० ६०९ ०००० ६२२ "` ६३९

3%

द्वितीय संस्करणके प्रकाशकका वक्तव्य

पूज्य श्रीस्वामीजी महाराजने योगके यथार्थ रहस्य तथा स्वरूपको मनुष्यमात्रके हृदयङ्कम करानेके लिये 'पातञ्जलयोगम्रदीष' नामक पुस्तक लिखी थी उसका प्रथम संस्करण अनेक वर्षोसे अप्राप्य हो रहा था। अब उसकी द्वितीयावृत्ति 'आर्य-साहित्य-मण्डल' द्वारा छपकर पाठकोंके सम्मुख प्रस्तुत है। इस बार श्रीस्वामीजी महाराजने इसमें अनेक विषय बढ़ा दिये हैं और योग-सम्बन्धी अनेक चित्रोंका समावेश किया है। इससे ग्रन्थ प्रथम संस्करणकी अपेक्षा लगभग दुगुना हो गया है। इस अन्थमें योगदर्शन, व्यासभाष्य, भोजवृत्ति और कहीं-कहीं योगवार्तिकका भी भाषानुवाद दिया है योगके अनेक रहस्य--योगसम्बन्धी विविध ग्रन्थों और स्वानुभवके आधारपर भली प्रकार खोले हैं, जिससे योगमें नये प्रवेश करनेवाले अनेक भूलोंसे बच जाते हैं श्रीस्वामीजीने इसकी 'षड्दर्शन-समन्वय' नाम्नी भूमिकामें मीमांसा आदि छहों दर्शनोंका समन्वय बड़े सुन्दररूपसे किया है महर्षि दयानन्द सरस्वतीको छोड़कर अर्वाचीन आचार्य तथा विद्वान्‌ छहों दर्शनोंसें परस्पर विरोध मानते हैं, किंतु श्रीस्वामीजी महाराजने प्रबल प्रमाणों तथा युक्तियोंसे यह सिद्ध करनेका प्रयास किया है कि दर्शनोंमें परस्पर विरोध नहीं है श्रीस्वामीजी महाराज इस प्रयासमें पूर्ण सफल हुए हैं तथा कपिल ओर कणाद ऋषिका अनीश्वरवादी होना, मीमांसामें पशु-बलिका निषेध, द्वैत-अद्वेतका भेद, सृष्टि-उत्पत्ति, बन्ध और मोक्ष, वेदान्त-दर्शन अन्य दर्शनोंका खण्डन नहीं करता, सांख्य और योगकी एकता आदि कई विवादास्पद विषयोंका विवेचन स्वामीजी महाराजने बड़े सुन्दर ढंगसे किया है, इसके लिये स्वामीजी महाराज अत्यन्त धन्यवादके पात्र हैं। दर्शनों और उपनिषद्‌ आदिमें समन्वय दिखलाने और योगसम्बन्धी तथा अन्य कई आध्यात्मिक रहस्यपूर्ण विषयोंको साम्प्रदायिक यक्षपातसे रहित होकर अनुभूति, युक्ति, श्रुति तथा आर्षयन्थोके आधारपर खोलते हुए स्वामीजीने आपने स्वतन्त्र विचारोंको प्रकट किया हे अतः इन विचारोंका उत्तरदायित्व श्रीस्वामीजी महाराजपर ही समझना चाहिये कि आर्यसाहित्य-मण्डलपर

पुस्तकको अधिक उपयोगी बनानेके उद्देश्यसे स्वामीजीके आदेशानुसार यथोचित स्थानोमें चित्र भी दिये गये हैं। कुछ आसनोंके चित्र पं० भद्रेसेनजीके यौगिक व्यायाम-संघके ब्लाकोसे लिये गये हे जिनके लिये पं० भद्र्सेनजी मप्डलकी ओरसे धन्यवादके पात्र हैं।

प्रकाशक

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(५)

प्राक्‌ वक्तव्य

[९] श्रीमान्‌ डॉ? मङ्गलदेवजी शास्त्री, एम? ए०, डी० फिल्‌ (ऑक्सन) प्रिंसिपल संस्कृत-कालेज बनारस, सुपरिटेंडेंट आफ संस्कृत स्टडीज यू० पी० तथा रजिस्ट्रार संस्कृत-कालेज-परीक्षा युक्तप्रान्त, वाराणसी

“योग' शब्दका मौलिक अर्थ क्या है ? यह एक विचारणीय प्रश्न है। तो भी इसमें कोई संदेह नहीं कि “योग” का अर्थ वास्तवमें निषेधपरक* होकर विधिपरक ही है। परंतु योगसूत्रमें 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' इस प्रकार योगका जो प्रारम्भिक वर्णन किया है, बह निषेधपरक ही है। इसका कारण प्राथमिक अभ्यासीकी, योगके तात्त्विक स्वरूपको, जो स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते’ के अनुसार स्वयंसंवेद्य ही है, समझनेकी क्षमताका होना ही है।

योगके विषयमें ध्यान रखनेकी दूसरी बात यह है कि वह वास्तवमें एक दर्शन नहीं है वह तो वृत्तियोंके रूपमें फुलझरी-सदूर प्रतिक्षण उपक्षीयमाण जीवनी-शाक्तिको स्वरूपमें स्थि करके अनधभास्वर मणिकी तरह स्वयंप्रकाश आत्माके स्वरूपको 'अनुभव' करनेकी एक विशिष्ट कला हे। इसी कलाका विभिन्न दृष्टियोंसे भगवद्वीतामें “समत्वं योग उच्यते’, “योगः कर्मसु कोशलम' इस प्रकार वर्णन किया है। पर इस कलाका भी दार्शनिक आधार होना चाहिये इसी दृष्टिसे जैसे न्याय (तर्क) का कला होनेपर भी, दर्शनोंमें समावेश किया जाता है, उसी प्रकार योगकी गणना दर्शनोंमें की गयी है।

उपर्युक्त कारणोंसे योगकी ठीक-ठीक व्याख्या केवल शुष्क पाण्डित्यके सहारे नहीं हो सकती अतएव योगसूत्रोंपर अनेकानेक पाण्डित्यपूर्ण टीकाओंके होनेपर भी वास्तविक दृष्ट्या उनका कोई महत्त्व नहीं है इसके विपरीत 'पातञ्जलयोगप्रदीप' का महत्त्व इसीमें है कि इसकी रचना एक ऐसे विशिष्ट व्यक्तिने की है जिन्होंने जीवनकी प्रयोगशालाम्रें इस कलाका अभ्यास किया हे ऐसी व्याख्याके एक-एक शब्दका महत्त्व होना चाहिये ग्रन्थकत्तने अपने अनुभवके आधारपर केवल सूत्रोंकी विशद व्याख्या ही लिखी है, किंतु योगमार्गके यात्रीको जिस-जिस बातके जाननेकी आवश्यकता हो सकती है, उस-उसको बतलानेका प्रयत्न किया है। दार्शनिक जिज्ञासुओंके लिये दार्शनिक समन्वयकी विद्ठत्तापूर्ण व्याख्या भी इस ग्रन्थका एक विशेष महत्त्व है

भारतवर्षमें अत्यन्त प्राचीन कालसे ही योगशास्त्रका विकास हुआ है। इसलिये विभिन्न शास्त्रीय परम्पराओंमें योगविषयक अनेकानेक बहुमूल्य अनुभव और उपयोगी विचार बिखरे पड़े हैं। बिखरे हुए मोती-सटूर इन विचारों और अनुभवोंको भी इस व्याख्यामें वरिवेचनापुरःसर यथास्थान एकत्रित करके ग्रन्थकर्ता महोदयने जिज्ञासुओं और साधकोंका बड़ा उपकार किया है। इस संस्करणमें व्याख्याकरत्ताने इस व्याख्याको सर्वथा सर्वाङ्गपूर्ण बनानेकी चेष्टा की है। इसके लिये हम सबको उनका आभारी होना चाहिये आशा है, जिज्ञासुजन इस संस्करणका पूर्ण सदुपयोग करेंगे

* अर्थात्‌ शून्यवादके सदुश योग निषेधपरक नहीं है, वरं अन्वयव्यतिरेकके साथ नेति-नेतिद्वारा परब्रह्म परमात्मस्वरूपको प्राप्त कराता हे (६)

[२] श्रीस्वामी दिव्यानन्दजी महाराज (पूर्व बा० देवकीनन्दन गुप्त वानप्रस्थी) (संयोजक पातञ्जलयोगप्रदीप-प्रकाशन-प्रबन्ध-परिषद) सन्‌ १९३९ के अप्रैल मासमें स्वर्गीय लाला रघुवरदयालजी मैजिस्ट्रेटकी प्रेरणासे श्रीस्वामी ओमानन्दजी महाराज, स्वर्गीय लाला प्यारेलालजी रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशन जज, ब्रह्मचारी शिवचरणजी नगीनानिवासी और मैं रामगढ़ जिला नैनीताल गये वहाँ हम “श्रीनारायण स्वामी आश्रममें' ठहरे वहाँके शान्त वातावरणमें श्रीस्वामी ओमानन्दजी महाराजने दो बजे अपना मौनव्रत खोलनेके पश्चात्‌ एक घंटा प्रतिदिन योगदर्शनका प्रवचन करना स्वीकार किया प्रवचन समाप्न होनेपर लाला रघुवरदयालजीकी इच्छा हुई कि जनताकी जानकारीके लिये योग-दर्शनके सिद्धान्त बहुत संक्षिप्तरूपमें जनताके समक्ष रखे जायँ अतः उन्होंने एक छोटी-सी पुस्तक लिखी और उस पुस्तकको श्रीस्वामीजी महाराजकी ओरसे छपवानेका विचार प्रकट किया स्वामीजीने कहा कि इससे कुछ लाभ होगा; अच्छा तो यह होगा कि पुस्तक पर्याप्त विस्तृत हो लालाजीके इच्छानुसार स्वाभीजीने एक घंटा प्रतिदिन मौन खोलनेके पश्चात्‌ लिखवाना शुरू कर दिया परंतु ऐसा करनेसे पूर्व पूज्यपाद गुरूदेवजी श्री १०८ स्वामी सोमतीर्थजी महाराजकी स्वीकृति आवश्यक समझी गयी गुरुदेवजी महाराजका उत्तर आया कि भाषाटीकाएँ बहुत हैं, अतः इससे कुछ लाभ होगा यदि टीका विशेष महत्त्वकी हो तो कोई आपत्ति नहीं है। स्वामीजी गुरुदेवजीके आदेशके अनुसार अपने अनुभवके आधारपर प्रतिदिन एक घंटा लिखाते रहे ब्रह्मचारी शिवचरणजी और लाला रघुवरदयालजी लिखते थे लिखनेके पश्चात्‌ दोनों मिलाकर भूलोंको ठीक कर लेते थे कुछ दिनोंके पश्चात्‌ बाबू गंगाप्रसादजी चीफ जस्टिस भी रियासत टिहरीसे रिटायर्ड होकर वहाँ गये पहाड़से नीचे उतरनेपर यह उचित समझा गया कि छपवानेसे पूर्व गुरुजी महाराज पुस्तकको एक बार सुन लें स्वास्थ्य अत्यन्त खराब होनेपर भी गुरुजी महाराज दिनमें अवकाश मिलनेके कारण रातके समय सुनते रहे ओर अनुभवके आधारपर यथा-तथा संशोधन कराते रहे। यह भी उचित समझा गया कि सूत्रोंकी व्याख्या व्यासभाष्यके आधारपर की जाय और जनताके लाभके लिये जहाँ आवश्यक हो भोजवृत्ति, विज्ञानभिक्षके योगवार्त्तिंक तथा वाचस्पति मिश्रकी टीका भी दी जाय। कुछ मित्रोंके अनुरोध करनेपर हिप्रोटिज्म (1901101151) , मेसमेरिज्म (१/1८51116115111) आदि एवं, उत्तरायण, दक्षिणायन आदिकी यथास्थान व्याख्या भी कर दी गयी और हठयोगकी षद्‌ क्रियाएँ तथा प्राणायाम, आसन, मुद्रा आदिका विस्तारसे वर्णन कर दिया गया, जिससे पाठकोंको दूसरी पुस्तकोंका सहारा ढूँढ़ना पड़े। प्रत्येक पादके अन्तमें उपसंहारके रूपमें यह बतला दिया गया कि उसमें क्या-क्या विषय है। स्वामीजी महाराजको बहुत-सी अनुभूत ओषधियाँ साधुओं, महात्माओंसे प्राप्त हुई थीं तथा उन्होने स्वयं अनुभव किया था और कराया था। साधकोंके हितार्थ कुछ मित्रोंके आग्रहसे उनको भी यथास्थान प्रकाशित करा देना आवश्यक समझा गया पुस्तकके प्रकाशनका कार्य एक प्रकाशन-प्रबन्ध-परिषदके अधीन कर दिया गया, जिसके निम्नलिखित सभासद्‌ थे-- १-श्री १०८ स्वामी सोमतीर्थजी महाराज २-श्रीस्वामी ओमानन्दजी तीर्थ ३-रायबहादुर श्रीगंगाप्रसादजी एम्‌» ए० रिटायर्ड चीफ जस्टिस टिहरी गढ़वाल ४-श्री बाः प्यारेलालजी रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशन जज (स्वर्गीय) ५-श्री ला” रघुवरदयालजी रिटायर्ड मैजिस्ट्रेट (स्वर्गीय) (७)

६-श्री ला” हरप्रसादजी एम्‌ ए०, एलू-एल्‌र बीर, दिल्ली

७-श्री मास्टर बाबूप्रसादजी कोषाध्यक्ष, सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, अजमेर

८-श्री बा? जगदीशप्रसादजी एम्‌? ए०, सम्पादक प्रदीपप्रेस, मुरादाबाद

९-श्री बा० देवकीनन्दनजी गुप्त वानप्रस्थी (वर्तमान स्वामी श्रीदिव्यानन्दजी )

श्री लार प्यारेलालजी तथा लाः रघुवरदयालजीने पुस्तकके प्रकाशनार्थ सौ-सौ रुपये प्रदान किये पुस्तकको अङ्कोंके रूपमें छपवाना आरम्भ किया गया किंतु कुछ अङ्कोंके निकल जानेके पश्चात्‌ बड़ी कठिनाईका सामना करना पड़ा कुछ मित्रोंने सलाह दी कि कार्यको बंद कर दिया जाय, परंतु स्वामीजीको यह असह्य था कि कुछ ग्राहकोंसे पूरी पुस्तकके दाम लेकर उन्हें थोड़े-से अङ्क दिये जायँ कुछ मित्रोंकी सहायतासे ऋण लेकर कार्य पूरा हो पाया परंतु प्रेसके ऋणसे सर्वथा मुक्त करवानेका श्रेय श्री ला» ब्रजलालजी Inspector of schools 19. A. ७. €0116£€ विभागको है।

पुराने पुस्तक-विक्रेताओंका अनुमान था कि पहला संस्करण निकलनेमें ८-१० वर्ष लग जायँगे, परंतु जनताने इसे इतना पसंद किया कि लगभग एक वर्षमें ही सब प्रतियाँ समाप्त हो गयीं और माँगको देखते हुए दूसरे संस्करणका निकालना अनिवार्य हो गया किंतु युद्धके कारण कागजके मिलनेसे यह कार्य स्थगित करना पडा स्वामीजी महाराजने इस अवसरका लाभ उठाते हुए पुस्तकमें कई स्थानोंपर अधिक विस्तारसे व्याख्या कर दी है ओर कुछ चित्र भी दे दिये हें विशेष वक्तव्य और विशेष विचार उनके अपने अनुभवके आधारपर हैं, जिनसे पाठकोंको विशेषरूपसे लाभ उठाना चाहिये

हम उन सब महानुभावोंके अत्यन्त आभारी हें, जिन्होंने इस पुस्तकके प्रकाशनमें हमारी सहायता की हे

= शर तला [३] श्री बा? गंगाप्रसादजी एम्‌? ए०, एम? आर? ए० एस्‌? (रायबहादुर) , रिटायर्ड चीफ जस्टिस, टिहरी गढ़बालराज्य, भूतपूर्व प्रधान सार्वदेशिक आर्य-प्रतिनिधि-सभा

श्रीस्वामी ओमानन्दतीर्थकृत पातञ्जलयोगप्रदीप भाष्यके पहले संस्करणका जनताने अच्छा मान किया पहला संस्करण भी एक प्रकारसे सर्वाङ्गपूर्ण था श्रीस्वामीजीने दूसरे संस्करणमें कई विषय बढ़ा दिये हें योगसम्बन्धी शायद ही कोई विषय हो, जो ग्रन्थके भीतर गया हो षड्दर्शन-समन्वयका विषय परि- बरद्धित करके बहुत स्पष्ट कर दिया है। आशा है कि योग-साधनके इच्छुक और साधक ग्रन्थसे बहुत लाभ उठायेंगे

2 [४] (महामहोपाध्याय डॉ० गोपीनाथजी कविराज, एम? ए०, डी? लिद०, वाराणसी)

श्रद्धेय श्रीओमानन्द स्वामीजीकृत पातञ्जलयोगप्रदीप नामक (द्वितीय संस्करण) ग्रन्थ देखकर प्रसन्नता हुई इस ग्रन्थमें पातञ्जल्योगसूत्रोंका भावार्थ व्यास-भाष्य, तत्त्व-वैशारदी, भोजवृत्ति तथा योग-वार्तिकके अनुसार विस्तृत रूपसे हिंदीमें संकलित किया गया है। योग-मार्गके साधकोंके लिये उपयोगी बहुत-से विषय चित्रादिकोंके साथ इसमें संनिविष्ट हुए हैं। इसमें उपनिषद्‌ और भारतीय दर्शनोंके विभिन्न तत्त्वोंका आलोचन भी प्रासंगिक रूपमें निपुणताके साथ किया गया है। इसकी भाषा सरल तथा सुगम है और _ व्याख्याकारकी तत्त्वविङलेषण-प्रणाली भी अत्यन्त चित्ताकर्षक है। ग्रन्थारम्भसे पहले ग्रन्थकारका लिखा हुआ षड्दर्शन-समन्वय भी इसमें विस्तृत भूमिका-रूपमें दिया गया है इससे ग्रन्थकी उपयोगिता और भी बढ़ गयी है इस पुस्तकमें कुछ अनुभूत ओषधियोंका विवरण भी दे दिया गया है। आशा है, योग-तत्त्व- जिज्ञासु, ज्ञानिसमाज तथा विद्वदगोष्ठीमें इस ग्रन्थका समुचित आदर तथा बहुल प्रचार होगा

ब्र० स्वामी श्रीओमानन्दतीर्थजी

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जन (चतुर्थ संस्करणके सम्बन्धमें )

अन्थकारका वक्तव्य पातञ्जल्योगप्रदीपका यह चौथा संस्करण पाठकोंके समक्ष रहा है प्रथम संस्करणकी छपाईंका कार्य सन्‌ १९४९ में बिना किसी साधन और सामग्रीके अङ्कोके रूपमें निकालना आरम्भ किया गया था बीच-बीचमें कई घ्रकारकी कठिनाइयाँ उपस्थित होती रहीं वे सब जिस परम गुरु परमेश्वरकी प्रेरणासे और जिसके समर्पणरूपमें यह कार्य किया गया था, उसीकी अपार और अद्भुत शक्तिद्वारा दूर होती रहीं और अन्तमें मार्च १९४२ को यह पुस्तकरूपमें तैयार हो ही गयी इसके प्रकाशन-प्रबन्ध-परिषदके सदस्योंको प्रेस तथा अन्य सज्जनोंके ऋण चुकानेके सम्बन्धमें अत्यन्त चिन्ता थी, पर एक वर्षके अंदर ही पुस्तककी इतनी माँग बढी कि केवछ उस ऋणका ही निबटारा हो गया प्रत्युत लगभग सारी पुस्तकें समाप्त हो गयीं और सन्‌ १९४३ में ही दूसरी आवृत्ति निकालनेकी आवश्यकता प्रतीत होने लगी उस भयंकर युद्धके समयमें इतने बड़े धार्मिक अन्थका बिना किसी बाह्य सहायताके निकालना असम्भव था सन्‌ १९४६ में युद्धकी समाप्तिपर ऐसा प्रयत्न किया गया कि धार्मिक ग्रन्थ छपवानेके लिये जो दानियोंके कई ट्रस्ट हैं, उनमेंसे कोई इसको छपवाकर कम-से-कम मूल्यपर जनतातक पहुँचा दे, अथवा किसी ऐसे दानी. महानुभावकी सहायतासे जो अपने रुपयोंको इस प्रकारके आध्यात्मिक कार्योमें लगाना चाहते हैं थोड़े दामोंमें पाठकोंतक पहुँच सके इसमें सफलता प्राप्त होनेपर दूसरे संस्करणको ““आर्यसाहित्य-मण्डल, अजमेर'' कोः जो इस प्रकारके धार्मिक ग्रन्थ छापनेमें सराहनीय कार्य कर रहा है; इस विश्वासपर सौंप दिया गया कि वह इसको अधिक-से-अधिक उपयोगी और सुन्दर बनाते हुए कम-से-कम दामोंमें सर्वसाधारणके हाथोंमें पहुँचानेका यत्न करेगा। तीसरा संस्करण गीताप्रेस, गोरखपुरद्वारा उत्तम-से-उत्तम रूपमें और कम-से-कम दामोंमें गत अगस्त १९५९ ई० में ५००० की संख्यामें प्रकाशित हुआ था किंतु पुस्तककी माँग इतनी अधिक हुई कि प्रकाशकको जनवरी १९६० ई° के आरम्भमें ही चोथा संस्करण निकाळनेकी आवश्यकता प्रतीत होने लगी नये संस्करणके मुद्रणका कार्य प्रारम्भ कर दिया गया परन्तु अनेक कठिनाइयोंके कारण छपाई शीघ्र हो सकी इस चतुर्थ संस्करणमें कई स्थलोंपर विषयको अधिक स्पष्ट करनेके उद्देश्यसे परिवर्द्धन किया गया है। आशा है पाठकगण इससे अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त कर सकेंगे

षड्दर्शनसमन्वय--योगके दार्शनिक स्वरूपको समझनेके लिये तो दर्शनोंका ज्ञान आवश्यक है ही; ' किंतु दर्शनोंका यथार्थ ज्ञान भी योगद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, इसके बिना उसको बोध करानेवाले बाह्य स्थूल शब्द आदि बुद्धिके केवल व्यायामरूप साधन ही रहते हैं प्राचीन विशाल हृदय व्यापक दृष्टिवाले ऋषि समत्व (समन्वय) बुद्धिसे युक्त होते थे। यथा--वेदोंके कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्डमें जो विरोध प्रतीत - होने लगा था, उसीके अविरोधकी स्थापना और समन्वय-साधनके उद्देयसे श्रीजैमिनिजीने पूर्वमीमांसा और श्रीव्यासजीने उत्तरमीमांसाकी रचना की थी, किंतु कई नवीन संकीर्ण विचारवाले व्यक्ति नाना प्रकारके भेद-भाव उत्पन्न करके हिंदुओंके व्यक्तिगत, सामाजिक, धार्मिक और राष्ट्रीय अवनति और पतनका कारण

हुए हैं, वे ही प्राचीन ऋषियोंके भाष्योंमें भी परस्पर भेद और विरोधका विष फैला गये हैं। आधुनिक कालमें महर्षि दयानन्दने सबसे प्रथम इस त्रुटिका अनुभव किया और दर्शानोंके अविरोध तथा समन्वय-साधनपर पूरा जोर दिया, किंतु उनके पश्चात्‌ इस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया गया न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग--इन चारों दर्शनोंका मुख्य उद्देश्य प्रकृतिके सर्वथा परित्यागपूर्वक शुद्ध अर्थात्‌ परब्रह्मको प्राप्त करना है, कि अपर ब्रह्म अर्थात्‌ ईश्वरके खण्डनमें जैसा कि सामान्यतया उनपर दोष आरोपित किया गया है। सांख्य और योग ही दो प्राचीन निष्ठाएँ हैं और वास्तवमें यही प्राचीन वेदान्त (फिलासफी) है, जिसका श्रुतियों (उपनिषदों) और स्मृतियोंमें स्थान-स्थानपर वर्णन

(१०)

पाया जाता है। गीता तो सांख्ययोगका ही मुख्य ग्रन्थ है सांख्य और योगके आभ्यन्तर रूपके अतिरिक्त कार्यक्षेत्रमें उनका बाह्य व्यावहारिक रूप कैसा होना चाहिये, इस बातको गीतामें विशेषताके साथ स्पष्ट शाब्दोंमें दर्शाया है। उदाहरणार्थ, जहाँ ईश्वर-समर्पणद्वारा निष्काम कर्मयोग बतलाया गया है, वहाँ योगकी निष्ठा है और जहाँ “गुण ही गुणोंमें वर्त रहे हैं, आत्मा अकर्त्ता है”! इस भावनाद्वारा ज्ञानयोग बतलाया गया है, वह सांख्यनिष्ठा है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ 'अन्यादेश' अर्थात्‌ प्रथम पुरुष ओर मध्यम पुरुषद्वारा परमात्माकी उपासना बतलायी गयी है, वह योगकी निष्ठा है और जहाँ 'अहङ्कारादेश' और 'आत्मादेश' अर्थात्‌ उत्तम पुरुष और आत्माद्वारा परमात्माका बोध कराया गया है वह सांख्यनिष्ठा है, इत्यादि जैन और बौद्ध भारतवर्षके दो प्रसिद्ध धर्मोके प्रवर्तक आचार्य उच्चकोटिके अनुभवी योगी हुए हैं। सांख्ययोगके सदृश इनका ध्येय भी असम्प्रज्ञात समाधि अर्थात्‌ शुद्ध परब्रह्म परमात्माकी ही प्राप्ति है। बाह्य स्थूल शब्दोंके भ्रमजालमें फँसकर इनके वास्तविक स्वरूपको समझनेमें भी बहुत धोखा खाया गया है ये भी एक प्रकारसे हमारे दर्शन-समन्वयके अन्तर्गत हो सकते हैं अर्थात्‌ जैसे जलके सर्वत्र पृथ्वीमें व्यापक होते हुए भी पृथ्वीसे पृथक्‌ उसके शुद्ध स्वरूपसे ही पिपासाकी तृप्ति हो सकती है, इसी प्रकार चेतन तत्त्वके सर्वत्र व्यापक होते हुए भी उनका लक्ष्य उसके शुद्ध स्वरूप परमात्मा--परब्रह्मको प्राप्त करना है। इससे उसके शबल-स्वरूप अपर ब्रह्म--ईश्वरका निराकरण समझना चाहिये, प्रत्युत उन्होंने भी किसी रूपमें इस लक्ष्यकी प्राप्तिमें उसके अपर स्वरूपका ही सहारा लिया है योग, किसी स्थान-विशेषपर जिसको देश कहा गया है (देशबन्धश्चित्तस्य धारणा), अपर ब्रह्म ईश्वरका सहारा लेकर (ईश्वरप्रणिधानाद्वा) त्रिगुणात्मक स्थूलभूत, तन्मात्रोंतक सूक्ष्मभूत, अहङ्कार ओर चित्तके आवरणोंको क्रमशः वितर्क, विचार, आनन्द ओर अस्मितानुगत समाधिद्ठारा हटाता हुआ विवेकख्यातिट्ठारा गुणोंको सर्वथा पृथक्‌ करके असम्प्रज्ञात समाधिमें शुद्ध परब्रह्म परमात्म-स्वरूपमें अवस्थिति कराता है इस सूक्ष्मदृष्टिसे उनके मन्तव्य ओर साधनोंमें भी अधिक अन्तर नहीं प्रतीत होगा , योगमार्गमें प्रवेशासे पूर्व संकीर्ण विचारोंके कूपमण्डूक रहकर अभ्यासीगण हदयकी विशाळताकी. दृष्टिसे यह देख सकें कि किस प्रकार वैदिक दर्शनरूपी नदियाँ विश्वरचयिता पिताके अनन्त ज्ञानके अथाह सागरमें समावेश करती हैं, इस उद्देश्यसे षडदर्शन-समन्वयकी 'पातञ्जलयोगप्रदीप'का भूमिका-रूप बनाया गया है। अखिल भारतवर्षीय आर्यकुमार-परीक्षा-परिषदने 'षड्दर्शन-समन्वय'को अपनी सिद्धान्त-शास्त्रकी परीक्षामें रख लिया अतः उनके आग्रहसे षडदर्शनसमन्वयको पृथक्‌ पुस्तकरूपमें शाहपुरा-दर्बार स्वर्गीय श्रीराजा उम्मेदसिंहजीने छपवा दिया है। प्रथम संस्करणकी अपेक्षा दूसरे संस्करणमें षडदर्शन-समन्वय द्विगुणित हो गया है; क्योंकि दर्शनोंके ` वास्तविक स्वरूपको विस्तारके साथ दिखलाने तथा नाना प्रकारकी प्रचलित शङ्काओंके संतोषजनक समाधान करनेका इसमें पूरा यत्न किया गया है। पातञ्जलयोगप्रदीप--कई योगके प्रेमी सज्जनोंका विशेषकर प्रोफेसर विश्वनाथजी विद्यालङ्कार भूतपूर्व उप-आचार्य गुरुकुल काँगड़ीका आग्रह था कि सूत्रोंक भावों तथा कहीं-कहीं व्यासभाष्यको भी अधिक-से-अधिक खोलनेका यत्न किया जाय। सूत्रोंकी व्याख्यामें विशेषरूपसे व्यासभाष्य और भोजवृत्तिको जिनका उचित स्थानोंमें टिप्पणीके रूपमें भाषार्थ भी उद्धृत किया गया है तथा सामान्य-रूपसे विज्ञानभिक्षुके योगवार्त्तिंक (जिसके बहुत-से सूत्रोंका जहाँ आवश्यकता प्रतीत हुई है टिप्पणीमें भी भाषार्थ दे दिया गया है), वाचस्पति मिश्रके तत्त्ववैशारदी तथा और बहुत-से प्राचीन और नवीन भाष्योंको दृष्टिगोचर रखा गया है। विशेष विचार ओर विशेष वक्तव्यमें अपने स्वतन्त्र विचारोंको लेते हुए प्रसङ्गप्राप्त बहुत-से दार्शनिक और योग-सम्बन्धी विषयों तथा उपनिषदोंके रहस्योंको खोलनेका यत्न किया गया है। योगदर्शनके दो उच्चकोटिके भाष्यकार विज्ञानभिक्षु और वाचस्पति मिश्रके भाष्योंमें जहाँ कहीं परस्पर विरोध और अर्थोमें अयुक्ति प्रतीत हुई है, उसका भी युक्ति ओर प्रमाणसहित स्पष्टीकरण आवश्यक समझा गया है। यथा, स? पाः सूत्र सूत्र १९ और सूत्र ४६ का विर व०, सा? पार सूत्र का विर व°। (११)

साधारण मनुष्य स्थूल शरीरद्वारा कोई विचित्र क्रिया तथा भौतिक जगतसे सम्बन्ध रखनेवाले आश्चर्यजनक चमत्कार अथवा बाह्य व्यवहारसे सम्बन्धित सिद्धि और विभूति आदिको ही योगका गौरव समझते है, उनका यह बाह्य-दृष्टि हटाकर यह निर्देश करानेके उद्देश्यसे कि योगका वास्तविक स्वरूप अन्तर्मुख होना है, समाधिपाद सूत्र १८ के वि० वः में योगकी चार भूमियों--वितर्क, विचार, आनन्द अस्मिता तथा विवेक-ख्याति, पर-वैराग्य, असम्प्रज्ञात-समाधि ओर कैवल्य तथा उनके अन्तर्गत चन्द्रलोक (सूक्ष्मलोक) , आदित्यलोक (कारणजगत) , क्रममुक्ति, सद्योमुक्ति और अवतार आदिका भी वर्णन आवश्यक समझा गया है।

समाधिपाद सूत्र ३४ के विः वः में सूक्ष्म प्राणोंके वर्णनके साथ-साथ सूक्ष्म नाड़ियों, स्वरों, तत्त्वों, चक्रों और कुण्डलिनी शक्तिका भी दिग्दर्शन करा देना आवश्यक था चक्रोंके सम्बन्धमें बहुत-सी ऐसी बातें, जिनका राजयोगसे कोई सम्बन्ध नहीं है और काल्पनिक हैं, केवल तान्त्रिक विचारोंकी जानकारीके उद्देश्यसे लिखी गयी हें तान्त्रिक ग्रन्थ और तान्त्रिक सम्प्रदायोंके सम्बन्धमें हम किसी प्रकारकी विवेचना करना उचित नहीं समझते निःसन्देह इनमेंसे कई एककी तो पञ्चमकारके सम्बन्धमें बड़ी उच्च आध्यात्मिक धारणा है; यथा--' 'पुण्यापुण्य पशुको ज्ञानखड़से मारकर पर-तत्त्वमें चित्तलयका नाम 'मांस' भक्षण है, इन्द्रियोंका मनसे निरोध कर आत्मामें संयोजन करना 'मत्स्य' भोजन है कुण्डलिनी शक्तिको जाग्रत्‌ कर सहस्रदल स्थित शिवके साथ सोमरसके उत्पादनका नाम “भैथुन' हे इत्यादि''

हिंदुओंमें वैष्णव, शैव ओर शाक्त--तीन प्रकारके तान्त्रिक ग्रन्थ तथा वैष्णव, शैव और ज्ञाक्त--तीन प्रकारके तान्त्रिक सम्प्रदाय हैं तथा उनके अन्तर्गत और बहुत-से अवान्तर भेद हैं। जैन और बौद्धोंमें भी बहुत-से तान्त्रिक ग्रन्थ और तान्त्रिक सम्प्रदाय हैं। इनके अतिरिक्त और बहुत-से स्वतन्त्र तान्त्रिक सम्प्रदाय और पद्धतियाँ प्रचलित हैं। लगभग सभी तान्त्रिक सम्प्रदाय शुद्ध परब्रह्म परमात्मस्वरूपमें अवस्थितिकी अपेक्षा प्राकृतिक शाक्तियोंकी प्राप्तिमें विशेष प्रवृत्ति रखते हैं। राजयोगके अध्यात्म-उन्नति चाहनेवाले साधकोंके लिये उनकी केवल उन्हीं बातोंको ग्रहण करना चाहिये, जो उनके अपने मुख्य उद्देश्यमें सहायक हो सकें

साधनपाद सूत्र ३० की व्याख्यामें जहाँ हमने योगियों तथा साधारण मनुष्योंके लिये व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा अन्ताराष्ट्रिय सम्बन्धसे अहिंसा, सत्य आदि यमोंका आदर्श बतलाया है, वहाँ सूत्र ३१ के विशेष वक्तव्यमें राष्ट्रपतियोंके लिये जिनके ऊपर सारे राष्ट्र तथा मनुष्यसमाजका उत्तरदायित्व होता है, उनके लिये इसका क्या स्वरूप होना चाहिये, इसको महाभारत आदिके कई उदाहरणोंके साथ दर्शाया है तथा श्रीकृष्णजी महाराजने रा्ट्रके रक्षणार्थ कर्णपर्वमें जो सूक्ष्मदृष्टिका उपदेश दिया है, उसको भी उद्धृत कर दिया है।

साधनपाद सूत्र १७, २६, २९ की टिप्पणियोंमें वैदिक दर्शनोंके चार प्रतिपाद्य विषयोंका बोद्धदर्शनके _ चार आर्य सत्योंके साथ, योगदर्शनके अष्टाङ्गयोगका बोद्ध-दर्शनके अष्टाङ्गिक मार्गके साथ तथा योगके पाँच यमोंका बौद्धदर्शनके पञ्चशीलके साथ समन्वय दिखलाते हुए बौद्धधर्मके इन विषयोंपर यथोचित प्रकाश डाला गया है तथा जैनधर्ममें जो पाँच यमोंका पाँच महात्रतोंके नामसे जैनधर्मका आधाररिलारूप माना है उनको भी इन्हींकी प्राकृत भाषामें अर्थसहित दिखला दिया गया है।

आध्यात्मिक विषयसे भौतिक शरीरका क्या सम्बन्ध है ऐसे विचार योगमार्गमें कोई स्थान नहीं रख सकते आध्यात्मिक उन्नतिमें शरीर ही सबसे प्रथम और मुख्य साधन है बिना स्वस्थ, स्वच्छ और निर्मल शरीरके योगमार्गकी प्रथम सीढ़ीपर भी पग धरना दुर्गम है। अतः शरीरके स्वच्छ, शुद्ध, निर्मल और नीरोग रखनेके चार उपाय सा" पार सूत्र ३२ के विर क” में विस्तारपूर्वक बतलाये हें- (१) हठयोगकी षट्‌ क्रियाएँ, (२) प्राकृतिक चिकित्सा, (३) सम्मोहन और संकल्प-शक्ति। उपर्युक्त तीनों साधन तभीतक काम दे सकते हैं जबतक कि शरीर और मन इनके करनेके योग्य स्वस्थ अवस्थामें हों किंतु किसी ऐसी व्याधि आदि पीड़ाकी उपस्थितिमें, जब शारीरिक अथवा मानसिक राक्तियाँ इन क्रियाओंके करनेमें सर्वथा असमर्थ हो जाये, तब ओषधियोंका ही सहारा लेना पड़ता है। इस मार्गमें प्रवेश करनेवाले लगभग ९०

(१२)

प्रतिशत किसी-न-किसी प्रकारकी व्याधि लिये हुए शरीरसे अस्वस्थ अवस्थामे ही देखे जाते हैं, उनके

ल्यि सबसे प्रथम कार्य उन व्याधियोंको निवृत्त अथवा शिथिल करना होता है प्राचीन समयमें जंगलों ओर पहाड़ोंमें रहनेवाले योगीजनोंके लिये वहाँसे प्राप्त होनेवाली जडी-बूटी आदिका ज्ञान रखना आवश्यक होता था, जिससे आवश्यकतानुसार उनको काममें लाया जाता था। किंतु इस समय तो ऐसे स्थान आसानीसे उपयुक्त हो सकते हैं और वहाँकी कठिनाइयोंको सहन करनेके योग्य शरीर रहे हैं। आधुनिक कालमें ओषधियोंमें भी नाना प्रकारके अन्वेषण किये गये हैं और उत्तम-से-उत्तम ओषधियाँ हर स्थानपर उपलब्ध हो सकती हैं, इसलिये हमने ऐसी ओषधियोंको, जिनको हमने अनुभवी संन्यासियों, महात्माओं, डाक्टरों और वैद्योंसे प्राप्त किया है तथा जिनको हमने स्वयं अनुभव किया है अथवा कराया है, उपायरूप (४) में लेखबद्ध कर दिया है। जिससे साधक अथवा पथदर्शक किसी योग्य बैद्य तथा डाक्टरकी अनुयस्थितिमें आवश्यकतानुसार काममें ला सके रोग तथा व्याधि एक प्रकारसे पापरूप है और ओषधि प्रायश्चित्तरूप; पूर्ण सावधानीपूर्वक यत्न होना चाहिये कि यह पाप निकट सके, किंतु उसकी उपस्थितिमें प्रायश्चित्तरूप ओषधिसे बचनेके लिये नाना प्रकारकी युक्तियोंको ढूँढ़ना बुद्धिमत्ता नहीं है। इन चार उपायोंमेंसे ओषधियोंको साधनपादके अन्तमें परिशिष्ट भागमें दे दिया गया है। सा? पा? सूत्र ४० की व्याख्यामें जहाँ हमने ध्यानपर बैठनेके लिये कई उपयोगी आसनों और नियमोंका वर्णन किया है, वहाँ विशेष वक्तव्यमें ध्यानके उपयोगी स्थान आदिको बतलाकर सब प्रकारके बन्धों, मुद्राओं और आसनों तथा गुफामें लंबे समयतक बैठनेके नियमों आदिका वर्णन कर देना भी उचित समझा है; क्योंकि इनकी केवल शरीरको स्वस्थ और नीरोग रखनेमें उपयोगिता है वरं वे नाडीशोधन और प्राणके उत्थानमें भी अत्यन्त सहायक होते हैं। सा? पा" सूत्र ४९ की व्याख्यामें प्राणायामका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके पश्चात्‌ उसके विशेष वक्तव्यमें हठयोगकी पुस्तकोके आठों प्रकारके प्राणायाम तथा उनके अन्तर्गत और बहुत-सी प्राणायामकी विधियोंको भी दिखलाया गया है। सिद्धियो, विभूतियों और चमत्कारों आदिके सम्बन्धमें प्रचलित अन्धविश्वास और भ्रान्त ज्ञान हटानेके उद्देश्यसे विश पार सूत्र के विशेष वक्तव्यमें संयमके वास्तविक स्वरूप तथा उसके सदुपयोग और दुरुपयोगपर पूरी विवेचना की गयी है। विभूतिपाद सूत्र २६ के पिछले संस्करणमें टिप्पणीमें व्यासभाष्यका केवल शब्दार्थ ही दिया गया था, उसके सम्बन्धमें अपने विचारोंको सुरक्षित रखा गया था कई महानुभावोंके आग्रहसे नये संस्करणमें उसका स्पष्टीकरण कर दिया गया है। विभ्ूतिपाद सूत्र ३९ में उत्क्रान्ति शब्दको लेते हुए विशेष वक्तव्यमें देवयान, पितृयान, क्रममुक्ति, सद्योमुक्ति, अवतार आदि गूढ़ विषयोंके स्पष्टीकरणकी आवश्यकता समझी गयी है। कैवल्यपाद सूत्र ३४ के भोजवृत्तिमें योगके साथ सब दर्शनोंका समन्वय दिखलाया गया है किसीको उसके द्वारा अन्य दर्शनोंके खण्डनकी शङ्का होने पावे, इस हेतु उसका स्पष्टीकरण भी उचित समझा गया है सूत्रोंके विशेष विचार और विशेष वक्तव्य अवश्य पढ़ने चाहिये, उनमें पाठकगण बहुत-सी उपयोगी और जानने योग्य बातोंको पायेंगे सूत्रोंकी व्याख्यामें व्यासभाष्य, भोजवृत्ति और योगवार्त्तिक आदिकी सभी मुख्य बातें गयी हैं। टिप्पणियोंमें उनका भाषानुवाद केवल विशेष जानकारीके उद्देश्यसे किया गया है। योगवार्त्तिंक जो किंचित्‌ बड़ा और गूढ़ विषयक है केवल उच्च श्रेणियोंके पाठकोंके लिये है। इन टिप्पणियोंको यदि चाहें तो स्वेच्छानुसार छोड़ सकते हैं। बहुत-सी उपयोगी आवश्यक और जाननेयोग्य बातोंके बढ़ा देनेसे वर्तमान ग्रन्थ प्रथम संस्करणकी अपेक्षा लगभग दुगुना हो गया है इस प्रकार जहाँ इस पातञ्जलयोगप्रदीपमें लगभग सभी आवश्यक विषयोंका संकलन किया गया है और केवल इस एक पुस्तकको रखते हुए अन्य बहुत-सी पुस्तकोंकी आवश्यकता नहीं रहती है, वहाँ बहुत-से सत्संगियों तथा अन्य कई प्रेमी सजनोंके विचारोंको दृष्टिमे रखते हुए दैनिक पाठके लिये ''सांख्य-तत्त्व- (१३)

समास तथा योगदर्शनके अर्थसहित सूत्र गुटकारूपमें “सांख्ययोगसार'' नामसे अलग छपवा दिये गये हे

सारा ही मनुष्य-जीवन योगके अन्तर्गत है इसलिये मनुष्य-जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाले सारे विषयोको यथोचित स्थानमें दर्शाया गया है मनुष्योंकी प्रकृतियाँ ओर रुचियाँ भिन्न-भिन्न हैं। यह असम्भव है कि सारी बातें सब मनुष्योंको संतुष्ट कर सके अतः पाठक महानुभावोंसे निवेदन है कि नाना प्रकारके विचाररूपी पुष्पोंकी इस अन्थरूपी वाटिकामेंसे अपने रुचिकर पुष्पोंकी सुगन्धको ग्रहण कर लें। जो उनके दृष्टिकोणसे अनावश्यक अथवा दोषयुक्त प्रतीत हों, उनके प्रति उपेक्षावृत्ति-द्वारा अपने उदार भावोंका परिचय दें।

सारे ही विषयोंको स्वतन्त्र विचारोंके साथ युक्ति, अनुभूति और श्रुतिके आधारपर निष्पक्षभावसे उनके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म रूपमें दर्शनेका यत्न किया गया है। आशा है पाठकगण साम्प्रदायिक पक्षपात तथा मत-मतान्तरोंकी संकीर्णताकी क्षुद्रतासे परे होकर हृदयकी विशालतामें प्रत्येक विषयपर अपनी स्वच्छ, निर्मल और सात्त्विक बुद्धिसे विवेकपूर्ण विचार करके वास्तविक लाभ उठायेंगे

कुछ बातोंको कई प्रकरणोंमें उदधृत किया गया है। इसको पुनरुक्ति दोष नहीं समझना चाहिये महत्त्वपूर्ण ओर गहन विषयोंको पाठकोंको हृदयङ्गम करानेके लिये ऐसा किया गया है जैसी कि धार्मिक ग्रन्थोंकी शैली चली रही है।

जो महानुभाव इस ग्रन्थमें किसी प्रकारकी त्रुटियों ओर भूलोके बतलाने, किसी स्थानपर न्यूनाधिक वा परिवर्तन करने अथवा अपने विशेष विचारोंके प्रकट करनेकी कृपा करेंगे, उनका बड़े आदर, सम्मान और धन्यवादके साथ स्वागत किया जायगा तथा इसके अगले संस्करणमें उनके सम्बन्धमें पूरा विचार किया जायगा

पाठकोंके सुभीतेके लिये ग्रन्थके अन्तमें चार परिशिष्ट दिये गये हैं। परिशिष्ट (१) में सांख्य और योगदर्शनके मूल सूत्र, (२) में वर्णानुक्रमसूत्रसूची, (३) में शब्दानुक्रमणी ओर (४) में विषयसूची है। आशा की गयी थी कि दूसरे संस्करणमें अशुद्धियाँ होने पायेंगी, किंतु प्रेसवालोंके प्रयत्न करनेपर भी नहुत-सी अशुद्धियाँ रह गयी थीं और एक लंबा शुद्धयशुद्धिपत्र लगाना पड़ा था इस संस्करणमें उन भूलोंको यथासाध्य सुधार दिया गया है।

अन्तमें जिन महानुभावोंने इस ग्रन्थके तैयार कराने और प्रकाशन करानेमें किसी प्रकारकी भी सहायता दी है उनका धन्यवाद तथा जिन प्राचीन ऋषियों ओर वर्तमान समयके महापुरुषों और विद्वानोंके उच्च, पवित्र और रहस्यपूर्ण विचारोंसे इस ग्रन्थको सुशोभित किया गया है और उपयोगी बनाया गया है उनके प्रति कृतज्ञताका प्रकट कर देना अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होता हे

ओम्‌ तीर्थ पातञ्जलयोगाश्रम, पुष्कर

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पूज्यपाद योगिराज श्री ९०८ श्रीयुत स्वामी सोमतीर्थजी महाराज का

आशीर्वाद क्लेशान्धकारनाशाय मुमुक्षुणां विमुक्तये तत्त्वज्ञानप्रदानाय क्षमो योगप्रदीपकः (भूयात्‌) क्रेशरूपी अन्धकारको नाश करनेके लिये तथा मुमुक्ष॒जनोंकी मुक्तिके लिये और तत्त्वोंका ज्ञान प्रदान करनेके लिये पातञ्जल्योगप्रदीप समर्थ हो। = ® =

(१६)

पातञ्जलयोगप्रदीप षड्दर्शनसमन्वय भूमिका

पहिला प्रकरण बेद

वेद ईश्वरीय ज्ञान है, जिसका प्रादुर्भाव ऋषियोंपर सृष्टिके आरम्भमें समाधिद्वारा होता हे १. मूल वेदमन्त्र- इन मन्त्रोंकी चार संहिताएँ हैं, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद कहलाती हें * इनकी ही पाठादि भेदसे ११३३ शाखाएँ कहलाती हें २. ब्राह्मणग्रन्थ--इनमें अधिकतर मूल वेदोंमें बतलाये हुए धर्म अर्थात्‌ यज्ञादि कर्मो तथा

` विधि-निषेधकी विस्तृत व्याख्या और व्यवस्था है 'ब्राह्मण' नामकरणका कारण यह हे कि इनका प्रधान

विषय ब्रह्मन्‌ (बृह वर्धने, बढ्नेवाला अर्थात्‌ वितान यज्ञ) है। इनमेंसे चार प्रसिद्ध हैं-ऐतरेय ऋग्वेदका, शतपथ यजुर्वेदका, ताण्ड्यब्राह्मण सामवेदका और गोपथ अथर्ववेदका त्राह्मणग्रन्थोंमें कुछ अंश ऐसा भी सम्मिश्रित हो गया है, जो मूल वेदमन्त्रेके आशयके विपरीत जाता है।

३. उपनिषद्‌--उपनिषद्का मुख्य अर्थ ब्रह्मविद्या है और यहाँ उपनिषद्‌ ब्रह्मविद्या-प्रतिपादक ग्रन्थविशेषके हैं इनमें अधिकतर वेदोंमें बताये हुए आध्यात्मिक विचारोंको समझाया गया है इन्हींको वेदान्त कहते हैं इनमें मुख्य ग्यारह हैं--ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक, तैत्तिरीय, ऐतरेय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य और बृहदारण्यक |

दर्शन बेदोंमें बतलाये हुए ज्ञानकी मीमांसा दर्शनशाखोँमें मुनियोंद्वारा सूत्ररूपसे की गयी है दर्शन शब्दका अर्थ है 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्‌ जिसके द्वारा देखा जाय अर्थात्‌ वस्तुका तात्विक स्वरूप जाना जावे

:“प्राणिमात्रकी दुःखनिवृत्तिकी ओर प्रवृत्ति ' छोटे-से-छोटे कीटसे लेकर बड़े-से-बड़े सम्राट्तक प्रतिक्षण तीनों प्रकारके आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःखोंमेंसे किसी-न-किसी दुःखकी निवृत्तिका ही यत्न करते रहते हैं; फिर भी दुःखोंसे छुटकारा नहीं मिलता मृगतृष्णाके सदृश जिन विषयोंके पीछे मनुष्य सुख समझकर दौड़ता है, प्राप्त होनेपर वे दुःख ही सिद्ध होते हैं इसलिये तत्त्वदर्शीकि लिये निम्न चार प्रश्न उपस्थित होते हैं--

OE MEAN य्य

* चार उपवेद माने गये हैं- ऋम्वेदका उपवेद अर्थवेद, यजुर्बेदका उपवेद धनुर्वेद, सामवेदका उपवेद गान्धर्ववेद, अथर्वबेदका उपवेद | आयुर्वेद (१)

पहिला प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप + [षड्दर्शन .

दर्शनोंके चार प्रतिपाद्य विषय १. हेय--दुःखका वास्तविक स्वरूप क्या है, जो 'हेय' अर्थात्‌ त्याज्य है ? २. हेयहेतु--दुःख कहाँसे उत्पन्न होता है, इसका वास्तविक कारण क्या है, जो 'हेय' अर्थात्‌ त्याज्य दुःखका वास्तविक 'हेतु' है ? ३. हान--दुःखका नितान्त अभाव क्या है, अर्थात्‌ 'हान' किस अवस्थाका नाम हे 2 ४. हानोपाय--हानोपाय अर्थात्‌ नितान्त दुःखनिवृत्तिका साधन क्या है ?

तीन मुख्य तत्त्व

इन प्रश्नोंपर विचार करते हुए तीन बातें और उपस्थित होती हैं--

१. चेतनतत्त्व : आत्मा, पुरुष (जीव)--दुःख किसको होता हे? जिसको दुःख होता है, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? यदि उसका दुःख स्वाभाविक धर्म होता तो वह उससे बचनेका प्रयत्न ही करता इससे प्रतीत होता है कि वह कोई ऐसा तत्त्व है, जिसका दुःख और जडता स्वाभाविक धर्म नहीं है! वह चेतनतत्त्व है। इस चेतन--आत्मा (पुरुष) के पूर्ण ज्ञानसे तीसरा प्रश्न 'हान' सुळझ जाता है अर्थात्‌ आत्माके यथार्थरूपके साक्षात्कार--'स्वरूपस्थिति' से दुःखका नितान्त अभाव हो जाता है

२. जडतत्त्व : प्रकृति-इस चेतनतत्त्वसे भिन्न, इसके विपरीत, किसी और तत्त्वके माननेकी भी आवश्यकता होती है, जिसका धर्म दुःख है, जहाँसे दुःखकी उत्पत्ति होती है और जो इस चेतनतत्त्वसे विपरीत धर्मवाला है वह जडतत्त्व है, जिसको प्रकृति, माया आदि कहते हैं इसके यथार्थरूपको समझ लेनेसे पहला और दूसरा दोनों प्रश्न सुलझ जाते हैं अर्थात्‌ दुःख इसी जडतत्त्वका स्वाभाविक गुण है कि आत्माका। जड और चेतनतत्त्वमें आसक्ति तथा अविवेकपूर्ण संयोग ही 'हेय' अर्थात्‌ त्याज्य दुःखका वास्तविक स्वरूप हे और चेतन तथा जडतत्त्वका अविवेक अर्थात्‌ मिथ्या ज्ञान या अविद्या हियहेतु' अर्थात्‌ त्याज्य दुःखका कारण है चेतन और जडतत्त्वका विवेकपूर्ण ज्ञान 'हानोपाय'-- दुःखनिवृत्तिका मुख्य साधन है

३. चेतनतत्त्व : परमात्मा, पुरुषविशेष (ईश्वर, ब्रह्म) --इन दोनों चेतन और जडतत्त्वोके माननेके साथ एक तीसरे तत्त्वको भी मानना आवश्यक हो जाता है, जो पहले चेतनतत्त्वके सर्वाश अनुकूल हो. और दूसरे जडतत्त्वके विपरीत हो, अर्थात्‌ जिसमें पूर्ण ज्ञान हो, जो सर्वज्ञ हो, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान्‌. हो, जिसमें दुःख, जडता और आज्ञानका नितान्त अभाव हो, जहाँतक आत्माका पहुँचना आत्माका अन्तिम ध्येय है, जो ज्ञानका पूर्ण भण्डार हो, जहाँसे ज्ञान पाकर आत्मा जड-चेतनका विवेक प्राप्त कर सके और अविद्याके बन्धनोंको तोड़कर 'हेय' दुःखसे सर्वथा मुक्ति पा सके इस तर्कके द्वारा हमें तीसरे और चोथे दोनों प्रश्नोंका उत्तर मिल जाता है, अर्थात्‌ यही “हान' है और 'हानोपाय' भी हो सकता है . षड्दर्शन

इन चारों रहस्यपूर्ण प्रश्नोंको समझानेके लिये 'दर्शनशाख्रो'में इन तीनों तत्त्वोका छोटे-छोटे और सरल

सूतरमें युक्तियुक्त वर्णन किया गया है इन दर्शनशास्तरोंमें 'षड्दर्शन' छ; दर्शन--मुख्य हैं १. मीमांसा, (२)

पहिला प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय + [वेदोंके अङ्ग

२. वेदान्त, ३. न्याय, ४, वैशेषिक, ५. सांख्य, ६. योग | ये षड्दर्शन वेदोंके उपाङ्ग कहलाते हें वेदोंके अङ्ग १. शिक्षा-जिसका उपयोग वैदिक वर्णो, स्वरों और मात्राओंके बोध करानेमें होता है

२. कल्प--जो आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन और कात्यायन आदि ऋषियोंके बनाये श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र हैं, जिनमें यागके प्रयोग, मन्त्रॉके विनियोगकी विधि है

३. व्याकरण--जो प्रकृति और प्रत्यय आदिके उपदेशसे पदके स्वरूप और उसके अर्थका निश्चय करनेके लिये उपयोगी हें

४. निरुक्त--जो पदविभाग, मन्त्रका अर्थ और देवताके निरूपणद्वारा एक-एक पदके सम्भावित और अवयवार्थका निश्चय करता है।

५. छन्द--जो लौकिक और वैदिक पादोंकी अक्षर-संख्याको नियमित करने, पाद, यति और विराम आदिकी व्यवस्था करनेमें उपयोगी है

६. ज्योतिष--जो यज्ञादि-अनुष्ठानके कालविशेषकी व्यवस्था करता है

ये वेदोंके अङ्ग कहलाते हैं अर्थात्‌ इनके द्वारा वेदमन्त्रोके अर्थांका यथार्थ बोध प्राप्त होता है

-चच४%च (३)

दूसरा अकरण पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा अर्थात्‌ मीमांसा और वेदान्तदर्शन

कर्मकाण्ड वेदमन्त्रोमे बतलायी हुई--कर्तव्य कर्मो अर्थात्‌ इष्ट और पूर्त कर्मोकी--शिक्षाका नाम

कर्मकाण्ड है। इष्ट वे कर्म हैं, जिनकी विधि मन््रोमें दी गयी हो, जैसे यज्ञादि और पूर्त वे सामाजिक कर्म हैं, जिनकी आज्ञा वेदमें हो, किंतु विधि लौकिक हो, जैसे पाठशाला, कूप, विद्यालय, अनाथालय आदि बनवाना इत्यादि इन दोनों कर्मेकि तीन अवान्तर भेद हें--नित्यकर्म, नैमित्तिककर्म और काम्यकर्म

१. नित्यकर्म--जो नित्य करने योग्य हैं, जैसे पञ्चमहायज्ञ आदि

२. नैमित्तिककर्म वे कर्म हैं, जो किसी निमित्तके होनेपर किये जाये, जैसे पुत्रका जन्म होनेपर जातकर्म-संस्कार

३. काम्यकर्म--जो किसी लौकिक अंथवा पारलौकिक कामनासे किये जायँ। इनके अतिरिक्त कमेकि दो और भेद हैं, निषिद्धकर्म और प्रायक्चित्तकर्म |

(क) निषिद्धकर्म- जिनके करनेका शास्त्रोंमें निषेध हो

(ख) प्रयक्चित्तकर्म--जो विहितकर्मके करने अथवा विधिविरुद्धके करने या वर्जित कर्म करनेसे अन्तःकरणपर मलिन संस्कार पड़ जाते हैं, उनके धोनेके लिये किये जायँ। ही

किसी कामनाकी सिद्धिके लिये किये गये कर्मोका फल भोगना ही पड़ेगा , तथा प्रतिषिद्धकर्मोका आचरण अशुभ फल करेगा ही। अतः इनसे निवृत्ति वाञ्छनीय है, परंतु नित्य और नैमित्तिकका अनुष्ठान नितान्त आवश्यक है। अतः काम्य और निषिद्धकर्मोंसे निवृत्ति परंतु प्रायश्चित्त तथा नित्य और नैमित्तिक कर्मोमें प्रवृत्ति मोक्षकी साधिका है।

उपासनाकाण्ड--वेदमन्त्रोमें बतलायी हुई लवलीनता अर्थात्‌ मनकी वृत्तियोंको सब ओरसे हटाकर केवल एक लक्ष्यपर ठहरानेकी शिक्षाका नाम उपासना है।

ज्ञानकाण्ड--इसी प्रकार वेदमन्त्रोमें जहाँ-जहाँ आत्मा तथा परमात्माके स्वरूपका वर्णन है, उसको ज्ञानकाण्ड कहते हैं। मन्त्रोंके कर्मकाण्डका विस्तारपूर्वक वर्णन मुख्यतया ब्राह्मणग्रन्थोमें, ज्ञानकाण्डका आरण्यको तथा उपनिषदोंमें और उपासनाकाण्डका दोनोंमें किया गया है।

मीमांसा-इन तीनों काण्डोंके वेदार्थविषयक विचारको मीमांसा कहते हैं। मीमांसा शब्द “मान ज्ञाने” से जिज्ञासा अर्थमें “माने जिज्ञासायाम्‌” वार्तिककी सहायतासे निष्पन्न होता है। मीमांसाके दो भेद हैँ--पूर्वमीमौसा और उत्तरमीमांसा

ूर्वमीमांसामें कर्मकाण्ड और उत्तरमीमांसामें ज्ञानकाण्डपर विचार किया गया है।

उपासना दोनोंमें सम्मिलित है। इस प्रकार ये दोनों दर्शन वास्तवमें एक ही ग्रन्थके दो भाग कहे जा सकते हैं। पूर्वमीमांसा श्रीव्यासदेवजीके शिष्य जैमिनि मुनिने प्रवृत्तिमागीं गृहस्थियों तथा कर्मकाण्डियोंके लिये बनायी है। उसका प्रसिद्ध नाम मीमांसादर्शन है। इसको जैमिनिदर्शन भी कहते हैं। इसके बारह अध्याय हैं, जो मुख्यतया कर्मकाण्डसे सम्बन्ध रखते हैं। उत्तरमीमांसा निवृत्तिमार्गवाले ज्ञानियो तथा संन्यासियोंके लिये श्रीव्यास महाराजने स्वयं रचा है। वेदोंके कर्मकाण्ड-प्रतिपादक वाक्योंमें जो विरोध प्रतीत. होता है, केवल उसके वास्तविक अविरोधको दिखलानेके लिये पूर्वमीमांसाकी और वेदके ज्ञानकाप्डमें.

(४)

दूसरा प्रकरण दूस ] * घडदर्शनसमन्वय + [ पूर्वमीमांसा

समन्वयसाधन और अविरोधकी स्थापनाके लिये उत्तरमीमांसाकी रचना की गयी है। इस कारण इन दोनों दर्शनोंमें शान्दप्रमाणको ही प्रधानता दी गयी है। दोनों दर्शनकार लगभग समकालीन हुए हैं।

इसलिये श्रीजैमिनिका भी वही समस लेना चाहिये जो उत्तरमीमांसाके प्रकरणमें श्रीव्यासदेबजी महाराजका बतलाया जायगा |

पूर्वमीमांसा मीमांसाका प्रथम सूत्र है “अथातो धर्मजिज्ञासा' अर्थात्‌ अब धर्मकी जिज्ञासा करते हैं। मीमांसाके अनुसार धर्मकी व्याख्या वेदविहित, शिष्टोंसे आचरण किये हुए कर्मोमें अपना जीवन ढालना है इसमें सब कर्माको यज्ञों तथा महायज्ञोंके अन्तर्गत कर दिया गया है भगवान्‌ मनुने भी ऐसा ही कहा है- “महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः'महायज्ञों तथा यज्ञोंद्वारा ब्राह्मण-दारीर बनता है पूर्णिमा तथा अमावस्यामें जो छोटी-छोटी इष्टियाँ की जाती हैं, इनका नाम यज्ञ और अश्वमेधादि यज्ञोंका नाम महायज्ञ है (१) ब्रह्मयज्ञ--प्रातः और सायंकालकी संध्या तथा स्वाध्याय (२) देवयज्ञ--प्रातः तथा सायंकालका हवन (३) पितृयज्ञ--देव और पितरोंकी पूजा अर्थात्‌ माता, पिता, गुरु आदिकी सेवा तथा उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति। (४) बलिवैश्वदेवयज्ञ-पकाये हुए अन्नमेंसे अन्य प्राणियोंके लिये भाग निकालना (५) अतिथियज्ञ-घरपर आये हुए अतिथियोंका सत्कार--ये यज्ञके अवान्तर भेद हें ये यज्ञ और महायज्ञ वेदोंमें बतलायी हुई विधिके अनुसार होने चाहिये इसलिये जैमिनि मुनिने इनकी सिद्धिके लिये 'शब्द' अर्थात्‌ आगम' प्रमाण ही माना है, जो वेद है। वेदके पाँच प्रकारके विषय हैं- (१) विधि, (२) मन्त्र, (३) नामधेय, (४) निषेध और (५) अर्थवाद "स्वर्गकामो यजेत' स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे' इस प्रकारके वाक्योंको विधि' कहते हैं अनुष्ठानके अर्थ-स्मारक वचनोंको 'मन्त्र' के नामसे पुकारते हें यज्ञोंके नामकी 'नामधेय' संज्ञा है। अनुचित कार्यसे विरत होनेको 'निषेध' कहते हैं तथा किसी पदार्थके सचे गुणोंके कथनको 'अर्थवाद' कहते हैं इन पाँच विषयोंके होनेपर भी वेदका तात्पर्य विधिवाक्योंमें ही है अन्य चारों विषय उनके केवल अङ्गभूत हैं तथा पुरुषोंको अनुष्ठानके लिये उत्सुक बनाकर विधि वाक्योंको ही सम्पन्न किया करते हैं विधि चार प्रकारकी होती हे--कर्मके स्वरूपमात्रको बतलानेबाली विधि 'उत्पत्ति-विधि' है। अङ्ग तथा प्रधान अनुष्ठानोंके सम्बन्धबोधक विधिको 'विनियोग-विधि', कर्मसे उत्पन्न फलके स्वामित्वको कहनेवाली विधिको “अधिकार-विधि' तथा प्रयोगके प्राशुभाव (शीघ्रता) के बोधक विधिको “प्रयोगविधि’ कहते हैं। विध्यर्थके निर्णय करनेमें सहायक श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान तथा समाख्या नामक षट्‌ प्रमाण होते हैं। जैमिनि मुनिके मतानुसार यज्ञोंसे ही स्वर्ग अर्थात्‌ ब्रह्मकी प्राप्ति होती है “स्वर्गकामो यजेत'स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे | यज्ञके विषयमें श्रीमद्धगवद्वीतामें ऐसा वर्णन किया गया हे-- सज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः तदर्थ कर्म कोन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर (३।९) (५)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ पूर्वमीसांसा

यज्ञके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कर्मोसे यह लोक बँधा हुआ है तदर्थ अर्थात्‌ यज्ञार्थं किये जानेवाले कर्म (भी) तू आसक्ति अथवा फलाशा छोड़कर करता जा |

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌ ; (३।१० प्रारम्भमें यज्ञके साथ-साथ प्रजाको उत्पन्न करके ब्रह्माने (प्रजासे) कहा--'इस (यज्ञ) के Fe तुम्हारी वृद्धि हो, यह (यज्ञ) तुम्हारी कामधेनु हो अर्थात्‌ यह तुम्हारे इष्ट फलोंको देनेवाला हो।' देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ (३। ११) (प्रजापति ब्रह्मा यह भी बोले कि) तुम इस यज्ञसे देवताओंको संतुष्ट करते रहो (और) वे देवता (वर्षा आदिसे) तुम्हें संतुष्ट करते रहेँ (इस प्रकार) परस्पर एक-दूसरेको संतुष्ट करते हुए (दोनों) परम श्रेय अर्थात्‌ कल्याण प्राप्त कर लो इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते. यज्ञभाविताः तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः (३।१२) क्योंकि यज्ञसे संतुष्ट होकर देवता लोग तुम्हारे इच्छित (सब) भोग तुम्हें देंगे उन्हींका दिया हुआ उन्हें (वापिस) देकर जो (केवल स्वयं) उपभोग करता है, अर्थात्‌ देवताओंसे दिये गये अन्न आदिसे पञ्चमहायज्ञ आदिद्वारा उन देवताओंका पूजन किये बिना जो व्यक्ति खाता-पीता है, वह सचमुच चोर है यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌ (३।१३) यज्ञ (पञ्चमहायज्ञ आदि) करके शेष बचे हुए भागको ग्रहण करनेवाले सज्जन सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं, परंतु (यज्ञ करके केवळ) अपने लिये ही जो (अन्न) पकाते हैं, वे पापीलोग पाप भक्षण करते हैं अन्नाद्धवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः (३ १४) अन्नसे प्राणिमात्रकी उत्पत्ति होती है, अन्न पर्जन्यसे उत्पन्न होता है, पर्जन्य यज्ञसे उत्पन्न होता है और यज्ञकी उत्पत्ति (वैदिक) कर्मसे होती है कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌। * तस्मात्‌ सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ 2 : (३। १५) (६)

0 ७...

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्रानसमन्बय » [ पूर्वमीमांसा

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उस कर्मको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेद अविनाशी परमात्मासे उत्पन्न हुआ है इससे सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञमें प्रतिष्ठित है

यहाँ तीसरे चेतनतत्त्व अर्थात्‌ ईश्वरको व्यष्टिरूपसे प्रत्येक यज्ञका अधिष्ठातृदेव माना गया है, जिसकी उस विशेष यज्ञद्वारा उपासना की जाती है। यथा-- तद्‌ यदिदमाहुः 'अमुँ यजामुं यज' इत्येकैकं देवम, एतस्यैव सा विसृष्टिः, एष होव सर्वे देवा: '' (बृ १।४।६) जो यह कहते हें कि उसका याग करो, उसका याग करो, इस प्रकार एक-एक देवताका याग बतलाते हैं, वह इसीकी 'विसृष्टि:' बिखरा हुआ अर्थात्‌ व्यष्टिरूप है, निःसंदेह यह ही सारे देवता हैं अर्थात्‌ अग्नि उस ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ, उसीका प्रकाशक है इसी प्रकार दूसरे देवता भी उसीके प्रकाशक हें इसलिये यज्ञोंमें जो अग्नि, इन्द्र आदि भिन्न-भिन्न देवताओंकी उपासना पायी जाती है, वह . बास्तवमें उसी एक ब्रह्मकी उपासना हे पुनश्च -- तदेवाभिस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः तदेव शुक्र तद्‌ ब्रह्म ता आपः सः प्रजापतिः (यजुः अ० ३२ म? १) वह ही आग्नि है, बह सूर्य है, वह वायु है, वह चन्द्रमा है, बह शुक्र अर्थात्‌ चमकता हुआ नक्षत्र : है, वह ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) है, वह जल (इन्द्र) है, वह प्रजापति (विराट्‌) है।

धाता विधर्ता वायुर्न उच्छितम्‌ (अः वेद १३।४। ३) . सोऽर्यमा वरुणः रुद्रः स॒ महादेवः (अः वेद १३। ४1४) सो अञ्निः सूर्यः एव महायमः (अः वेद १३।४।५)

वह (ईश्वर) धाता है, वह विधाता है, वही वायु, वही आकाइमें उठा मेघ है बही अर्यमा, वही वरुण, रुद्र और महादेव है वही अग्नि, सूर्य और महायम है। वरुणः सायममिर्भवति मित्रो भवति प्रातरुद्यन्‌। सविता भूत्वान्तरिक्षेण याति इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम्‌ (अथर्ववेद १३।३। १३) वह सायंकाल अग्नि और वरुण होता है और प्रातःकाल उदय होता हुआ वह मित्र होता है, वह सविता होकर अन्तरिक्षसे चलता है, वह इन्द्र होकर मध्यसे द्युलोकको तपाता है। ' यास्कने निरुक्तके दैवतकाण्ड (सप्तम अध्याय) में स्पष्ट शब्दोंमें विवेचना की है कि इस जगतके मूलमें एक महत्त्वशालिनी शक्ति विद्यमान है, जो निरतिशय ऐश्वर्यशालिनी होनेसे ईश्वर कहलाती है वह एक अद्वितीय है, उसी एक देवताकी बहुत रूपोंसे स्तुति की जाती है। | (७)

]

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ पूर्वमीमांसा

महाभाग्याद्‌ देवताया एक एव आत्मा बहुधा स्तूयते

एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति। ` (S1४ 1८-९) हानोपाय-इसी प्रकार जहाँ उत्तरमीमांसामें “हानोपाय” अर्थात्‌ मुक्तिका साधन, ज्ञानियों तथा सँन्यासियोंके लिये, ज्ञानद्वारा तीसरे तत्त्व अर्थात्‌ परमात्माकी उपासना बतलायी गयी है, वहाँ पूर्वमीमांसामें

“कर्मकाण्डी गृहस्थियोंके लिये यज्ञोंद्रारा व्यष्टिरूपसे उसी ब्रह्मकी उपासना बतलायी गयी है।

हान--किंतु 'हान' अर्थात्‌ मुक्तिके सम्बन्धमें जैमिनि और व्यास भगवानमें कोई विशेष मतभेद नहीं है तथा अन्य दर्शनकारोंसे भी अविरोध है। यथा-- ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः (वेदान्तदर्शन ४।४। ५) जैमिनि आचार्यका मत है कि मुक्त पुरुष (अपर) ब्रहारूपसे स्थित होता है, क्योंकि शुततिमें उसी रूपका उपन्यास (उद्देश्य) है। ` चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्योडुलोमिः (बेदान्तदर्शन ४।४। ६) औडुलोमि आचार्य मानते हैं कि मुक्त पुरुष चितिमात्र स्वरूपसे स्थित होता है, क्योंकि यही उसका अपना स्वरूप है एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोधं बादरायण: (वेः द्‌ ४।४। ७) इस प्रकार भी उपन्यास (उद्देश्य) हैं और पूर्व कहे हुए धर्म भी उनमें पाये जाते हैं, इसलिये उन दोनोंमें कोई विरोध नहीं है। यह बादरायण (सूत्रकार व्यासदेवजी) मानते हैं। अर्थात्‌ प्रवृत्तिमार्गवाले सगुण ब्रह्मके उपासक शबल (सगुण) स्वरूपसे मुक्तिमें शबल ब्रह्म (अपरब्रह्म) के ऐश्वर्यको भोगते हैं, जो जैमिनिजीको अभिमत है और निवृत्तिमार्गवाले निर्गुण शुद्ध ब्रह्मके उपासक शुद्ध निर्गुण स्वरूपसे शुद्ध निर्गुण ब्रह्म (परब्रह्म) को प्राप्त होते हैं जैसा कि औडुलोमि आचार्यको अभिमत है व्यासजी दोनों विचारोंको यथार्थ मानते हैं; क्योंकि श्रुतिमें दोनों प्रकारकी मुक्तिका वर्णन है | मीमांसकोंके मोक्षकी परिभाषा इन दाब्दोंमें है-“प्रपञ्चसम्बन्धविलयो मोक्ष: त्रेधा हि प्रपञ्चः पुरुषं बश्चाति तदस्य त्रिविधस्यापि बन्धस्य आत्यन्तिको विलयो मोक्षः' (झास्त्रदीपिका) इस जगतके साथ आत्माके शरीर, इन्द्रिय और विषय--इन तीन प्रकारके सम्बन्धके विनाशका नाम मोक्ष है; क्योंकि

- इन तीन बन्धनोंने ही पुरुषको जकड़ रखा हे इस त्रिविध बन्धके आत्यन्तिक नाशकी संज्ञा मोक्ष है।

सांख्य और योगके अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधिका अन्तिम ध्येय है | जैमिनि ईश्वरवादी थे | पूर्वमीमांसाका मुख्य विषय यज्ञ और महायज्ञ है इसलिये जैमिनिमुनिने प्रसङ्ग-प्राप्त उसमें कर्मकाण्डका ही निरूपण किया है ईश्वरके विस्तारपूर्वक वर्णनकी, जो उत्तरमीमांसाका विषय है, अपने (८)

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय » [ उत्तरमीमांसा दर्शनमें आवश्यकता नहीं देखी इसलिये कहीं-कहीं (वैशेषिक और साख्यके सदुश) इस दर्शनके सम्बन्धमें भी अनीश्वरवादी होनेकी शङ्का उठायी गयी है। इसके समाधानके लिये उपर्युक्त स्पष्टीकरण पर्याप्त है। अनेक व्यास-सूत्रोंसे जैमिनिजीका ईश्वरवादी होना सिद्ध होता है। यथा-- साक्षादप्यविरोध जेमिनि: (वेदान्तद० २। २८) जैमिनी आचार्य साक्षात्‌ ही वैश्वानर पदके ईश्वरार्थक होनेमें अविरोध कथन करते हें तथा अध्याय पाद सूत्र ३१, अध्याय पाद सूत्र १८, अध्याय पाद सूत्र ११ से १४ तक, अध्याय पाद सूत्र जैमिनिके ईश्वरवादी होनेमें प्रमाण हें पूर्वमीमांसामें पशु-मांसकी बलिका निषेध पूर्वमीमांसामें जो कहीं-कहीं पशुओंके मोसकी आहुति देनेका विधान पाया जाता हे वह पीछेकी मिलावट मालूम होती है (अथवा उसको हिंसक मांसाहारी मनुष्योंके लिये यज्ञके अतिरिक्त मांस-भक्षणमें प्रतिबन्धरूप समझना चाहिये) मूल सूत्रोंमें यज्ञमें मांसमात्रका निषेध है। यथा “मांसपाकप्रतिषेधः'' (१२ २। २) मीमांसा मांस पकाना श्रुतिसे निषिद्ध है और सब आर्षग्रन्थोंमें हिंसा वर्जित है। यथा-- सुरा मत्स्याः पशोर्मासं द्विजातीनां बलिस्तथा धूर्तैः प्रवर्तितं यज्ञे नैतद्‌ वेदेषु कथ्यते (महाभारत, शान्तिपर्व). 'मद्य, मछली और पशुओंका मांस तथा यज्ञमें द्विजाति आदि मनुष्योंका बलिदान धूर्तोद्वारा यज्ञमें प्रवर्तित हुआ है-- अर्थात्‌ दुष्ट राक्षस मांसाहारियोंने यज्ञमें चलाया है वेदोंमें मासका विधान नहीं है ।' अन्य सब दर्शनोंके संदूश हम पूर्वमीमांसाके भी विरेषरूपको दिखलाना चाहते थे, किंतु यह विचार करके कि उसके यज्ञादिसम्बन्धी गूढ़ विषय और पारिभाषिक शब्द योगमार्गवालोंके लिये अधिंक रुचिकर हो सकेंगे, हमने उसका केवल वह सामान्य रूप ही, जिसका हमारे षड्दर्शनसमन्वयसे सम्बन्ध है और जो इस ग्रन्थके पाठकोंको लाभदायक हो सकता है, दे दिया है मीमांसाग्रन्थ सब दर्शनोंमें सबसे बड़ा है इसके सूत्रोंकी संख्या २६४४ तथा अधिकरणोंकी ९०९ है। ये सूत्र अन्य सब दर्शनोंके सूत्रोंकी सम्मिलित संख्याके बराबर हें | द्वादश अध्यायोंमें धर्मके विषयमें ही विस्तृत विचार किया गया है | पहले अध्यायका विषय है- धर्मविषयक प्रमाण, दूसरेका भेद (एक धर्मसे दूसरे धर्मका पार्थक्य), तीसरेका अङ्गत्व, चौथेका प्रयोज्य-प्रयोजकभाव, पाँचवेंका क्रम अर्थात्‌--कर्मोमें आगे-पीछे होनेका निर्देश, छठेका अधिकार (यज्ञ करनेवाले पुरुषकी योग्यता), सातवें तथा आठवेंका अतिदेश (एक कर्मकी समानतापर अन्य कर्मका विनियोग), नबेंका ऊह, दसवेंका बाध, ग्यारहवेंका तन्त्र तथा बारहबेंका विषय प्रसङ्ग है। पूर्वमीमासापर सबसे प्राचीन वृत्ति आचार्य उपवर्षकी है " उत्तरमीमांसा | उत्तरमीमांसाको ब्रह्मसूत्र, शारीरिक सूत्र, ब्रह्ममीमांसा तथा वेदका अन्तिम तात्पर्य बतलानेसे (९)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमासा

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चेदान्तदर्शन और चेदान्तमीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शनके चार अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय चार पादोंमें विभक्त हे

(१) पहले अध्यायका नाम समन्वय अध्याय है; क्योकि इसमें सारे वेदान्तवाक्योंका एक मुख्य तात्पर्य ब्रह्ममें दिखाया गया है। इसके पहले पादमें उन वाक्योंपर विचार है, जिनमें ब्रह्मका चिह्न सर्वज्ञतादि स्पष्ट हैं। दूसरेमें उनपर विचार है, जिनमें ब्रह्मका चिह्न स्पष्ट है और तात्पर्य उपासनामें है तीसरेमें उनपर विचार हे, जिनमें ब्रह्मका चिह्न स्पष्ट है और तात्पर्य ज्ञानमें है चौथेमें संदिग्ध पदोंपर विचार है।

(२) दूसरे अध्यायका नाम अविरोध अध्याय है; क्योंकि इसमें इस दर्शनके विषयका तर्कसे श्रुतियोंका परस्पर अविरोध दिखाया गया है | इससे पहले पादमें इस दर्शनके विषयका स्मृति और तर्कसे अविरोध; दूसरेमें विरोधी तकेकि दोष; तीसरेमें पञ्चमहाभूतके वाक्योंका परस्पर अविरोध; और चौथेमें लिङ्ग-शरीर-विषयक वाक्योंका परस्पर अविरोध दिखाया गया है।

(३) तीसरे अध्यायका नाम साधन अध्याय है; क्योंकि इसमें विद्याके साधनोंका निर्णय किया गया है। इसके पहले पादमें मुक्तिसे नीचेके फलोंमें त्रुटि दिखलाकर उनसे वैराग्य; दूसरेमें जीव और ईश्वरमें भेद दिखलाकर ईश्वरको जीवके लिये फलदाता होना; तीसरेमें उपासनाका स्वरूप और चौथे पादमें ब्रह्दर्शनके बहिरङ्ग तथा अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन है

(४) चौथे अध्यायमें बिद्याके फलका निर्णय दिखलाया है, इसलिये इसका नाम फलाध्याय हे इसके पहले पादमें जीवन्मुक्ति; दूसरेमें जीवन्मुक्तकी मृत्यु; तीसरेमें उत्तरगति और चौथेमें ब्रह्मप्राप्ति और ब्रह्मलोकका वर्णन है

अधिकरण--पादोंमें जिन-जिन अवान्तर विषयपर विचार किया गया है, उनका नाम अधिकरण है

अधिकरणोंके विषय--अधिकरणोंमें निम्नलिखित विषयोंपर विचार किया गया है--

१. ईश्वर, २. प्रकृति, ३. जीवात्मा, ४. पुनर्जन्म, ५. मरनेके पीछेकी अवस्थाएँ, ६. कर्म, ७. उपासना, ८. ज्ञान, ९. बन्ध, १०. मोक्ष |

ब्रह्मसूत्रमें व्यासदेवजीने जहाँ दूसरे आचार्योके मत दिखलाकर अपना सिद्धान्त बतलाया है, वहाँ अपनेको बादरायण नामसे बोधन किया है। इस दर्शनके अनुसार

१. 'हेय'-त्याज्य जो दुःख है उसका मूल जडतत्त्व है अर्थात्‌ दुःख जडतत्त्वका धर्म है।

- २. हियहेतु'--त्याज्य जो दुःख है उसका कारण अज्ञान अर्थात्‌ जडतत्त्वमें आत्मतत्त्वका अध्यास अर्थात्‌ जडतत्त्वको भूलसे चेतनतत्त्व मान लेना है। चारों अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार और इन्द्रियों तथा झारीरमें अहंभाव और उनके विषयमें ममत्व पैदा कर लेना ही दुःखोंमें फँसना है

३. 'हान'-दुःखके नितान्तनअभावकी अवस्था 'स्वरूपस्थिति' अर्थात्‌ जडतत्त्वसे अपनेको सर्वथा भिन्न करके निर्विकार निर्लेप शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थित होना है

४. 'हानोपाय’स्वरूप-स्थितिका उपाय 'परमात्मतत्त्वका ज्ञान' है, जहाँ दुःख, अज्ञान, श्रम आदि लेशमात्र भी नहीं हैं और जो पूर्णज्ञान और शक्तिका भण्डार हे

(१०)

दूसरा प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय +. कजत पाही द्वैत-अद्वेत सिद्धान्तके भेद आत्मतस्वके सम्बन्धमें द्रेत-अद्वैत आदि मतावलम्बियोंने शब्देकि अर्थ निकालनेमें खासी खींचातानी की है अद्वेतवादी 'हान' अर्थात्‌ स्वरूपस्थिति, मोक्षकी अवस्थामै आत्मतत्त्व और परमात्मतत्त्वकी भिन्नता नहीं मानते उनके मतानुसार व्यवहार-दशामें आत्मतत्त्वके रूपमें परमात्मतत्त्वका ही व्यवहार होता है मुक्तिकी अवस्थामें आत्मतत्त्व-परमात्मतत्त्वमें, जो इसका ही अपना वास्तविक स्वरूप है, अवस्थित रहता है। द्वैतवादी आत्मतत्व और परमात्मतत्त्में जडतत्त्वसे विजातीय भेद मानते हैं; और आत्मतत्त्व-परमात्मतत्त्वमें परस्पर सजातीय भेद मानते हैं--अर्थात्‌ आत्मा तथा परमात्मा परस्पर जडतत्त्वके सदृश भिन्न नहीं हैं; किंतु एकजातीय होते हुए भी अपनी-अपनी अलग सत्ता रखते हैं। मुक्तिकी अवस्थामें आत्मा परमात्माको प्राप्त होकर उसके सदुझा, दुःखोंको त्यागकर, ज्ञान और आनन्दको प्राप्त होता है। इसी प्रकार जडतत्त्वके सम्बन्धमें भी उनका मतभेद है | अट्टैतवादी जडतत्त्वकी सत्ता परमात्मतत्त्वसे भिन्न नहीं मानते, उसीमें आरोपित मानते हैं, जैसे रस्सीमें साँप और सीपमें चाँदीकी सत्ता आरोपित है वास्तविक नहीं इस प्रकार अद्वैतवादी जडतत्त्वको “अनिर्वचनीय माया' अथवा 'अविद्या' मानते हैं, जो सत्‌ है असत्‌। सत्‌ इस कारण नहीं कि मुक्ति अर्थात्‌ स्वरूपस्थितिकी अवस्थामें उसका नितान्त अभाव हो जाता है और असत्‌ इसलिये नहीं कि सारा व्यवहार इसीमें चल रहा है, किंतु जगतका अभिन्ननिमित्तोपादान-कारण ब्रह्म या चेतनतत्त्व ही है; क्योंकि माया ब्रह्मसे अलग कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखती, वह ब्रह्महीकी विशेष शक्ति अथवा सत्ता है ब्रह्ममें कोई परिणाम नहीं होता, बह सदा एकरस है। जगती उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मायाका परिणाम है; यह केवल चेतन सत्तामें भ्रमसे भासता है। यह सिद्धान्त विवर्तवाद कहलाता है, जिसमें ब्रह्माको जगतका विवती उपादान कारण माना गया है, अर्थात्‌ ब्रह्म अपने स्वरूपको किंचिन्मात्र भी नहीं बदलता है; परंतु भ्रमसे बदला-सा प्रतीत होता है। नासद्रूपा सद्रूपा माया नैवोभयात्मिका सदसद्भ्यामनिर्वाच्या मिथ्याभूता सनातनी “माया असद्रूप है सद्रूप और उभयात्मिका ही। वह सत्‌-असत्‌ दोनोंसे अनिर्वचनीय मिथ्यारूपा और सनातन (नित्य) है।' यहाँ केवल शब्दोंका उलट-फेर है वास्तवमें तो इससे जगतका उपादान कारण माया ही सिद्ध होती है। मायाको चाहे सत्‌ कहो, चाहे असत, चाहे सत्‌ और असत्‌ दोनोंसे विलक्षण | यथा-- मायामेघो जगन्नीरं वर्षत्येष यतस्ततः चिदाकाशस्य नो हानिर्न लाभ इति स्थितिः “मायारूपी मेघसे जगत्रूपी नीर बरस रहा है और आकाशके समान निर्लेप चेतनकी कुछ हानि नहीं, वह आकारारूपी ब्रह्म भीगता या गीला ही होता हि > छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्‌ तस्मिंश्जान्यो मायया संनिरुद्धः (११)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

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मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्‌ तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्त सर्वमिदं जगत्‌ (श्वेता० ९-१०) “छन्द, यज्ञ (हविर्यज्ञ) , क्रतु (ज्योतिष्टोमादि), व्रत, भूत, भविष्यत्‌ और जो कुछ वेद बतलाते हैं इस सबको मायाका स्वामी (मायी) इससे रचता है और उसमें दूसरा (पुरुष) मायासे रुका (बँधा) है। प्रकृतिको माया जानो और महेश्वरको मायी, सारा विश्व उस (मायी--मायाशबल) के अङ्गोंसे व्याप्त है ।' नामरूपविनिर्मुक्तं यस्मिन्‌ संतिष्ठते जगत्‌ तमाहुः प्रकृतिं केचिन्मायामन्ये परे त्वणून्‌॥ (बृहद्वासिष्ठ) “नाम और रूपसे रहित यह जगत्‌ जिसमें ठहरता है, उसको कोई (जगतका उपादान होनेसे) प्रकृति कहते हैं, दूसरे (जगतकी मोहक होनेसे) माया बोलते हैं और कुछ लोग परमाणु नाम लेठे हैं” द्वैतवादमें इस जड प्रकृतिको एक स्वतन्त्र तत्त्व “प्रकृति नामसे मानते हैं मुक्तिकी अवस्थामें इसका नाश केवल मुक्तिवालोंके लिये होता है इसका अपने स्वरूपसे अभाव नहीं होता; क्योंकि जो मुक्ति अवस्थाको प्राप्त नहीं हुए हैं, उनके लिये यह बनी रहती हे यथा-- “कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्‌! (योगदर्शन २२) 'जिसका प्रयोजन सिद्ध हो गया है, उसके लिये नष्ट हुआ भी (वह अपने स्वरूपसे) नष्ट नहीं होता; क्योंकि वह दूसरोंके साझेकी वस्तु है।' यही प्रकृति जगत्‌का उपादान कारण है, जगत्‌ इसका कार्य है जिस प्रकार घट (घडा) कार्य है, मिट्टी उसका उपादान कारण हे, कुम्हार निमित्त कारण हे और इसका प्रयोजन पाकादि कार्यामें लाना है, इसी प्रकार प्रकृति जगत्‌का उपादान कारण, ब्रह्म निमित्त कारण और पुरुषोंका भोग अपवर्ग इसका प्रयोजन हे

द्वेत-अद्ठेत सिद्धान्तके भेदमें अविरोध

जड तथा चेतनतत्त्वके सम्बन्धमें द्वेत-अद्वेतवादियोंके सिद्धान्तमें जो भेद दिखलाया गया है वास्तवमें वह कोई भेद नहीं है। किसी साधारण दृश्यका यदि कई लेखक वर्णन करें तो वे सब एक-जैसे नहीं हो सकते। लेखकोंके विचार, उनकी रुचि, दृष्टिकोण और लेखनशैलीके अनुसार भिन्नताका होना आवश्यक है। ये तीनों तत्त्व केवल अनुभवगम्य हैं, बुद्धिसे अधिक सूक्ष्म होनेके कारण वर्णनमें ठीक-ठीक नहीं सकते। इस कारण तत्त्ववेत्ताओंकी वर्णनशैलीमें भिन्नताका होना स्वाभाविक है बाह्य दृष्टिवालोंको भले ही यह भिन्नता वास्तविक प्रतीत हो, किंतु सूक्ष्मदृष्टिसे देखनेवालोंके लिये इसमें कोई भिन्नता नहीं

इस प्रकार--

'हान'-दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति अर्थात्‌ स्वरूपस्थिति वेदान्तके द्वैत-अद्वैत दोनों ही सिद्धान्तोंका

अन्तिम लक्ष्य है। वह स्वरूपस्थिति ब्रहासदुश' होना हो अथवा 'ब्रह्मस्वरूप' होना हो, यह केवल

' (१२)

दूसरा प्रकरण ] * घड्दर्शनसमन्वय « [ उत्तरमीमांसा शब्दोंका उलट-फेर ही है। इसी प्रकार 'हेयहेतु' दुःखका कारण जडतत्त्व है, इसका आत्मतत्त्वसे संयोग हटाना दोनों सिद्धान्तवालोंका ध्येय है। अद्वेतवादियोंने इसको रज्जुमें सर्पके सदुश, परमात्मतत्त्वमें आरोपित एक कल्पित वस्तु बतलाकर आत्मतत्त्वसे इसका संयोग छुड़ाया है। द्वैतवादियोंने इसको आत्मतत्त्वसे सर्वथा भिन्न एक अलग तत्त्व दिखलाकर उसमेंसे आत्मतत्त्वका अध्यास हटाया है 'हानोषाय'--दुःखकी निवृत्तिका साधन परमात्मतत्त्वका ज्ञान दोनों सिद्धान्तवालोंके लिये समानरूपसे माननीय है। यही वेदान्तका मुख्य विषय है। हमने केवल द्वैत और अद्वैत सिद्धान्तोंका वर्णन किया है अन्य सम्प्रदायोंके 'विशिष्टाद्वैत', 'शुद्धाद्वैत', 'द्वैताद्वैत' इत्यादि सब सिद्धान्त जिनका इसी प्रकरणके अन्तमें वर्णन किया जायगा, इन्हीं दो मुख्य सिद्धान्तोंके अन्तर्गत हैं। यहाँ इतना बतला देना आवश्यक है कि परिणामवाद सांख्य और योगका सिद्धान्त, जिसका वर्णन चौथे प्रकरणमें किया जायगा, एक अंशमें अद्वैतवादसे मिलता है अर्थात्‌ 'स्वरूपावस्थिति' 'परममुक्ति' की अवस्थामें आत्मतत्त्व और परमात्मतत्वकी अभिन्नता होती है। व्यवहार दशामें आत्मतत्त्वके रूपमें परमात्मतत्त्वका ही व्यवहार होता है और दूसरे अशमें द्वैत॒वादियोंसे मिलता है। अर्थात्‌ जडतत्त्व एक स्वतन्त्रतत्त्व त्रिगुणात्मक प्रकृतिनामसे है। परम मुक्तिकी अवस्थामें इसका नाश केवळ मुक्तिवालोंके लिये हो जाता है। दूसरोंके लिये स्वरूपसे इसका अभाव नहीं होता। | वेदान्तदर्शनका प्रथम सूत्र है-- “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' “अब ब्रह्मके विषयमें विचार आरम्भ होता है ।' दूसरा सूत्र है-- 'जन्य़ाद्यस्य यतः 'इस जगतूकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जिससे होती है अर्थात्‌ जो जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त कारण है, वह ब्रह्म है ।' जैसा कि श्रुति बतलाती है-- यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्मयन्त्यभिसंविशन्ति तद्‌ विजिज्ञासस्व तदब्रह्म (तैः ३। १) जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जीते हैं और मरते हुए जिसमें लीन होते हैं, उसकी जिज्ञासा कर, वह सत्य ब्रह्म है ।' वेदान्तदर्शनका तीसरा सूत्र है 'शारत्रयोनित्वात' RBS ब्रह्म शास्रप्रमाणक है ब्रह्म इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे है, इसलिये वह प्रत्यक्षका विषय नहीं, अनुमान भी उसकी झलकमात्र देता है। पर शास्त्र उसका दिव्य स्वरूप दर्शाता है, जिससे अनुमान इधर ही रह जाता है। अतएव कहा है-- “येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम' (तैः ब्रा० ३। १२) “जिस तेजसे प्रदीप्त होकर सूर्य तपता है, उस महान्‌ (प्रभु) को वह नहीं जानता जो वेदको नहीं (१३)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीसांसा

XARRARAKARRRARRAARRARARARRRRRARARRRARKARRAARARKARRARRAK XNRRKRRRRRAARRARARRKRARKRAARRARKAARRKRKRARKKKK

जानता है।' वेदान्तदर्शनका चौथा सूत्र है “तत्तु समन्वयात' (१।१।४) “वह ब्रह्मका शास्त्रप्रमाणक होना एक तात्पर्यसे है।' सारे शास्त्रका एक तात्पर्य ब्रह्मके प्रतिपादनमें है, अतएव कहा है-- “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ (कठः १।२।१५) “सारे वेद जिस पदका अभ्यास करते हैं ।' इसलिये श्रुतिका तात्पर्य एक ब्रह्मके प्रतिपादनमें है, कहीं शुद्धस्वरूपसे, कहीं शबलस्वरूप अथवा उपलक्षणसे नेदान्तदर्शनके आदिके ये चारों सूत्र वेदान्तकी चतुःसूत्री कहलाते हैं इनमें सामान्यरूपसे वेदान्तका विचार कर दिया है, विशेषरूपसे आगे किया है। वेदान्तमें परमात्मतत्त्व (ब्रह्म) का दो प्रकारसे वर्णन है--एक उसके शुद्ध स्वरूपका, जो प्रकृतिसे पृथक्‌ अपना निजी निर्गुण केवल शुद्ध स्वरूप है। यह 'सर्वतच्चैर्विशुद्धम' सारे तत्त्वोसे निखरा :!आ (श्वेः २। १५) है स्वरूपमात्र होनेसे उसे शुद्ध कहते हैं | दूसरा, प्रकृतिके सम्बन्धसे जो उसका शबल अपर अथवा सगुणरूप है, वह है इस शबल स्वरूपका भी समष्टि-व्यष्टि भेदसे दो प्रकारका वर्णन किया गया है अर्थात्‌ सारे विश्वमें उसकी महिमाका एक साथ देखना उसके समष्टिरूपका दर्शन है और उसके साथ उसका वर्णन समष्टि- रूपका वर्णन है। इसके तीनों भैद-- १. विराट्‌ (चेतन-तत्त्+स्थूल जगत्‌), ` २. हिरण्यगर्भ (चेतन-तत्त्व+सूक्ष्म जगत्‌) और ३. ईश्वर (चेतन-तत्त्+कारण जगत्‌) योगदर्शन समाधिपाद सूत्र २८ पर “विशेष विचार'में विस्तारपूर्वक दिखलाये गये हैं। शबल स्वरूपको भिन्न-भिन्न झाक्तियोंमें देखना उसके व्यष्टिरूपका दर्शन है और उनके द्वारा वर्णन उसके व्यष्टि- रूपका वर्णन है। वेदान्त (उपनिषदों) में शबल ब्रह्मकी उपासना समष्टि और व्यष्टि दोनों प्रकारसे बतलायी गयी है वेदान्तदर्शनमें इसी बातको स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि वेदों और उपनिषदोंमें जहाँ-जहां इन्द्र, सविता, वैश्वानर, अग्नि, आकाश तथा प्राणादिकी उपासना बतलायी गयी है, वह उन दिव्य झाक्तियोंकी नहीं है; किंतु व्यष्टिूपसे ब्रह्मकी ही उपासना है। ` पूर्वमीमांसामें व्यष्टिरूपसे सगुण ब्रह्मकी यज्ञोंद्वारा उपासना बतायी गयी है, इसलिये कई एक तार्किकॉंको इसके बहु ईश्वर तथा अनीश्वरवादी होनेकी शङ्का हुई है इसके अनुसार उपासक मुक्तिमें अपने सगुण स्वरूप अर्थात्‌ जीवरूपसे अपने सगुणोपास्य ईश्वर अर्थात्‌ अपर ब्रह्मके साथ उसके ऐश्वर्य और आनन्दको भोगता है। अन्य चार दर्शनकारों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग) को परब्रह्म अर्थात्‌ शुद्धरूपेण परमात्माकी उपासना अभिमत है, इसलिये कई एक तार्किकोंको उनके अनीश्वरवादी होनेकी : (१४)

14 हि

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * | [ उत्तरमीमांसा

लीड है है हे फरै है है जैर है "है है हर है कै कै और है और है कै म्ये मळी ळी. FAAARKAARARARRAARRKAAARRAKRARRRRAKKRRAARARAKKARASAARAKRRARRRRARARKARARRA

शङ्का हुई है इनके अनुसार उपासक कैवल्यमें अपने शुद्ध आत्मस्वरूपसे परब्रह्म निर्गुण ब्रह्म, अर्थात्‌ शुद्ध परमात्मतत्त्वमें एकीभावसे लीन हो जाता है।

वेदान्तमें ब्रह्मका वर्णन कहीं-कहीं अन्य आदेशसे जैसे “तत्त्वमसि', कहीं अहङ्कारादेश' से जैसे अहं ब्रह्मास्मि’ और कहीं 'आत्मादेश' से जैसे 'अयमात्मा ब्रह्म” से किया गया है। अद्वैतवादी इन वाक्योंको अद्वैतपरक समझकर महावाक्य कहते हैं

प्राचीन वेदान्त सांख्य और योगके अनुसार इन महावाक्योंका अभिप्राय शरीरमें भासनेवाले आत्माके

शुद्ध स्वरूपकी परब्रह्म परमात्माके शुद्ध स्वरूपके साथ अभिन्नताकी प्रतीति कराना है इनमें 'त्वम!, “अहम्‌, 'अयमात्मा' आत्माके शुद्ध स्वरूपके सूचक हैं और 'तत', 'ब्रह्म', “परब्रह्म' परमात्माके शुद्ध स्वरूपका निर्देश करते हैं उपलक्षणसे ब्रह्मा वर्णन जहाँ बाह्य पदार्थके द्वारा उसके अन्तरात्मापर दृष्टि ले जाना अभिप्रेत होता है, वहाँ वह बाह्य पदार्थ उसके अंदर स्थित परमात्माके जाननेका उपलक्षण होता है, जैसे-- यः पृथिव्यां तिष्ठन्‌ पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष आत्मान्तर्याम्यमृतः (बृह? ३।७। ३) 'जो पृथिवीमें रहता हुआ पृथिवीसे अलग है; जिसको पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शारीर है, जो पृथिवीके अंदर रहकर नियममें रखता है, यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है, . (वेदान्तदर्शन १।२।१८ से २० तक अन्तर्याम्यधिकरण) शबल रूपमें और उपलक्षणमें यह भेद है कि शबल रूपमें बाह्यशाक्तिसे विशिष्ट रूप कहा हुआ होता है और उपलक्षणमें उसके द्वारा उसमें शक्ति देता हुआ केवल स्वरूप होता है। [ चेतनतत्त्वका शुद्ध स्वरूप 22 दत्य्तमाह क्तमाह हि। 77 क्र (वेदान्त ३। २। २३) 'मूर्त-अमूर्तसे परे ब्रह्मका अव्यक्त शुद्धस्वरूप है।' जैसा कि श्रुति कहती हे-- -

Re (इः ८) | “वह शुद्ध और पापसे बींधा हुआ है।'

चेतन-तत्त्व ज्ञानवाला नहीं है, किन्तु ज्ञान-स्वरूप है-- ज्ञानमन्तं ब्रह्म ` ` (त्तैःः२।१। १) ळा (शुद्ध) ब्रह्म, सत्य, ज्ञान और अनन्त है ।'

| प्रे ज्योतिषां ज्योतिः (मुण्डक) `

वह शुभ्र ज्योतियोंका ज्योति है

शुद्ध स्वरूप प्रायः नेति-नेति निषेधमुख शब्द शब्दोसे वर्णन किया गया है; क्योंकि उसका किया गया है; क्योंकि उसका स्वरूप _ | क्या है, यह बात तो आत्मानुभवसे ही जानी जा सकती है, उपदेश केवल ही जानी जा सकती है, उपदेश केवल यही हो-सकता है कि ज्ञात

वस्तुओंसे उसका परे होना जैंचा दिया जाय, जैसा कि महर्षि याझवल्वयने देवी गागीको उपदेश किया हेला (१५)

उह

325 प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

XARRKAARRAKRRARRRKAKAARKAKARKRKKKRRKKARK FRR RRRRRRRRRARRRRRARARARKRRRKRARARARAAAAARARARARAARARKRRRNAY है

र्त तदक्षर गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वहृस्वमदीर्घमलोहितमस््रेहमच्छाय मतमोऽवाय्वनाकाशमसंगमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखम मात्रमनन्तरमबाह्यं तदश्नाति किञ्चन तदश्राति कश्चन (बृह ३।८।८) 'हे गार्गि ! इसको ब्राह्मण अक्षर कहते हैं, बह मोटा है, पतला है, छोटा है, लम्बा है, लाळ है (उसमें कोई रंग नहीं है), बिना स्नेहके है, बिना छायाके है, बिना अँधेरेके है, वह वायु नहीं है, आकाश नहीं है, वह आसङ्ग है, रससे रहित है, गन्धसे रहित है, उसके नेत्र नहीं, श्रोत्र नहीं, वाणी नहीं, मन नहीं, उसके तेज (जीवनकी गर्मी) नहीं, प्राण नहीं, मुख नहीं, परिमाण नहीं, उसके कुछ अंदर

02211... कुछ बाहर नहीं, वह कुछ भोगता है, कोई उसको उपभोग करता हे ma शरोत्रं तदपाणिपादम्‌ नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं यै तद्भूतयोनिं परिपञ्यन्ति धीराः (मुण्डकः १।१। ६)

'जो आँखोंसे दिखलायी देनेवाला नहीं है, जो हाथोसे ग्रहण नहीं किया जा सकता, जिसका कोई गोत्र नहीं है, जिसका कोई वर्ण (रंग अथवा आकृति) नहीं है; जिसका (भौतिक) चक्षु है; श्रोत्र है, जिसके हाथ हैं, पैर हैं, जो नित्य है, विभु है, सर्वव्यापक है, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म है, जो नाशरहित है, जो सब भूतोंका योनि है, उसको धीर लोग देखते हैं।'

तत्र चक्षुर्गच्छति वाग्गच्छति नो मनो विद्यो विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्‌, अन्यदेव तद्‌ विदितादथो अविदितादधि, इति शाश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे

(केन० १।३)

वहाँ नेत्र पहुँचता है, वाणी पहुँचती है, ही मन (पहुँचता है), समझते हैं, जानते हैं, जैसे उसका उपदेश करें, 'वह जाने हुएसे निराला है (और) जाने हुएसे अलग, यह सुना है पूर्वजॉसे, जिन्होंने हमारे लिये उसकी व्याख्या की है

HPT दिवा रात्रिर्न सन्नं चासञ्छिव एव केवलं: (श्वेः ४। १८) 'जब ब्रह्मज्ञानका प्रकाश उदय होता है, तब वहाँ दिन है रात है, सत्‌ है असत्‌ (न व्यक्त है अव्यक्त है), वहाँ केबल शिव है। मार्त सारा व्यवहार जडतत्त्व अथवा शबल चेतनतत्त्वमें चल रहा हे शुद्ध चेतनतत्त्व जडतत्त्वसे . विलक्षण है। वह वैशेषिक दर्शनमें बतलाये हुए द्रव्योंके सदृश किसी गुण, कर्म अथवा समवायकी अपेक्षा नहीं रखता उपनिषदोंमें महत्त्वसे उसकी विचित्र व्यापकता और आणुत्वसे विचित्र सूक्ष्मताका कि परिच्छिन्नताका निर्देश किया है। जैसे-- अरित. महतो महीयान्‌। (चेः २०, कठः २०, तैः आः १० १२। ३) अणु-से-अणु (सूक्ष्म-से-सूक्ष्मतर) और महान्‌-से-महत्तर हि विभुमात्मानं मत्वा धीरो शोचति (व काबा) उस महान्‌ विभु आत्माको जानकर धीर पुरुष शोकसे परे हो जाता है ।' शुद्ध चेतनतत्त्व अपरिणामी _ निर्विकार, निष्क्रिय (केवल ज्ञान-स्वरूप) कूटस्थ नित्य है; जडतत्त्व विकारी, सक्रिय और परिणामी नित्य (१६)

श्र

पा

दूसरा प्रकरण ] * घड्दर्शनसमन्वय « [ उत्तरमीमांसा

उद है है ती लि FRARRRRAARRAARRRRRRRARRARARRRAAARAARRARARRRARRAKARAAAAARRAARRNKARRRNNARR ' और कै कै कै है फऔैए और जैर ज़ै जे है सतिश तशे शतती

है; जडतत्त्वमें ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रिया चेतनतत्त्वकी संनिधिमात्रसे है यह सिद्धान्त सांख्य और योगके समान वेदान्तको भी अभिमत है जैसे--

1 निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्‌ (श्वे> ६। १९) बह निरवयव है, निश्चळ है, शान्त, निर्दोष और निर्लेप है ।' Dp मनसो जवीयः (ईश० ४)

'अडोल, एक मनसे बढ़कर वेगवाला (सर्वत्र व्यापक होनेके कारण) है।' गीतामें इसका विस्तारके साथ वर्णन है। जैसे-- EN ऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः (२।२४) “यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य है तथा यह आत्मा निःसंदेह नित्य सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन हे ।'

केः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वहाः अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते (३।२७) ` (वास्तवमें) सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणाद्वारा किये हुए हैं, तो भी अहङ्कारसे मोहित हुए अन्तःकरणवाला पुरुष "मैं कर्ता हूँ' ऐसा मान लेता है।' Sal वित्त महाबाहो गुणकर्मविभागयोः गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा सजते

(३।२८) “परंतु हे महाबाहो ! गुण-विभाग और कर्म-विभागके तत्त्वोंको जानेवाला ज्ञानी पुरुष “सम्पूर्ण गुण

गुणोंमें बरत रहे Da ऐसा प्रानकर आसक्त नहीं होता ।' 24 क्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्‌। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते | (९।१०)

“हे कौन्तेय ! मेरी [परमात्मतत्त्वकी] अध्यक्षतासे प्रकृति चराचर जगत्को रचती है इस हेतुसे

जगत्‌ सदा 2. होता रहता है।' 20 कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः

, यः पझ्यति तथात्मानमकर्तारं स॒ पश्यति

(१३।२९) “और जो पुरुष समस्त कर्मोको सब प्रकारसे प्रकृतिसे ही किये हुए देखता है तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही देखता है अर्थात्‌ वही तत्त्वज्ञानी है।' पा० यो० प्र० २- (१७)

2 ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

' कै कै कै कै ANAAARRRARARRRKRRAARRAARRARRARRAARRARARARRRRARRRARRAAAAAAARRAARAARARRAAARARRAANRARRRRAARKKN KK

रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ (१४ | ५)

'हे महाबाहो ! सत्‌, रज और तम--यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए तीनों गुण अविनाशी आत्माको [अविवेकसे] शरीरमें बांधते हें ।'

5 गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति श्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति (९४ १९)

'जब पुरुष गुणों [त्रिगुणात्मक प्रकृति] के सिवा किसी दूसरेको कर्ता नहीं देखता हे ओर तीनों गुणोंसे अतीत परम [शुद्ध आत्मतत्त्व] को तत्त्वसे जान लेता है, वही मेरे स्वरूप [परमात्मतत्त्व] को प्राप्त होता है ।' -_/मुणनितानतीत्य त्रीन्‌ देही देहसमुद्भवान्‌

जन्ममृत्युजरादुःसतैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते | (१४।२०)

'देहका स्वामी [पुरुष] इन स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरकी उत्पत्तिके कारण तीनों गुणोंको

उल्लङ्घन करके जन्म, मृत्यु और बुढ़ापेके दुःखोंसे मुक्त होकर अमृतको प्राप्त होता हे ।'

rie गुणैयो विचाल्यते गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते (१४।२३)

'जो उदासीनके समान [ साक्षीभावसे ] स्थित हुआ [ जीवन-यात्रा करता हुआ ] गुणोंसे विचलित नहीं किया जा सकता है और जो गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं ऐसा समझकर स्थिर [ शान्त ] रहता है, [ उस स्थितिसे ] चलायमान नहीं होता है [ वह गुणातीत कहलाता है ] ।'

0: ब्रह्मसूत्रमें योग-साधनकी शिक्षा योग-साधनकी हि

* सम्भवात्‌ (ब्रह्मसूत्र | | ७) शङ्का--उपासनाके मानसिक होनेसे शरीर-स्थितिका अनियम है इसपर बतलाते हैं समाधान--उपासना किसी आसनसे बैठकर करनी चाहिये, क्योंकि एक प्रत्ययका प्रवाह करना

उपासना है और उसका चलते या दौड़ते हुए पुरुषमें सम्भव नहीं है; क्योंकि गति आदि चित्तमें विक्षेप

करनेवाले हैं खड़े रहनेवालेका भी मन देहके धारण करनेमें व्यग्र रहता हे, इसलिये वह सूक्ष्म वस्तुके

निरीक्षण करनेमें समर्थ नहीं होता | लेटे हुएका मन भी सम्भव है कि अकस्मात्‌ ही निद्रासे विवश हो.

जाय, किंतु बैठा हुआ पुरुष इस प्रकारके बहुत-से दोषोंका परिहार भलीभाँति कर सकता है इसलिये

श्र उपासनाका होना सम्भव है। (शाङ्करभाष्यार्थ) ८233

2. (ब्रह्मसूत्र | | ८) (१८)

दूसरा प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा

और एक प्रत्ययका प्रवाह करना ही 'ध्यायति' (ध्ये धातु) का अर्थ है और 'ध्यायति' शब्द, जिनकी अङ्ग-चेष्टाएँ शिथिल हों, दृष्टि शिथिल हो और चित्त एक ही विषयमें आसक्त हो, उनमें उपचारसे योजित होना दिखायी देता है जैसे कि बगुला ध्यान करता है, जिसका प्रिय विदेशमें गया है, वह स्त्री

ध्यान करती है। बैठा हुआ पुरुष आयासरहित होता हे, इससे भी उपासना बैठे हुएका कर्म है (शाङ्करभाष्यार्थ)

अचलत्वं चापेक्ष्य (ब्रह्मसूत्र ९) और 'ध्यायतीब पृथिवी' (पृथिवी मानो ध्यान करती है) इस श्रुतिमें पृथिवी आदिमें अचलत्वकी

अपेक्षासे ही 'ध्यायति' शब्दका प्रयोग होता है और वह उपासना बैठे हुएका काम है, इसमें लिङ्ग है (झाङ्करभाष्यार्थ)

स्मरन्ति (ब्रह्मसूत्र | १०)

“शुचौ देशो प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः (पवित्र देशमें अपना स्थिर आसन स्थापित करके) इत्यादि स्मृति-वचनसे शिष्टलोग उपासनांके अङ्गरूपसे आसनका विधान करेते हें इसीसे योगशास्त्रमे पद्मक आदि आसनोंका उपदेश हे (झाङ्करभाष्यार्थ)

यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात्‌ (ब्रह्मसूत्र ४। १। ११)

विशेषता पाये जानेसे जहाँ चित्त एकाग्र हो सके, उसी देशमें बैठकर समाधि लगावे अथवा उपासना करे अर्थात्‌ समाधि अथवा उपासनाका सम्बन्ध चित्तवृत्ति-निरोधसे है किसी दिशा, काल और देश-विशेषसे नहीं

जिस दिशा, देश या कालमें उपासकका मन सहजमें ही एकाग्र हो, उसी दिशा आदिमें उपासना (ध्यान) करनी चाहिये; क्योंकि पूर्व दिशा, पूर्वाङ्ग, पूर्व देशकी ओर निम्न स्थान आदिके समान यहाँ विशेषका श्रवण नहीं है, क्योंकि अभीष्ट एकाग्रता सर्वत्र तुल्य है परंतु कितने ही विशेष भी कहते हैं

यथा--

समे शुचौ शर्करावह्विवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः मनोऽनुकूले तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत्‌॥ (श्वेः २। १०)

“सम और पवित्र, सूक्ष्म पाषाण, वह्ि और रेतीसे वर्जित, शब्द और जलाशय आदिसे वर्जित, मनके अनुकूल और नेत्रोंको पीड़ा देनेवाले निर्वात या एकान्त प्रदेशमें बैठकर योग साधन करे ।'

इसपर कहते हें--ठीक है, इस प्रकारका नियम है, परंतु ऐसे नियमके रहनेपर भी विशेषमें नियम नहीं है, ऐसा सुहृद्‌ होकर आचार्य कहते हैं 'मनोञ्नुकूले' मनके अनुकूल यह श्रुति जहाँ एकाग्रता है, वहीं, ऐसा इतना ही दिखलाती है। (शाङ्करभाष्यार्थ)

Fa प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्‌॥ (ब० सू० ३। २।२४) उक्त परमात्माको कोई धीर पुरुष समाधि-दशामें जान सकता है | यह--

“कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्‌ ' (कठः २॥१॥ १) 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमान: ।' (सुः ३।१।८) (१९)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

SRR CR RR RR CR RR RR PS RR CR ROA RR RR PCR RR OCR RR RA KR NR RR AR A NA CR NA

यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे जाना जाता है। अर्थात्‌ समस्त प्रपञ्चसे शून्य और अव्यक्त इस आत्माको योगीलोग संराधन-समयमें देखते हें संराधन-समयमें योगीलोग परमात्माको देखते हैं, यह कैसे समझा जाता है ? प्रत्यक्ष और अनुमानसे, श्रुति और स्मृतिसे जाना जाता है, क्योंकि “कश्चिद्धीरः०' (जिसकी नेत्रादि इन्द्रियाँ विषयोंसे व्यावृत हो गयी हैं ऐसा अमृतको चाहनेवाला कोई विवेकी पुरुष प्रत्यगात्माको देखता है) ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्ः°' (ज्ञानको निर्मलतासे जिसका अन्तःकरण विशुद्ध हुआ है, वह ध्यान करता हुआ सब अवयवभेदसे वर्जित आत्माको देखता है |) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। उसी प्रकार--

'यं विनिद्रा जितश्चासाः°' निद्रारहित श्वासको जीते हुए मनुष्य, जिसकी इनि श्वासको जीते हुए मनुष्य, जिसकी इन्दरियाँ संयममें हैं ध्यान संयममें हैं ध्यान करते हुए जिस ज्योतिको देखते हैं, उस योगलभ्य आत्माको नमस्कार है, उस सनातन भगवानको योगी

सम्यगरूपसे देखते हैं।) इस प्रकारकी स्मृतियाँ भी हें (शाङ्करभाष्यार्थ) दोनों मीमांसाओंके ग्रन्थकार आचार्योका समय और | उनसे पूर्व आचार्योके नाम

उत्तरमीमांसा अर्थात्‌ ब्रह्मसूत्रोंके कर्ता महर्षि बादरायण हैं इनके सम्बन्धमें ऐसा निश्चय प्रसिद्ध और प्रचलित है कि यही पराशर ऋषिके पुत्र कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं, जो महाभारतके समयमें हुए हैं। जिन्होंने कुरुक्षेत्रमें होनेवाले युद्धकी सारी घटनाओंसे धृतराष्ट्रको जानकारी कराते रहनेके लिये संजयको दिव्यदृष्टि दी थी और जो स्वयं महाभारत और गीताके रचयिता बतलाये जाते हैं| कपिलमुनि, आसुरि, पञ्चशिख, जैगीषव्य, वार्षगण्य, जनक और पराशर--इन सब प्राचीन आचायेनि क्रमशः सांख्यज्ञानमें निष्ठा प्राप्त करके जगत्में उसका प्रचार किया था वास्तवमें सांख्य ही अपने व्यापकरूपमें उपनिषदोंकी प्राचीन वेदान्त फिलासफी है और जिसको पिछले कालके साम्प्रदायिक आचायेनि, जिनका हम आगे बर्णन करेंगे, अपने सम्प्रदायकी संकीर्णतामें संकुचित करके दर्शाया है, वह सब नवीन वेदान्तविचार हैं। बादरायणका अर्थ बादरिके पुत्र हैं इससे सिद्ध होता है कि पराशर ऋषिका दूसरा नाम बादरि था बादरि आचार्यका नाम ब्रह्मसूत्रोंमें चार बार (१।२।३०, ३।१।११, ४।३। ७, ४।४। १०) आया है और जैमिनिके मीमांसा सूत्रॉमें भी चार स्थानों (३। १। ३, ६।१। २७, ८1३ ६, ९।२। ३०) में आया है। इससे सिद्ध होता है कि बादरि ऋषिने कर्म-मीमांसा और ज्ञान-मीमांसा दोनोंपर सूत्रमन्थ बनाये थे। इनके मतमें वैदिक कर्ममें सबका अधिकार है उसमें जन्मसे जातिभेदको कोई स्थान नहीं दिया गया है

बादरायणके ब्रह्मसूत्रमें जैमिनिका नाम (१ २८,१ २। ३१, १। ३।३१, १।४। १८, २३ ४०, ।४। २७, | १८, ३।४।४०, १३, ४।४। ५, ४।४ | ११) ग्यारह बार आया है ओडुलोमि आचार्यका नाम (ब्र०्सू० ।४। २१, ३।४। ४०, ४।४। में) तीन बार आया है और काराकृत्स्र आचार्यका नाम (ब्रह्म सू० १।४। २२ में) एक बार आया 31 आय

(२०)

(६ हीरा?) ? या 220 दूसरा प्रकरण ] _ * घड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा आचार्यका नाम (ब्रह्मर सू० ४४ में) और जैमिनिदर्शनमें (४ १८, ६। | २६) दो बार आया है आचार्य आश्मरथ्यका नाम (ब्रह्म? सू? १। २९, १।४। २०) और जैमिनिसूत्र (३।५।१६) में आया है आचार्य कार्ष्णजिनिका नाम (ब्रह्म_म सू. ३। १। ९) और मीमांसासूत्र (४।३ १७, ६।७। ३५) में आया है इससे सिद्ध होता है कि जैमिनिसूत्र और बादरायणसूत्रोंसे पूर्व दोनों पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसापर बहुत-से प्राचीन आचायेकि सूत्र विद्यमान थे और परस्पर विचारोंमें मतभेद भी था; क्योंकि ऐसे गूढ़ विषयोंमें विचारोंकी भिन्नताका होना स्वाभाविक ही है किंतु उन सूत्रोंके भाष्यकार नवीन साम्प्रदायिक आचार्योकी कटाक्ष (८०००४०५५४) की शैलीके विरुद्ध वे अपने विचारोंसे ` भिन्नता रखनेवाले आचायेकि मतको आदर और सम्मानसे दिखलाते थे वेदान्तपर भाष्यकार आचार्योके नवीन सम्प्रदाय प्राचीन समयमें उपनिषद्‌ वेदान्त कहलाते थे; किंतु वे भिन्न-भिन्न समयमें भिन्न-भिन्न ऋषियोंद्वारा प्रचार किये गये.तथा बनाये गये थे इसलिये उनकी विचार-भिन्नताको जिसका हो जाना स्वाभाविक था, जब बादरायण आचार्यने अपने ब्रह्मसूत्रोमें सब उपनिषदोंकी विचारैकता सिद्ध कर दी, तब यह ब्रह्मसूत्र भी उपनिषंदोंके समान ही प्रामाणिक माना जाने लगा इन्हीं बादरायण आचार्यद्वारा व्यास नामसे भगवद्वीतामें सारे उपनिषदोंका सार अति निपुणतासे समझाया गया है इसलिये अन्तमें उपनिषद्‌, ब्रह्मसूत्र और भगवद्वीता ये तीनों प्रस्थानत्रयी नामसे वेदान्तके मुख्य प्रामाणिक ग्रन्थ माने जाने लगे बौद्ध धर्मके पतनके पश्चात्‌ प्रत्येक नवीन सम्प्रदायके प्रवर्तक आचार्यको वेदान्तके प्रस्थानत्रयीके इन तीनों भागोंपर अपने सम्प्रदायके सिद्धान्तके आधारपर भाष्य लिखकर यह सिद्ध करनेकी आवश्यकता हुई कि उसका सम्प्रदाय वेदान्तके अनुसार है और अन्य सम्प्रदाय इसके विरुद्ध हैं साम्प्रदायिक दृष्टिसे प्रस्थानत्रमीपर भाष्य लिखनेकी रीति चल पड्नेपर भिन्न-भिन्न पण्डित अपने-अपने सम्प्रदायोंके भाष्योंके आधारपर टीकाएँ. लिखने लगे। इसके परिणामस्वरूप नवीन वेदान्तके पाँच सम्प्रदाय अद्वैत, विशिष्टा-द्वैत, द्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैतके सिद्धान्तोंके आधारपर लगभग पाँच * दृष्टिकोणसे ब्रह्मसूत्रोंपर भाष्य किये गये हैं

९--ब्रह्मसूत्रपर भाष्यकार श्रीस्वामी झाङ्कराचार्यका अद्वैतसिद्धान्त

अद्वैत CO आँखोंसे दिखलायी देनेवाले सारे जगत अर्थात्‌ सृष्टिके पदार्थोकी अनेकता सत्य

नहीं है वास्तवमें यह सब एक ही शु है वास्तवमें यह सब एक ही शुद्ध द्ध चैतन्य सत्ता (तत्त्व) है, जो निर्गुण, निर्विः चैतन्य सत्ता (तत्त्व) है, जो निर्गुण, निर्विशेष, शुद्ध- ज्ञान-स्वरूप है जिसको परब्रह्म या परमात्मा कहते हैं | २. परमात्माके साथ अनादिसे एक विशेष शक्ति है जिसको माया

अथवा अविद्या कहते हैं, जो सत्‌ हैं, जो सत्‌ है और असत्‌ अर्थात्‌ अनिर्वचनीय है ब्रह्म इस सारे अनेकविध जड़-चेतन सृष्टिके प्रपञ्चको इसी अविद्या अथवा मायाद्वारा रचता है जिस प्रकार मायावी मदारी अपनी

+ पाँचौं अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोशोंका विस्तारपूर्वक वर्णन योगदर्शन समा० पा० सू० १७ वि० वः में, तीनों स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीरोंका समाधिपाद सूत्र २८ के विशेष वक्तव्यमें; पुनर्जन्मका साधनपाद सूत्र १३ के विशेष वक्तव्यमें और देवयाने, पितृयान आदिका विर पार सू? ३९ वि० बः में देखें (२१)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

33.3 3) 333१ RAARAARKKRRRRRAKRRAARRARRRRRARKRRRRKAAAKKKAARAKRRKRRARARRRRKRRAKKKKKAAARK HARAKARRK AAARRKKARKRK और

माया-शाक्तिसे नाना प्रकारके जड-चेतन पदार्थोको प्रकट करके दिखलाता है, जो अपनी वास्तविक सत्ता नहीं रखते हैं, केवल श्रान्तिमात्र होते हैं। ३. इसलिये मायासम्बद्ध ब्रह्म ही इस जगतका अभिन्न निमित्त उपादान कारण है मायाके सम्बन्धसे ब्रह्मको ईश्वर कहते हैं ओर अविद्याके सम्बन्धसे अविद्याके कारण अपने ब्रह्मस्वरूप अर्थात्‌ शुद्ध ज्ञानखरूपको भूलकर बुद्धि, अहंकार, मन मन, इन्द्रियों और शरीर आदिकी उपाधियोंको अपना वास्तविक स्वरूप समझकर उनकी अवस्थाओंको अपनी अवस्था मान

लेता है। इस अध्यासके कारण अल्पज्ञता, अल्पशक्तिमत्ता 3 है इस अध्यासके कारण अल्पज्ञता, अल्पशक्तिमत्ता ओर परिच्छिन्नताकी सीमामें आकर कर्ता और

भोक्ता बन जाता है और सकाम कर्मोद्वारा पुण्य और पापका और पापका संचय करता हुआ आवागमनके चक्रमें फँसकर उनके फलोंको भोगता है। ५. आत्मा और परमात्मा अथवा जीव और ब्रह्मकी एकताके ब्रह्मकी हाकी एकताके

अनुभवसिद्ध पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश हो जानेपर शरीर, इन्द्रिय हो जानेपर शरीर, इन्द्रियों, मन, अहंकार और बुद्धि आदि

उपाधियोंमेंसे आत्मभाव मिट जाता है, जिसके उपरान्त कर्ता-भोक्ताका अभिमान निवृत्त हो जानेपर कर्म, हो जानेपर कर्म उनके फलों और आवागमनसे मुक्ति पाकर परिच्छिन्नता और अल्पज्ञताकी सीमाको तोड़कर अपने अनन्त, शुद्ध ज्ञानखरूपमें अवस्थित हो जाता है यह अहत सिद्धान्त कहलाता है इसको निर्विशेषाद्वैत तथा विवर्तवाद भी कहते हैं। इस सम्प्रदायके आचार्य श्रीस्वामी शङ्कराचार्य हुए हैं, जिनके सम्बन्धमें कई इतिहासलेखकोंद्रारा यह निश्चित किया गया है कि इन्होंने विक्रमी संवत्‌ ८४५ तदनुसार ७८८ ई० सनमें जन्म ग्रहण किया था और ३२ वें वर्षमें वि० सं ८७८, ई० सन्‌ ८२० में शरीर त्याग किया था; किंतु श्रीस्वामी दयानन्दजी महाराजने स्वामी शङ्कराचार्यका समय आजसे २२०० वर्ष पूर्व माना हे

श्रीस्वामी शङ्कराचार्यजी अपने समयके अद्वितीय विद्वान्‌ थे इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य शारीरकभाष्य कहलाता है ब्रह्मसूत्रोके संस्कृतमें जितने भाष्य हुए हैं, उनमें सबसे अधिक प्रचलित और प्रसिद्ध श्रीस्वामी शङ्कराचार्यका है और झाङ्करप्रतिपादित मत ही सामान्यरूपसे वेदान्त समझा जाने लगा है | किंतु बहुत-से विद्वानोंका विचार है कि स्वामी शङ्कराचार्यजीने अपनी अलौकिक बुद्धि और विद्याको बादरायणसूत्रोंके आशयको स्पष्ट करनेकी अपेक्षा अपने प्रवर्तित सम्प्रदायके मण्डन और अपनेसे विभिन्नता रखनेवाले मतोंके खण्डनमें अधिक प्रयोग किया है।

डाक्टर घाटेने 'वेदान्त' नामक अंग्रेजी पुस्तकमें शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभके व्याख्यानोंका तारतम्य अनुशीलनकर मूल सूत्रोंके प्रतिपाद्य सिद्धान्तोंको खोज निकालनेका यत्न किया है उनकी सम्मतिमें शङ्कराचार्यके अनेक सिद्धान्तोंकी पुष्टि सूत्रोसे नहीं की जा सकती कार्य-कारणके सम्बन्धमें सूत्रकार 'परिणामवाद'के पक्षपाती प्रतीत होते हैं कि 'विवर्तवाद'के आत्मकृते परिणामात्‌' (ब्रः सू? | ४। २६) में सूत्रकारने परिणाम शब्दका स्पष्ट निर्देश किया है

प्रसिद्ध पाश्चात्य पण्डित थीबोंने शङ्कराचार्यकृत भाष्यके स्वरचित अनुवादकी भूमिकामें शङ्कराचार्यको व्याख्याके सम्बन्धमें लिखा है कि 'बादरायणका दार्शनिक सिद्धान्त शङ्कराचार्यके सिद्धान्तसे सर्वथा भिन्न था, किंतु शङ्कराचार्यने अपने शुष्क निर्विशेष अद्वैत सिद्धान्तका प्रचार करनेके लिये बादरायणके ऊपर अपने मतका आरोप किया है, इसलिये ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्यको पढ़नेसे सूत्रकारका वास्तविक सिद्धान्त

(२२)

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा नहीं मालूम हो सकता ।' इनकी समालोचनाके अनुसार ही पूर्ववर्ती नहुत-से समालोचकोंने स्वामी झङ्कराचार्यके विषयमें ऐसा ही मत प्रकट किया है। प्राचीन कालके रामानुजाचार्यने भी ब्रह्मसूत्रके व्याख्यानके प्रसङ्गमें स्वामी शङ्कराचार्यके व्याख्यानके ऊपर विभिन्न स्थलोपर दोष दिखलाये हैं। रामानुजाचार्यके पूर्ववर्ती आचार्य भास्करने अपने भाष्यके आरम्भमें लिखा है कि शङ्कराचार्यने सूत्रकारके अभिप्रायको गुप्त करके अपना सिद्धान्त ब्रह्मसूत्रके भाष्यके बहाने प्रकट किया है ।' ; सम्भव है उपर्युक्त समालोचनाओंमें अत्युक्तिसे काम लिया गया हो; क्योंकि ब्रह्मसूत्रके भाष्यकारोंमें - अपने सम्प्रदायसे भिन्न विचारवालोंके प्रति प्रायः ऐसी ही शैली चल निकली है किंतु बादरायणके मूल... सूत्रोपर साम्प्रदायिक पक्षपातसे रहित होकर स्वतन्त्र विचारसे दृष्टि डालनेसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि . अन्य सब दर्शनकारों (न्याय, वैशेषिक, विशेषकर सांख्य और सरोग) के सदुश उनमें भी सांख्य और योगके द्वैतसिद्धान्तका ही प्रतिपादन किया गया है जो स्वामी शङ्कराचार्यकी अद्भुत विद्वत्ताद्वारा निर्विशेष अद्वैत सिद्धान्तके रूपमें दिखलाया गया हे ्रह्मसूत्रमें वैदिक दर्शनोंका खण्डन नहीं प्रत्युत श्रुतियोंके साथ उनका समन्वय है और बादरायणसे लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात्‌ भगवान्‌ बुद्धका जन्म हुआ है; जिनके सम्प्रदायोंका ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्यमें खण्डन किया गया हे वास्तवमें यह बात प्रतीत होती है कि स्वामी शङ्कराचार्यके समयमें सारे भारतवर्षमें नास्तिकता फैल रही थी और अवैदिक मतमतान्तरोंका सब ओर प्रचार था तान्त्रिक सम्प्रदाय, पाशुपत और पाञ्चरात्र तथा शाक्तमतवालोंकी नास्तिकता बढ़ रही थी। बौद्ध धर्म जो एक प्रकारसे सांख्य और योगका ही रूपान्तर है, जिसके निवृत्तिमार्गमें भगवान्‌ बुद्धने अन्वय-व्यतिरेक करते हुए समाधिद्वारा नेति-नेतिरूप (सर्ववृत्तिनिरोध रूप) स्वरूप-अवस्थिति प्राप्त करना सिखलाया था | सौत्रान्तिक, वैभाषिक, योगाचार, माध्यमिक आदि सम्प्रदायोंमें विभक्त होकर अपने उच्च आत्म और चैतन्यवादसे विच्युत होकर जडवादकी ओर झुक रहा था और बहुत सम्भव है कि इस जडवादके प्रभावमें उस समयके कोई-कोई दार्शनिक विद्वान्‌ भी वैदिक दर्शनोंसे अनीश्वरवादको सिद्ध करनेमें प्रवृत्त हो रहे हों इसलिये इस सारे अवैदिक और नास्तिक वातावरणको वैदिक धर्ममें परिवर्तित करनेके लिये स्वामी शङ्काचार्यको पाशुपत, पाञ्चरात्र और शाक्त सम्प्रदायोंके साथ-साथ वैदिक दर्शनोंके भी खण्डनकी आवश्यकता हुई हो और जडवादके स्थानमें अद्वैत चैतन्यवाद स्थापन करना आवश्यक समझा हो यहाँ बैदिक दर्शनों विशेषकर सांख्य और योगके द्वैत-सिद्धान्तको संक्षेपसे बतलाकर उसकी शङ्करके अद्वैतसिद्धान्तसे सामान्यरूपसे तुलना दिखला देना पाठकोंकी जानकारीके लिये उचित प्रतीत होता हे-- सांख्ययोगका द्वैत-सिद्धान्त--चेतन और जड दो अनादि तत्त्व हैं चेतन-तत्त्व (पुरुष) अपरिणामी, निष्क्रिय, निर्विकार, ज्ञानस्वरूप, कूटस्थ, नित्य है। जड-तत्त्व (मूलप्रकृति) त्रिगुणात्मक, सक्रिय और परिणामी नित्य है चेतन-तत्त्वकी संनिधिसे जड-तत्त्वमें एक प्रकारका ज्ञान नियम और व्यवस्थापूर्वक विरूप अर्थात्‌ विषम परिणाम हो रहा है। सत्त्वमें क्रियामात्र रज और उस क्रियाको रोकनेमात्र तमका सबसे पहला विषम परिणाम महत्तत्त्व कहलाता है यही महत्तत्त्व सत्त्वकी बिशुद्धतासे अपने समष्टिरूपमें विशुद्ध सत्त्वमय चित्त कहलाता है, जिसमें समष्टि अहंकार बीजरूपसे रहता है। यह ईश्वरका चित्त (२३)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

RRRRRARARRRRARRRRRRAARRRRRARKRRRARRKKNK RIRRRARRRRRRRRRRRRRARRRRAARAAARAAARKKKARNAKAAKRRKKANKK RARKKKN x

है और अपने व्यष्टिरूपमें सत्त्वकी विशुद्धताको छोड़े हुए सत्त्वचित्त कहलाते हैं, जो संख्यामें अनन्त हैं जिनमें व्यष्टि अहंकार बीजरूपसे रहते हैं ये जीवोंके चित्त हें चेतन-तत्त्वमें अपने ज्ञानके प्रकाश डालनेकी और महत्तत्त्वमें उसको ग्रहण करनेकी योग्यता अनादि चली रही है पुरुषसे प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित समष्टि चित्त समष्टि अस्मिता और व्यष्टि चित्त व्यष्टि अस्मिता कहलाते हें पुरुष निष्क्रिय होता हुआ भी अपने चित्तका द्रष्टा है अर्थात्‌ चित्तमें उसके ज्ञानके प्रकाशमें जो कुछ भी हो रहा

“है बह उसे स्वयं ज्ञात रहता है व्यष्टि चित्तके सम्बन्धसे चेतन-तत्त्वका नाम जीव है, जो संख्यामें अनन्त

: और अल्पज्ञ हैं और समष्टि चित्तके सम्बन्धसे चेतन-तत्त्वका नाम ईश्वर, अपर ब्रह्म, सगुण ब्रह्म और शबल ब्रह्म है, जो एक और सर्वज्ञ है। अपने शुद्ध स्वरूपसे चेतन-तत्त्वका नाम परमात्मा, निर्गुण ब्रह्म, शुद्ध ब्रह्म और परब्रह्म है पुरुष शब्दका प्रयोग जीव, ईश्वर और परमात्मा तीनों अर्थोमें होता है दूसरा विषम परिणाम अहंकार है अर्थात्‌ पुरुषसे प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित महत्तत्व ही रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर अहंकाररूपसे व्यक्तभावमें बहिर्मुख हो रहा है। यह अहंकार ही अहंभावसे एकत्व, बहुत्व, व्यष्टि और समष्टिरूप सब प्रकारकी भिन्नताका उत्पन्न करनेवाला है विभाजक अहंकारसे ग्रहण और ग्राह्मरूप दो प्रकारके विषम परिणाम हो रहे हैं अर्थात्‌ विभाजक अहंकार सत्त्वमें रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर ग्रहणरूप ग्यारह इन्द्रियों (पाँच ज्ञान-इन्द्रियाँ, पाँच कर्म-इन्द्रियाँ, ग्यारहवाँ इनका नियन्ता मन) और सत्त्वमें रज-तमकी कुछ विरेषताके साथ अधिकतासे विकृत होकर परस्पर भेदवाली पाँच तन्मात्राओंमें विकृत होकर बहिर्मुख हो रहा है पाँचवाँ विषम परिणाम पाँच स्थूल भूत हैं अर्थात्‌ अहंकारसे व्याप्त पाँचों तन्मात्राएँ, ही सत्त्वमें रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर पाँचों सूक्ष्म और स्थूल भूतोंमें व्यक्तभावसे बहिर्मुख हो रही हें इस प्रकार बहिर्मुखतामें महत्तत्वकी अपेक्षा अहंकारमें, अहंकारकी अपेक्षा ग्यारह इन्द्रियों और पाँचों तन्मात्राओमें और तन्मात्राओंकी अपेक्षा पाँचों सूक्ष्म और स्थूल भूतोंमें क्रमशः रज तथा तमकी मात्रा बढ़ती जाती है और सत्त्वकी मात्रा कम होती जाती है। यहाँतक कि स्थूल जगत्‌ और स्थूल शरीरमें रज-तमका ही व्यवहार चल रहा है सत्त्व केवल प्रकाशमात्र ही है और महत्तत्त्में प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित चेतन-तत्त्व भी उपर्युक्त राजसी-तामसी आवरणोंमें आच्छादित होता हुआ स्थूल शरीर और भौतिक जगतमें केवल झलकमात्र ही दिखलायी दे रहा है। यह सब अवरोहक्रम (००५८००६) है इससे उलटे आरोहक्रम (Ascent) जितनी अत्तर्मुखता बढ़ती जायगी उतनी ही रज तथा तमका विक्षेप-आवरण हटकर सत्त्वका प्रकाश बढ़ता जायगा और उस प्रकाशमें चेतन-तत्त्वकी अधिक स्पष्टतासे प्रतीति बढ़ती जायगी इस प्रकार अन्तमें गुणोंके सबसे प्रथम विषम परिणामरूप चित्तको भी सर्ववृत्तिनिरोधद्वारा अपने कारणमें लीन करके शुद्ध चेतन स्वरूपमें अवस्थिति प्राप्त की जा सकती है

व्यष्टि चित्तोमे जो लेशमात्र तम है, उसमें बीजरूपसे अविद्या विद्यमान है इस अविद्याकेशसे

क्रमशः अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश, क्रेश और उनसे सकाम कर्म, सकाम कर्मोसे उन्हींके अनुसार

कर्माशय, कर्माशयके अनुसार जन्म, आयु और भोग तथा उनमें सुख और दुःख उत्पन्न होते हैं सम्प्ज्ञात

समाधिकी चारों भूमियों वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता अनुगतमें ये सब केश तनु अर्थात्‌ शिथिल (२४)

दूसरा प्रकरण ] * घडदर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा हो जाते हैं और उसकी उच्चतम अवस्था विवेकख्यातिमें सत्त्वकी विशुद्धतासे सारे केश अपनी जननी अविद्यासहित दग्ध बीजतुल्य हो जाते हें अब वही तम अपने अविद्यारूप धर्मको छोड़कर इस सबसे उच्चतम सात्त्विक वृत्तिको स्थिर रखनेमें सहायक होता है सर्ववृत्तिनिरोधरूप असम्प्रज्ञात समाधिमें चित्तमें कोई वृत्ति रहनेके कारण द्रष्टाकी शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति होती है उस समय चित्तमें निरोधके संस्कारोंका परिणाम होता है कैवल्यमें व्युत्थानके सारे संस्कारोंको नष्ट करनेके पश्चात्‌ निरोधके संस्कार स्वयं भी नष्ट हो जाते हें तब अपने धर्मी (उपादान-कारण) चित्तके अपने कारणमें लीन होनेके साथ दग्ध बीजरूप अविद्या-क्लेशका भी लय हो जाता है।

शंकरके निर्विशेष अद्वैतसिद्धान्त और सांख्य-योगके ट्वेतसिद्धान्तमें तुलना

बैदिक दर्शनकारोंने जहाँ चेतन-तत्त्वको निमित्त कारण और जड-तत्त्वको इस जगतका उपादान कारण बतलाया है, वहाँ शंकरने चेतन-तत्त्वको ही जगतका अभिन्न निमित्त-उपादान कारण माना है। शाङ्करने ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें एक स्थानपर सांख्यके इस आक्षेपको कि चेतन-तत्त्वसे जड-तत्त्व कैसे उत्पन्न हो सकता है (अर्थात्‌ चेतन-तत्त्व जड-तत्त्वका उपादान कारण नहीं हो सकता) इस प्रकार निवारण किया है कि जैसे तुम्हारे अव्यक्त मूल प्रकृतिसे व्यक्त महत्तत्त्व अहँकारादि उत्पन्न होते हैं, बैसे ही चेतन-तत्त्वसे जड-तत्त्व उत्पन्न हो सकता है, किंतु सांख्य-योगका जड-तत्त्व मूल प्रकृति त्रिगुणात्मक है सत्त्वमें रज और तम जितना बढ़ता जाता है उतनी ही स्थूलता और जितना रज और तम कम होता है उतनी ही सूक्ष्मता बढ़ती जाती है स्थूलताके क्रमको व्यक्त होना और सूक्ष्मताके क्रमको अव्यक्त होना कहते हैं इसलिये सारा सूक्ष्म और स्थूल अर्थात्‌ अव्यक्त और व्यक्त संसार तीनों गुणोंका ही परिणाम है किंतु एक अपरिणामी निर्विकार कूटस्थ नित्य ब्रह्ममें इन नाना प्रकारके विकारों और परिणामोंका होना कैसे सम्भव हो सकता है। इसलिये शंकरको भी जगतके उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रकृतिके स्थानमें ब्रह्मके साथ एक अनादि तत्त्व माया अर्थात्‌ अविद्याका मानना अनिवार्य हो गया, जिसके द्वारा ब्रह्म स्वयं अपरिणामी और निर्विकार रहता हुआ भी इस सारे संसारकी रचना कर सकता है जैसा कि शांकरभाष्य उपसंहारदर्शन अधिकरणसूत्र २४ में बतलाया है-- अद्वैतं तत्त्वतो ब्रह्म तद्चाविद्यासहायवत्‌। नानाकार्यकरं कार्यक्रमोऽविद्यास्थशक्तिभिः (ब्र सू? अ० पा० अधि? शांकरभाष्य) “यद्यपि पंरमार्थतः ब्रह्म एक ही है, तथापि वह अविद्याकी सहायतासे अनेक विचित्र कार्योको उत्पन्न कर सकता है और अविद्याकी शक्तियोंसे कार्य-क्रमकी व्यवस्था हो सकती है।' इस माया अर्थात्‌ अविद्याकी अलग सत्ता माननेमें अद्वैतसिद्धान्त खण्डित होता था और असत्‌ माननेमें इसके अन्तर्गत सारा संसार श्रुति, स्मृति और स्वयं अपना अद्वैतसिद्धान्त असत्‌ और मिथ्या सिद्ध होता था, इसलिये इसको अनिर्वचनीय नाम दिया गया, जिसको सत्‌ कह सकते हैं और असत्‌। इस प्रकार शंकरकी त्रिगुणात्मक माया अर्थात्‌ अविद्या साँख्यकी त्रिगुणात्मक प्रकृति है अनिर्वचनीय अथवा सत्‌ और असत्‌ (२५)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमाँसा

5 # # # है के हे 3 के के के के कक जे के के अं केक कै कै कै AAR के फू जैक कै है पक कै है हे हैक है के कै है कै है कै कै है है है कै जैक कै के जैक कै हैक है कै के कै कै अै कै कै कै कै कै कै कै अं कै जे # जे आर कफ

दोनोंसे विलक्षण कह देना केवल ाब्दोंका ही रूपान्तर है दोनों सिद्धान्तोंका इससे परे होकर अपने शुद्ध चेतन स्वरूपमें अवस्थित होना अन्तिम ध्येय है एक और मुख्य भेद इन दोनों सिद्धान्तोंमें यह है कि जहाँ सांख्य चेतन-तत्त्वकी संनिधिसे त्रिगुणात्मक जड-तत्त्वमें स्वाभाविक ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रियाका होना इस संसारकी रचनाका कारण बतलाता है, वहाँ शंकरको ब्रह्मकी स्वतन्त्रता, स्वेच्छाचारिता और महिमा दिखलानेके लिये यह मानना पड़ा कि ब्रह्म अपनी इच्छासे अपनी महिमा दिखलानेके लिये शोबदेवाज मदारीके सदुश अपनी अनादि माया अर्थात्‌ अविद्यासे इस जगतूकी रचना करता है इसमें नाना प्रकारके दोष आते हैं, जिनका युक्तिद्वारा संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सकता अर्थात-- (१) ब्रह्मको क्यों ऐसे जगतूके रचनेकी इच्छा होती है, जिसमें दुःख-ही-दुःख है और फिर स्वयं ही उससे मुक्ति पानेके लिये श्रृति-स्मृतिद्रार उपदेश दिलवाता है। (२) यदि यह कहा जाय कि जगत्‌ और उसके अन्तर्गत सुख-दुःख सब मिथ्या ओर भ्रमरूप ही हैं, केवल एक ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही सत्य है तो ब्रह्मने इस भ्रमको क्यों फैलाया और निर्भ्रान्त ब्रह्ममें भ्रम कैसा ? (३) अविद्यासे ब्रह्म जगत्‌की रचना करता हे और अविद्या ब्रह्मसे अभिन्न है फिर अविद्या और जगत्से छुटकारा कैसे सम्भव हो सकता है ? (४) ब्रह्मकी शक्तिरूप अविद्यासे जगत्को उत्पत्ति है, इसलिये विद्या अर्थात्‌ ज्ञानद्वारा ही इससे मुक्ति हो सकती ऐड; किंतु अविद्याके अन्तर्गत होनेके कारण सारे साधन श्रुति और स्मृति भी अविद्यारूप ही होंगे विद्या और ज्ञान ब्रह्मसे बाहर कहाँसे लाया जा सकता है। (५) सर्वज्ञ ज्ञानस्वरूप ब्रह्मकी शक्ति माया अर्थात्‌ अविद्या नहीं होनी चाहिये प्रत्युत निर्भ्रान्त विद्या और सत्य ज्ञान होना चाहिये। (६) और यदि उसमें संसारके रचनेकी इच्छा भी हो तो वह निर्भ्रान्त विद्या और सत्य ज्ञानके साथ हो कि माया और अविद्याके साथ (७) मदारी पैसा कमाने अथवा अपनेसे बड़े आदमियोंको खुश करनेके प्रयोजनसे शोबदे और तमाशे दिखलाता है। आप्तकाम ब्रह्मको इस मायाजालके फैलानेमें प्रयोजन क्या है? (८) यदि अपनी महिमा और प्रभुता दिखलानेके लिये, तो यह किसको दिखलाना ? जब कि एक ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं। (९) यदि अपनी प्रभुता और महिमा दिखलानेके लिये जीवोंको उत्पन्न करता है तो इस प्रकारकी महिमा और प्रभुता दिखलानेकी अभिलाषा होना ही महिमा और प्रभुताके अभावको सिद्ध करता है। (१०) यदि बिना किसी अपने विशेष प्रयोजनके ब्रह्मद्वार संसारकी रचना केवल जीवोंके कल्याण अर्थात्‌ भोग और अपवर्गके लिये स्वाभाविक मानी जाय तो यह सांख्य और योगका ही सिद्धान्त गया

इस प्रकार जहाँ द्वेतवादी सांख्ययोग सारे दोषों, विकारों और परिणामों आदिको, त्रिगुणात्मक प्रकृतिमें डालकर ब्रह्मका अद्वैत, निर्दोष, निर्विकार, अपरिणामी, निष्काम, निष्क्रिय, कूटस्थ, नित्य शुद्ध ज्ञानस्वरूप सिद्ध करता हे और उस शुद्ध ज्ञानस्वरूपमें अवस्थिति अपना अन्तिम ध्येय ठहराता है, वहाँ यह निर्विशेष अद्वैतवाद इन सारे दोषोंका त्रहामे आरोप करके ब्रहाको सदोष, विकारी, परिणामी, सक्रिय, सकाम और अपनी महिमा दिखलाने और प्रतिष्ठा पानेका अभिलाषी, प्रसवधर्मी, अज्ञान, अविद्या और भ्रमयुक्त सिद्ध करता है; किंतु यद्यपि यह निर्विरोष अद्वैत-सिद्धान्त व्यवहार-दञञामें इस प्रकार दोषयुक्त और युक्तिहीन है; तथापिं यह भावना कि यह सारा द्रष्टव्य संसार मिथ्या, अविद्या और भ्रमरूप है, केवल

(२६)

हु प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा एक ब्रह्म ही सत्य है, साधकोंको साधनरूपसे शुद्ध-चेतन-स्वरूपमें अवस्थिति प्राप्त करानेमें रोचक और सहायक प्रतीत होता है इसीलिये बहुत-से महात्माओंने इस सिद्धान्तको अपनाया है और अपना रहे हैं। इसलिये सांख्ययोगके द्वैतवाद अर्थात्‌ परिणामवाद और शंकरके निर्विशेष अद्वैतवाद अर्थात्‌ विवर्तवादमें अन्तिम लक्ष्यकी प्राप्तिमें कोई वास्तविक अन्तर नहीं है

२--ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीरामानुजाचार्यका विशिष्टाह्देत- सिद्धान्त

शंकरसे लगभग २५० वर्ष पश्चात्‌ (जन्म विक्रम सं० १०७३ तदनुसार ई० सन्‌ १०१६) श्रीरामानुजाचार्यने विशिष्टाद्वैत-सम्प्रदाय चलाया इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य 'श्रीभाष्य' कहलाता है। प्रसिद्ध है कि ब्रह्मसूत्रपर एक अति प्राचीन व्याख्या 'वृत्ति' अथवा 'कृतकोटि', नामसे बौधायन ऋषिकी बनायी हुई थी; किंतु वह लुप्त हो चुकी थी; उसको टंकडूमिर्ड, गुहदेव आदि पूर्व-आचायेनि संक्षेप किया था। उसके आधारपर श्रीरामानुजाचार्य अपने श्रीभाष्यका लिखा जाना अपने वेदार्थ-संग्रहमें बतलाते हैं “भगवान्‌ बौधायनकी विस्तीर्ण वृत्तिका जो पूर्व-आचार्याने संक्षेप किया है, उनके मत-अनुसार सूत्रोंका व्याख्यान किया जाता है।”

श्रीस्वामी रामानुजाचार्यका विशिष्टाद्वैत-सिद्धान्त--इस सम्प्रदायका मत है कि शंकराचार्यका माया-मिथ्यांत्ववाद और अद्वैत-सिद्धान्त दोनों झूठे हैं चित्‌ अर्थात्‌ जीव और अचित्‌ अर्थात्‌ विषय, शरीर, इन्द्रियाँ आदि पाँचों स्थूल भूतोंसे बना हुआ भौतिक जगत्‌ और ब्रह्म ये तीनों यद्यपि भिन्न हैं तथापि चित्‌ अर्थात्‌ जीव और अचित्‌ अर्थात्‌ जड जगत्‌ ये दोनों एक ही ब्रह्मके शरीर हैं; जैसा कि अन्तर्यामी ब्राह्मण (बृह० उप° ३।७) में कहा है कि यह सारा बाह्य जगत्‌ शारीर इत्यादि और जीवात्मा ब्रह्मका शरीर है और वह इनका अन्तर्यामी आत्मा है। इसलिये चित्‌-अचित्‌-विशिष्ट ब्रह्म एक ही है। इस प्रकारसे विशिष्ट रूपसे ब्रह्मको अद्वैत माननेसे यह सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत कहलाता है। इस सिद्धान्तके अनुसार मोक्षमें जीवात्मा ब्रह्माको प्राप्त होकर ब्रह्मके सदुश हो जाता है कि ब्रह्मरूप पुरुषोत्तम, नारायण, वासुदेव और परमेश्वर ब्रह्मके पर्यायवाचक हैं उपर्युक्त सारी बातोंसे सिद्ध होता है कि इस

सम्प्रदायमें सगुण ब्रह्म अर्थात्‌ अपर ब्रह्म-शबल ब्रह्मकी प्राप्ति ही अपना लक्ष्य माना है, जो योगकी सम्प्रज्ञात-समाधिका अन्तिम ध्येय हो सकता है।

--ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीमध्वाचार्यका द्वेत-सिद्धान्त

श्रीरामानुजाचार्यके १८२ वर्ष पश्चात्‌ विक्रमी सं १२५४, तदनुसार ई० सन्‌ ११९७ में श्रमदानन्द तीर्थका, जो मध्वाचार्यके नामसे प्रसिद्ध हैं, जन्म हुआ ८६ वर्षकी अवस्थामें विक्रमी संश १३४०, तदनुसार ई० सन्‌ १२८३ में इनका शरीर-त्याग हुआ इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य 'पूर्णपरज्ञभाष्य' के नामसे प्रसिद्ध है यह द्वैत-सम्प्रदायके प्रवर्तक हुए हैं इनका मत है कि ब्रह्म और जीवको कुछ अंशोंमें एक और कुछ अंशॉमें भिन्न मानना परस्पर विरुद्ध और असम्बद्ध बात है इसलिये दोनोंको सदा भिन्न ही मानना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंमें पूर्ण अथवा आपूर्ण रीतिसे भी एकता नहीं हो सकती लक्ष्मी ब्रह्मकी शक्ति ब्रहाके ही अधीन रहती है; किंतु उससे भिन्न है।

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दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

जि शिश शिश रै 2 शेक शिरे केणे है है 2 है RARAARKRRRARARKRRRRAKAKRAKK RIRRARARRRARAAKRRRARRRKRARARARRARKARRARARAARRAAAAAKAKRARRKK

आर्यसमाजके प्रवर्तक श्रीस्वामी दयानन्दजी महाराजका सिद्धान्त भी द्वैतवाद कहलाता है, किंतु इन दोनोंमें अन्तर यह है कि जहाँ श्रीमध्वाचार्यजीने अधिकतर पुराणोंका आश्रय लिया है वहाँ श्रीस्वामी दयानन्दजीने वेदों, उपनिषदों, वैदिक दर्शनों और प्रामाणिक स्मृतियोंका उसके साथ समन्वय दिखलाया है। श्रीस्वामी दयानन्दका ड्वैतवाद सब वैदिक दर्शनोंके समन्वयके साथ सांख्ययोगका ही सर्वीशमें द्वैतवाद है; किंतु लेखकका यह व्यक्तिगत स्वतन्त्र विचार है कि उन्होंने चैतन्य-तत्त्वका शुद्ध स्वरूप अर्थात्‌ परब्रह्मको दिखलाकर केवल ईश्वर, जीव और प्रकृतिका ही वर्णन किया है; जो इस सृष्टिकी सारी बाह्य रचनामें पाये जा रहे हैं। इस सिद्धान्तके अनुसार पुनरावर्तनीयरूप अपर ब्रह्मकी प्राप्ति ही मुक्तिकी सीमा हो सकती है, जो योगकी सम्प्रज्ञात-समाधिका अन्तिम ध्येय हो सकता है, किंतु स्वामीजीका योगसाधनपर पूरा जोर देने और उसको ही परमात्माकी प्राप्तिका साधन बतलाने तथा पातञ्जलयोगको योगका मुख्य प्रामाणिक ग्रन्थ माननेसे योगकी अन्तिम सीमा असम्प्रज्ञात-समाधि और उसका अन्तिम ध्येय शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थितिरूप कैवल्य भी जाता है। स्वामी दयानन्दजीने ईश्वर, जीव और प्रकृति इन तीनोंका जो विशेषरूपसे वर्णन किया है, इससे सामान्यतया इनका सिद्धान्त त्रैतवाद समझा जाता है; किंतु चेतन-तत्त्वका समष्टि ब्रह्माण्डके सम्बन्धसे ईश्वर नाम है और व्यष्टि-पिण्डोंके सम्बन्धसे जीव ये दोनों चेतन-तत्त्वके शबल अर्थात्‌ मिश्रितरूप हैं। इसलिये लेखकके व्यक्तिगत विचारके अनुसार स्वामी दयानन्दजीका सिद्धान्त द्वैतवाद ही है। स्वामी दयानन्दजीने शुद्ध चेतन-तत्त्व अर्थात्‌ परब्रह्मका वर्णन विरोषरूपसे इस कारण नहीं किया कि उस समयका जनसमूह उसके समझनेमें अयोग्य था और उनका मुख्य उद्देश्य समाज-सुधार और धर्मरक्षा था। स्वामी दयानन्दजीके समयमें हिंदू-समाज और वैदिक धर्म-जैसी विकट परिस्थितिमें मृत्युकी ओर जा रहा था, उसका उदाहरण किसी भी पूर्वाचार्यके समयमें मिल सकेगा स्वामी दयानन्दजीका हिंदू-धर्म और समाजकी निम्न प्रकारकी दुर्दशाको हटाना मुख्य उद्देश्य था--

१. वैदिक धर्मका नाना प्रकारके मत-मतान्तर और सम्प्रदायोंमें विभक्त होकर परस्पर एक-दूसरेका विरोध करना

२. एक ईश्वर-उपासनाके स्थानमें केवल अनेक देवी-देवताओं किंतु भूत, प्रेत, पीर, पैगम्बर, क्रत्र, मजार आदिको सांसारिक कामनाओंके लिये पूजना

३. मूर्तिपूजाका दुरुपयोग और मन्दिर-तीर्थ आदि पवित्र स्थानोंमें नाना प्रकारके दुर्व्यवहार

४. गुण, कर्म, स्वभावको छोड़कर जन्मसे जाति-पाँतिकी व्यवस्था माननेके कारण ऊँची कहलानेवाली जातियोंकी प्रमादके कारण अवनति और नीची कहलानेवाली जातियोंकी उन्नतिके मार्गमें रुकावट, इसका परिणामरूप सारे हिंदू-समाजकी अधोगति

५. स्वयं अपने गुण, कर्म ओर स्वभावको ऊँचा बनानेकी अपेक्षा एक-दूसरेको नीचा, छोटा, झूठा और अपूर्ण बतलाकर अपनेको ऊँचा, बड़ा सचा और पूर्ण सिद्ध करनेकी आसुरी चेष्टा इस प्रकार हिंदुओंमें परस्पर भ्रातृभाव, समानता, आदर और सत्कारका अभाव |

६. ऊँचे सवर्ण कहलानेवाले संकीर्ण-हृदय मनुष्योंका नीची कहलानेबाली निर्धन जातियोंका

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दूसरा प्रकरण ] * घडदर्दानसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा

कै है RRRARARARAARKRRRARRKRRARKRRKK FAAAKRRKRAKKRRK रह फै जै है है है है है है औै और 3.33 हि कै 330 XAKARKAKAAAAARAAAAKRRAKAKARAKK

केवल धार्मिक, सामाजिक और नागरिक अधिकारोंका हरण करना किंतु उनके प्रति पिशाचवत्‌ अत्याचार करके उनको दूसरे मजहबोंके जालमें फँसनेके लिये मजबूर करना

७. बाळ-विवाह, वृद्ध-विवाह आदि नाना प्रकारकी कुरीतियाँ। स्बियोंको शूद्रा बतलाकर उनको जन्म-सिद्ध धार्मिक अधिकारोंसे वञ्चित रखना, विधवाओंके साथ अन्यायपूर्वक दुर्व्यवहार |

८. हिंदुओंके सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रिय, नागरिक और वैयक्तिक आदि सारे अङ्गोमें स्वार्थमय जीवन

९. सार्वभौम वैदिक धर्मको मूर्खता और आज्ञानतासे संकीर्ण करके केवल अन्य मतावलम्बियोंके लिये उसमें प्रवेशका द्वार बंद कर देना किंतु अपनी झूठी स्वार्थ-सिद्धिके लिये अपने वैदिक धर्मी छोटी-छोटी बातोंमें अपनेसे पृथक्‌ करके विधर्मियोंके जालमें फँसनेमें सहायक होना

१०. उपर्युक्त सारे दोषॉसे अनुचित लाभ उठाकर दो विदेशीय मजहबोंका केवल विद्याहीन छोटी जातिवाले गाँवों, पहाड़ों और जंगलोंमें रहनेवाले अनपढ़ हिंदुओंको किंतु नीलकण्ठ-जैसे बड़े-बड़े अँग्रेजी पढ़े हुए विद्ठानोंको पौराणिक कथाओंमें अयुक्ति और दोष दिखलाकर अपने मजहबके जालमें फँसाना

११. राष्ट्रका परतन्त्र होना, विदेशी राजके कारण देशभक्ति, प्राचीन सभ्यता और धर्म-भाषाके प्रति प्रेमका अभाव, दासताके विचार, विदेशी भाषा, संस्कृति और सभ्यताकी ओर प्रवृत्ति इत्यादि-इत्यादि

४--ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीबल्लभाचार्यका शुद्धाङ्वेत- सिद्धान्त

श्रीवल्लभाचार्यका जन्म विक्रमी संवत्‌ १५३६ तदनुसार १४७९ ई० सन्‌में हुआ इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य ““अणुभाष्य” कहलाता हे | उनका मत निर्विशेष-अद्वैत, विशिष्ट-अद्वेत और द्वैत तीनों सिद्धान्तोंसे भिन्न है। यह शंकराचार्यके समान इस बातको नहीं मानते कि जीव ओर ब्रह्म एक हैं ओर मायात्मक जगतूको मिथ्या मानते हैं; बल्कि मायाको ईश्वरकी इच्छासे विभक्त हुई एक शक्ति बतलाते हें माया-अधीन जीवको बिना ईश्वरकी कृपाके मोक्षज्ञान नहीं हो सकता, इसलिये मोक्षका मुख्य साधन ईश्वरभक्ति है मायारहित शुद्ध जीव और परब्रह्म (शुद्ध ब्रह्म) एक वस्तु ही हैं दो नहीं हैं इसलिये इसको शुद्ध-अद्वैत-सम्प्रदाय कहते हैं। इस अंशमें यह सिद्धान्त सांख्ययोगके सदृश है; किंतु पौराणिक रंगमें इसकी दार्शनिकता छिप गयी है

५--ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीनिम्बार्काचार्यका द्वेत-अद्वेत-सिद्धान्त

श्रीनिम्बार्काचार्य लगभग विक्रम सं १२१९ तदनुसार ११६२ ई० सनमें हुए हें इन्होंने 'वेदान्त-पारिजात' नामसे ब्रह्मसूत्रपर भाष्य लिखा है जीव, जगत्‌ और ईश्वरके सम्बन्धमें इनका मत है कि यद्यपि ये तीनों परस्पर भिन्न हैं तथापि जीव और जगतका व्यवहार तथा अस्तित्व ईश्वरकी इच्छापर अवलम्बित है, स्वतन्त्र नहीं है और ईश्वरमें ही जीव और जगतके सूक्ष्म तत्त्व रहते हैं विशिष्ट अद्वेतसे | अलग करनेके लिये इसका नाम ड्रैत-अद्वैत-सम्प्रदाय रखा गया हे

उपर्युक्त सम्प्रदाय शंकरके मायावादको स्वीकृत करके ही उत्पन्न हुए हैं ओर ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिप्रधान हैं | वैष्णवसम्प्रदायसे सम्बन्ध रखते हैं इसलिये जहाँ स्वामी शंकराचार्यका भाष्य उपनिषदोंपर

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दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

जि शिश शेरे शेरे रे फ़ैरे जैर शे शिण किणे जक मोले प्रे रै शेते शेते है है शेते शिरे जै तरै 2 पर जी विरे केळे पैर 0३ परै प़ै है 2 फ़ै हद पर 0 जैज 7 शिते है जैर एट उद प्रे फैर ज़ै है है है जै है 7 उनै हर है परै है कै रै उद उद रै है आजै शर खेडे शे केळ FANN

निर्भर है, वहाँ इन सम्प्रदायोंके भाष्यमें पुराणों और विशेषकर विष्णुपुराणको अधिक उद्धृत किया गया है।

प्रायः ये सब सम्प्रदाय चार प्रकारकी मुक्ति मानते हैं--

(१) सालोक्य मुक्ति--विष्णु अर्थात्‌ ईश्वरके लोकमें निवास करना। (२) सामीप्य मुक्ति--ईश्वरके लोकमें ईश्वरके समीप रहना। (३) सारूप्य मुक्ति--विष्णु अर्थात्‌ इश्वरके समान रूपवाला बन जाना। (४) सायुज्य मुक्ति-विष्णु-लोकमें विष्णुके समान विभूतिको प्राप्त होना। ये मुक्तिकी अवस्थाएँ एक प्रकारसे द्यौ लोक अर्थात्‌ सूक्ष्म जगत्के स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्‌के अन्तर्गत हो सकती हें

ब्रह्मसूत्रपर विज्ञानभिक्षुका भाष्य नये ढंगका 'बिज्ञानामृत' नामसे है; जिसमें श्रुति, स्मृति और दर्शनोंकी एक तात्पर्यमें संगति दिखलायी गयी है, किंतु बह किसी भी साम्प्रदायिकरूपमें नहीं हे

ब्रह्मसूत्रोंमें अन्य वैदिक दर्शनोंका खण्डन नहीं है | ब्रह्मसूत्रोमें किसी वैदिक दर्शनका खण्डन नहीं है; बल्कि श्रीव्यासजीने तो जिन सिन्तोमें अन्य विद्वानोंका उनसे मतभेद था, उनको भी आदरपूर्वक दिखलाया है; किंतु साम्प्रदायिक आचायेनि जहाँ सूत्रोके शब्दोंसे अपने सम्प्रदायके पक्षमें और अपनेसे भिन्न सम्प्रदायोंके विपक्षमें अर्थ निकालनेमें खींचातानी की है, वहाँ प्राचीन तत्त्ववेत्ता ऋषियोंके दर्शनोंको भी जो वेदोंके उपाङ्गरूप हैं, दूषित ठहरानेमें पूरा जोर लगाया है इसी कारण कणाद मुनिप्रणीत वैशेषिक और कपिल मुनिके सांख्यका ब्रह्मसूत्रोंमें खण्डन होनेका भ्रम हुआ है।

'जन्माद्यस्य यतः' (त्रः सू? १। १। २) के अर्थ जो तैत्तिरीय उपनिषदके '“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्‌ विजिज्ञासस्व तद्‌ ब्रह्मेति ।'' के प्रतीकमें है, तीन प्रकारसे हो सकते हैं। १. जगतूकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका अभिन्न उपादान-निमित्तकारण जड-तत्त्व (सांख्यकी प्रकृति, वैशेषिके परमाणु अथवा चार्वाकके चार भूत) है २. जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका अभिन्न-निमित्त-उपादान-कारण चेतन-तत्त्व है ३. जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त-कारण चेतन-तत्त्व अर्थात्‌ आत्मसत्ता और उपादान-कारण जड-तत्त्व (प्रकृति अथवा परमाणु) अनात्मसत्ता है। इस प्रकार मुख्य तीन.वाद अथवा सिद्धान्त हो सकते हैं

१. जड-अद्वैत-वाद (चार्वाकवालोंका जडवाद)

२. चेतन-अद्वैत-वाद (नवीन वेदान्तियोंका अट्वैत-वाद)

३. चेतन जड अर्थात्‌ आत्म-अनात्म द्वैत-वाद (वैदिक दर्शनका द्वैत-वाद) सिद्धान्तरूपमें तो यह द्वैत-वाद है; किंतु व्यवहारदशामें त्रैतवाद हो जाता है अर्थात्‌ (१) ईश्वर (सगुण ब्रह्मन शबल ब्रह्म=अपर ब्रह्म) जो ब्रह्माण्ड अर्थात्‌ समष्टिरूपेण जड-तत्त्वके सम्बन्धसे चेतन-तत्त्व अर्थात्‌ परमात्मसत्ताका नाम है। (२) जीव, जो पिण्ड अर्थात्‌ व्यष्टिरूपेण जड-तत्त्वके सम्बन्धसे चेतन-तत्त्व अर्थात्‌ आत्मसत्ताका नाम है और (३) प्रकृति (जड-तत्त्व) जो अनात्मसत्ता है और केवल कैवल्य-अवस्थामें ही जब द्रष्टाकी

- शुद्ध चैतन्य (परमात्मा=परन्रह्मननिर्गुण ब्रहम=शुद्ध ब्रह्म) स्वरूपमें अवस्थिति होती है, तब उस कैवल्य

(३०)

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय » [ उत्तरमीमांसा

प्राप्त किये हुए जीवकी अपेक्षासे अद्वैत कहा जा सकता है कि सांसारिक जीवोंकी अपेक्षासे यह द्वैतवाद सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक चारों दर्शनोका सिद्धान्त हे दुःखनिवृत्तिके उद्देश्यसे इन प्राचीन दर्शनकारोंने खोज की है दुःख-प्रतीति और उसकी निवृत्तिका प्रयत्न चेतन-तत्त्व (आत्मसत्ता) के अस्तित्वको सिद्ध करता है। इसलिये पहला जड अद्वैतवाद दूषित ठहरता है यदि दुःख चेतन-तत्त्व (आत्मसत्ता) का ही धर्म होता तो उसकी प्रतीति होती और यदि दुःखकी प्रतीति भी आत्माका धर्म माना जाय तो दुःख और उसकी प्रतीति दोनों चेतन-तत्त्व ( आत्मसत्ता) का स्वाभाविक गुण होनेसे उसकी त्रिकालमें भी निवृत्ति असम्भव होती इसलिये दूसरा सिद्धान्त चेतन-अद्वैत-वाद भी इनको संतुष्ट कर सका इसलिये ये तत्त्ववेत्ता ऋषि इसी परिणामपर पहुँचे हैं कि एक तो चेतन-तत्त्व (आत्मसत्ता) है, जो हमारा वास्तविक स्वरूप हे और इससे भिन्न एक कोई दूसरा जडतत्त्व (अनात्मसत्ता) है, जिसके स्वाभाविक धर्म दुःखादि हैं, जिनके हटानेका प्रयत्न किया जाता है इसके अतिरिक्त सिद्धान्त सं तथा सं० के पक्षमें तो कोई श्रुति मिलती है युक्ति और संसारमें कोई उदाहरण; परंतु सिद्धान्त सं० को सारी श्रुतियाँ, स्मृतियाँ, युक्ति और उदाहरण सिद्ध करते हैं। शङ्का--जैसे सुवर्णके आभूषण नाना प्रकारकी आकृति रखते हुए भी सुवर्णरूप ही हैं, जैसे तरंगे, बुलबुले, नदी, तालाब आदि सब जलरूप ही हैं, वैसे ही सारा जगत्‌ केवल एक अद्वितीय ब्रह्मरूप ही है समाधान--ये उदाहरण तो द्वैत-सिद्धान्तकी ही पुष्टि करते हैं; क्योंकि सुवर्णके आभूषणोंके आकारोंमें एक दूसरा तत्त्व आकाश, जलके तरङ्ग-बुलबुले आदिमें वायु ओर नदी-तालाब आदिमें पृथिवी भेदक है शङ्का-- यथोर्णनाभिः सुजते गृह्णते तथाक्षरात्‌ सम्भवतीह विश्चस्‌॥'' (मुः १।१।७) “जिस प्रकार चेतन मकड़ी जड-जन्तुओंकी अभिन्न निमित्त-उपादान-कारण है, इसी प्रकार चेतन ब्रह्म इस जड जगतका अभिन्न निमित्त-उपादान-कारण है ।' इससे चेतन-अद्वैतवाद सिद्ध होता है। समाधान--यह श्रुति द्वैत-सिद्धान्तको ही सिद्ध करती है अर्थात्‌ जिस प्रकार जड-जन्तुकी उत्पत्तिका चेतन मकड़ी निमित्त-कारण है और उसके मुँहका जड लेप उपादान-कारण है, इसी प्रकार जड जगतका उपादान-कारण त्रिगुणात्मक जड प्रकृति है और निमित्त-कारण चेतन ब्रह्म है शङ्का-- सर्व खल्चिदं ब्रह्म'' इस श्रुतिसे केवल एक ब्रह्म (चेतन-तत्त्व) ही सिद्ध होता है समाधान--इससे यह अभिप्राय है कि ब्रह्म (चेतन-सत्ता) ही सारे त्रिगुणात्मक जगतमें व्यापक हो रहा है; जड-सत्ताका अभाव सिद्ध नहीं होता दु यह श्रुति ब्रह्मके शबल, अपर, साकार, सगुण अर्थात्‌ त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे मिले हुए स्वरूपका _ बोध करा रही है कि शुद्ध, पर, निराकार, निर्गुण, प्रकृतिसे सर्वथा निरे हुए केवली स्वरूपका अन्य श्रुतियाँ भी ऐसा ही बताती हैं। यथा-- तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः COC) वह ब्रह्म इस सब (त्रिगुणात्मक जगत्‌) के अंदर है, वह निश्चय ही इस सब (त्रिगुणात्मक जगत्‌) के बाहर है। तथा-- (३१)

i प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

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तत्र चक्षुर्गच्छति वागाच्छति नो मनो विद्यो विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्नुम पूर्वेषां ये नस्तदव्याचचक्षिरे (केन-उ० १। ३)

वहाँ (उस ब्रह्मतक) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नहीं जाती, मन नहीं जाता अतः जिस प्रकार शिष्यको इस ब्रह्मका उपदेश करना चाहिये, वह हम नहीं जानते--वह हमारी समझमें नहीं आता वह विदितसे अन्य ही है तथा अविदितसे भी परे है--ऐसा हमने पूर्व पुरुषॉसे सुना है जिन्होंने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया था। oT येन वागभ्युद्यते तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते (केन-उ° १।४)

जो वाणीसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है, उसीको तू ब्रह्म जान जिस इस (इन्द्रियगोचर त्रिगुणात्मक जगत्‌) की लोग उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है।

यन्मनसा मनुते येनाहुर्मनो मतम्‌। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते आ. (केने-उ० १॥५)

जो मनसे मनन नहीं किया जा सकता बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है, उसीको तू ब्रह्म जान जिस इस (इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत्‌) की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है

यच्चक्षुषा पश्यति येन चक्षूँषि पश्यति तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते EP (केन-उ° १।६) जिसे कोई नेत्रद्वारा नहीं देख सकता वरन्‌ जिसकी सहायतासे नेत्र देखते हैं, उसीको तू ब्रह्म जान जिस इस (इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत्‌) की लोक उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है 02” श्रृणोति येन श्रोत्रमिद श्रुतम्‌ तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते TE (केन-उ० १।७) जो कानसे नहीं सुना जा सकता वरन्‌ जिससे श्रोत्रॉमें सुननेकी शक्ति आती है, उसीको तू ब्रह्म जान जिस इस (इन्द्रियगोचर त्रिगुणात्मक जगत्‌) की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते तदेव ब्रह्म त्वं बिद्धि नेदं यदिदमुपासते (केन-उ° १।८) जो प्राणके द्वारा विषय नहीं किया जा सकता वरन्‌ जिससे प्राण अपने विषयोंकी ओर जाता है, उसीको तू ब्रह्म जान जिस इस (इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत्‌) की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है स्मृति भी ऐसा ही बताती है | यथा-- : यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रवि: क्षेत्रं. क्षेत्री तथा कृत्स्ने प्रकाशयति भारत (गीता १३ ३३)

'हे भारत ! जैसे सूर्य अकेला इस सारे लोकको प्रकाशित करता है वैसे क्षेत्रका मालिक (ब्रह्म)

इस सारे लोक (इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत्‌) को प्रकाशित करता है ।' | (३२)

टची दूसरा प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा

XRRRRRARRRRRKRRRRARRRK RRARRRRRRARRRR RAR RRARRRRAARRARRRRKKKRRRRRRKKARRKKRKRRKAKRRKRN RAKKKRKRKRKKRRRRRKRRAARRRAARRRARKRARRK

श्रीस्वामी शङ्कराचार्यने भी अपने निर्माण षट्कमें इसी बातको सिद्ध किया है। यथा-- ५222 नीखिङ्यहेकारित्तानि नाहं श्रोत्रजिह्ले घाणनेत्रे।

व्योमभूमिर्न तेजो वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्‌

प्राणसंज्ञो वै पञ्च वायुर्न वा सप्त धातुर्न वा पञ्ज कोशः

वाळू पाणिपादं चोपस्थपायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्‌

पैर नहीं है, जननेन्द्रिय और गुदा नहीं है मैं अर्थात्‌ आत्मतत्त्व चिदानन्दरूप है शिव है, शिव' ॥२॥ इसलिये सब दर्शनकारोंका सिद्धान्त जड-चेतन द्वैतवाद है जड-तत्त्व (अनात्मसत्ता) को चेतन-तत्त्त (आत्मसत्ता) से भिन्न करनेके उद्देश्यसे जड-तत्त्वके अवान्तरभेद करण, माप और वर्णनशैलीमें भेद होनेके कारण बाह्यदृष्टि रखनेवालोंको इनमें परस्पर भेद होनेका भ्रम होता है। दार्शनिक दुष्टिकोणसे जानना अपनेसे भिन्न वस्तु जड-तत्त्व (अनात्मसत्ता) का ही हो सकता है अपनेको अर्थात्‌ चेतन-तत्त्व (परमात्मसत्ता) अर्थात्‌ परब्रह्मको जाननेका शब्द प्रयोग करना अयुक्त है यथा 'बिज्ञातारमरे केन विजानीयात” सबके जाननेवाले विज्ञाताको किससे जाना जा सकता है | अर्थात्‌ किसीसे भी नहीं जाना जा सकता है 'येनेदं सर्व विजानाति तं केन विजानीयात' (ब्‌? २।४) जिससे यह सब जाना जाता है, उसको किससे जानें ? सम्प्रज्ञात-समाधिकी सारी भूमियाँ वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता और विवेकख्यातिमें त्रिगुणात्मक प्रकृतिके ही सारे कार्योको साक्षात्‌ करते हुए इनसे आसक्ति हटाकर विरक्त होना होता है असम्प्रज्ञात-समाधिमें कुछ जानना शेष रहनेपर केवल शुद्ध चैतन्यस्वरूप (परमात्म=परब्रह्म) में स्वरूप-अवस्थिति होती है | इसी प्रकार जहाँ-जहाँ परमात्मा अथवा परब्रह्मके जानेका वर्णन आया है जैसे ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।' वहाँ अनात्म ज्ञेय पदार्थोंको (चाहे उन्हे प्रकृति कहो, चाहे माया, चाहे अविद्या और चाहे भ्रम) जानकर “नेति-नेति'' द्वारा पृथक्‌ करते हुए अन्तमें सारे ज्ञेय पदार्थोकी समाप्तिपर शेष जाननेयोग्य कुछ रहनेपर शुद्ध परमात्मस्वरूपमें ही अवस्थिति होती है। यथा-- यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्‌॥ (कठः २।३। १०) जन पाचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके साथ रुक जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टारहित हो जाती है, उसको परमगति अर्थात्‌ परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति कहते हैं इसलिये इन तत्त्ववेत्ता प्राचीन दर्शनकारोंका ऋतम्भरा-प्रज्ञाद्वारा साक्षात्कार परप्रत्यक्ष है, जो शब्द और अनुमानका बीज है अर्थात्‌ जिसके आश्रय शब्द और अनुमान होते हैं (३३)

९२

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

NRKRAARAARARRRARKARRKAARRAARNNAKRRKRAANRKAARARRRNARRRKKARRRARRRRRKARRAARKARRARRKARRKRK रे है हे कै पे 0000 0 के

“श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषयाविदोषार्थत्वात्‌ ।' (योग द० १। ४९) शब्द और अनुमानकी प्रज्ञासे ऋतम्भराप्रज्ञाका विषय अलग है, विशेषरूपसे अर्थका साक्षात्कार करानेसे केवल शब्द और अनुमानका आश्रय लेनेवाले आचार्यो और उनके आधारपर पाश्चात्य

_ विद्वानोंने उनके वास्तविक सारको समझकर इन प्राचीन दर्शनकारोंके कहीं अनीधरवादी और कहीं बहु

ईश्वरवादी होनेका धोखा खाया है।

अब उत्तरमीमांसाके जिन सूत्रोंमें अन्य दर्शनोंके खण्डन होनेका भ्रम हुआ है, उनका स्पष्टीकरण किया जाता है। |

“ईक्षतेर्नाशब्दम्‌ ।' (ब्रह्म १।१।५)

(ईक्षतेः) ईक्षणसे (अशब्दम्‌) शब्द-प्रमाणरहित (न) नहीं है अर्थात्‌ ब्रह्माको जगतूकी उत्पत्ति आदिमें निमित्त-कारण मानना शब्दप्रमाणरहित नहीं है; क्योंकि उसमें यह शब्द प्रमाण हे “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।' उसने ईक्षण किया, मैं बहुत होऊं, प्रजावाला होऊँ

वि० व०--कई साम्प्रदायिक भाष्यकारोंने 'अशब्दम” के अर्थ प्रमाणरहित प्रकृति लगाकर

सांख्यदर्शनका खण्डन किया है, जो सर्वथा अनुचित और अन्यायपूर्ण है; क्योंकि सँहल्यकी त्रिगुणात्मक प्रकृति अनेक श्रुतियों और स्मृतियोंसे प्रमाणित है। यथा--

“मायाँ तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्‌ ।' (श्वेताः ४। १०) “प्रकृतिको माया जानो और महेश्वरको मायावाला ।' “अजामेकां लोहितशुक्ककृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः ।' (श्वेताः | ५)

'एक अजा (अनादि प्रकृति) है जो लाल, श्वेत और काली (रजस्‌, सत्त्व और तमस्‌--इन तीन गुणोंबाली) है वह अपने समान रूपवाली (तीन गुणोंवाली) बहुत-सी प्रजाओंको उत्पन्न कर रही है ।' "महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्‌ पुरुषः पर: ।' (कठ° १।३।११) 'महत्तत्त्वसे परे अव्यक्त (मूलप्रकृति) और अव्यक्तसे परे पुरुष (ब्रह्म) है। निम्न वेद-मन्त्रोमें कितनी उत्तम रीतिसे प्रकृतिका वर्णन किया गया है-- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते तयोरन्यः पिप्पलं स्वाहत्त्यनश्रन्नन्यो अभिचाकशीति समाने वृक्षे पुरुषो निमझोऽनीशया शोचति मुह्यामानः जुष्टं यदा पइ्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः (श्वेताः | ६-७, अ° का सूक्त मन्त्र २०) (पुरुष और पुरुषविशेष अर्थात्‌ जीव और ईश्वररूप) दो पक्षी जो साथ रहनेवाळे और मित्र हैं, वे दोनों एक ही त्रिगुणात्मक प्रकृतिरूप वृक्षको आलिङ्गन किये हुए हैं। उन दोनोंसे एक जीवरूपी पक्षी

. (जन्म, आयु और भोगरूपी सुख-दुःख) स्वादवाले फलको खाता है और दूसरा ईश्वररूपी पक्षी फल

खाता हुआ केवल साक्षीरूपसे रहता है उसी प्रकृतिरूप वृक्षपर जीवरूपी पक्षी आसक्त होकर

असमर्थतासे धोखा खाता हुआ शोक करता है (किंतु) जब योगयुक्त होकर अपने दूसरे

(३४)

महिषासुर मर्दिनी

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा साथी ईश और उसकी महिमाको देखता है, तब शोकसे पार हो जाता है।' इस प्रकृतिरूप वृक्षकी जड़ ऊपरकी ओर है और शाखा. नीचेकी ओर | पृथ्वीमें छिपी हुई उसकी जड़ अव्यक्त मूल प्रकृति गुणोंकी साम्यावस्था है जो अलिङ्ग कहलाती है और प्रत्यक्ष होनेके कारण केवल आगम और अनुमानगम्य है। जिसके सम्बन्धमें कहा गया है गुणानां परमं रूपं दृष्टिपथमृच्छति यत्तु दृष्टिपथं प्राप्त तन्मायैव सुतुच्छकम्‌॥ (वार्षगण्याचार्य षष्टितन्त्र) अर्थ--गुणोंका असली रूप अर्थात्‌ साम्य परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता जो (विषम परिणाम) दृष्टिगोचर होता है वह माया-जैसा है और अविनाशी है दिखलायी देनेवाला वृक्षका आधार तना गुणोंका प्रथम विषम परिणाम व्यक्त महत्तत्त्व लिङ्गमात्र है जो सत्त्व-ही-सत्त्व है। उसमें क्रिया मात्र रज और उस क्रियाको रोकने मात्र तम है, जो कारण जगत्‌, देबयानवाला आदित्यलोक और ओइमके तीसरे पाद साधारण मनुष्योंके लिये सुषुप्ति-अवस्थावाली और योगियोंके लिये अस्मिता अनुगत सम्प्रज्ञात समाधि और विवेक-ख्यातिकी अवस्थाबाली तीसरी मात्रा मकार है | जो आनन्दमय कोश कहलाता है। यही महत्त्व सत्त्वकी विशुद्धताको लिये हुए बिशुद्ध सत्त्वमय चित्त, समष्टि चित्त और ईश्वरका चित्त कहलाता है। जिसमें ईश्वरका जीवोंके प्रति कल्याण करनेका नित्य संकल्प, वेदोंका ज्ञान, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता और सारी शक्तियाँ निरतिशयताको प्राप्त किये हुए विद्यमान हैं और सत्त्वकी विशुद्धताको छोड़े हुए, सत्त्व चित्तजीवोंका चित्त-कारण शरीर कहलाता है, जो संख्यामें अनन्त हैं और सत्त्वचित्तकी अपेक्षा परिच्छिन्न, अल्पज्ञ और अल्पशक्तिवाले हैं। और इनमें जो लेशमात्र तम है उसमें अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशादि केशोंकी जन्मभूमि अविद्या वर्तमान है। यह तम विवेक-ख्यातिकी अबस्थामें अविद्या क्लेशोंके दबनेपर उस वृत्तिको रोकने मात्रका कार्य करता है चेतनतत्त्व-पुरुषका शुद्ध स्वरूप, शुद्ध आत्मतत्त्व=परब्रह्म=शुद्धन्रह्म=परमात्मा जिसकी सन्निधिसे यह विषम परिणाम हो रहा है, उसीके ज्ञानका प्रकाश महत्तत्वके दोनों समष्टि और व्यष्टिरूपोंमे पड़ रहा है महत्त्त्वके ज्ञान-स्वरूप चेतनतत्त्वसे प्रकाशित होनेको गीतामें अतिसुन्दर रान्दोंमें वर्णन किया गया है-- मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्‌। हेतुनानेन कोन्तेय जगद्विपरिवर्तते

(९॥ १०) मम योनिर्महदब्रह्य तस्मिन्‌ गर्भ दधाम्यहम्‌। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत

(९४॥ ३) सर्वयोनिषु कोन्तेय मूर्तयः संभवन्ति या: तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता

+ (१४। ४) (३५)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

RRARARRRARARRRRRARKAKKKRAKK RARKRRARRRKRKKARARRKARAKARRRARRARAAKNKRK NARKRRRARAKARRRARAKRARRKRARKRARKAKK RARRKK HRAKAKNK

अर्थ--हे अर्जुन ! मेरा आश्रय करके प्रकृति चराचरसहित सब जगत्को रचती है इसी कारण जगत्‌ परिवर्तित हो रहा है। हे अर्जुन ! मेरी योनि (गर्भ रखनेका स्थान) महत्तत्त्व है। उसीमें मैं गर्भ रखता हुँ (अपने ज्ञानका प्रकाश डालता हूँ) और उसी (जडचेतनके) संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है। हे अर्जुन ! सब योनियोंमें जो शरीर उत्पन्न होते हैं; उन सबकी योनि महत्तत्त्त है और उनमें बीजको डाळनेवाला मैं (चेतन-तत्त्) पिता हूँ।

चेतनतत्त्वसे प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित समष्टिचित्त, समष्टि अस्मिता और व्यष्टिचित्त, व्यष्टि अस्मिता कहलाते हैं समष्टिचित्तके सम्बन्धसे चेतनतत्त्व ईश्वर-पुरुष विशेष-शबलब्रह्म>साकार ब्रह्म और व्यष्टिचित्तके सम्बन्धसे जीव कहलाता है ईश्वर उपास्य और जीव यहाँपर प्राज्ञरूपसे उपासक है (देखो पातञ्जलयोगप्रदीप समाधिपाद सूत्र २८ का विशेष विचार) यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनेकी है कि पुरुष शब्द तीन अर्थोमें प्रयुक्त होता है पहिला चेतनतत्त्वका शुद्ध स्वरूप अर्थात्‌ परब्रह्म शुद्धन्रह्म= परमात्मा दूसरा समष्टि जगत्के सम्बन्धसे चेतनतत्त्वका शबल स्वरूप अर्थात्‌ ईश्वर-अपरब्रह्म> शबलब्रह्म। और तीसरा व्यष्टि शरीराँके सम्बन्थसे चेतन-तत्त्वका शबल स्वरूप अर्थात्‌ जीवात्मा

इस वृक्षके तनेमें गुणोंका दूसरा विषम परिणाम अविशेषरूप अहंकार है जो विज्ञानमय कोश . कहलाता है और योगियोंके लिये आनन्द अनुगत सम्प्रज्ञात समाधिका स्थान है

अहंकारसे उत्पन्न हुई शाखा गुणोंका तीसरा विषम परिणाम (पाँच तन्मात्राएँ) पाँच सूक्ष्मभूत और मनसहित राक्तिरूप पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये प्राणमय कोश और मनोमय कोश हैं तथा दूसरे विषम परिणाम अहंकार अर्थात्‌ विज्ञानमय कोशको साथ लेकर व्यष्टिरूपसे जीवोंके सूक्ष्म शरीर तथा समष्टिरूपसे सूक्ष्म जगत्=द्यौः लोकन ब्रह्मलोक और पितृयाणवाला चन्द्रलोक=सोमलोक कहलाता है। स्थूलभूतोंसे लेकर तन्मात्राओंतक सूक्ष्मताका जो तारतम्य चला गया है इसीको लेकर इसको पाँच सूक्ष्म लोकों स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यममें विभक्त करके दिखलाया गया है तथा उपनिषदोंमें गन्धर्वलोक, देवलोक, पितरलोक, अजानजदेवलोक, इन्द्रलोक, बृहस्पतिलोक, प्रजापतिलोक और ब्रह्मलोक आदि कई भागोंमें विभक्त करके दिखलाया है जो वास्तवमें सूक्ष्मताकी अवस्थाएँ हैं और जिनका अनुभव योगियोंका विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधिमें होता है। इन सूक्ष्म शरीरोंके सम्बन्धसे जीवकी संज्ञा तैजस, उपासक और समष्टिरूपमें इन सूक्ष्म लोकोंके सम्बन्धसे ईश्वरकी संज्ञा हिरण्यगर्भ उपास्य है। यह ओ३मके दूसरे पादकी उकार मात्रा है जो साधारण मनुष्योंके लिये स्वप्र और योगियोंके लिये सम्प्रज्ञात समाधिकी अवस्था है

अन्तकी पतली शाखाएँ पत्तोंसहित गुणोंका चौथा विषम परिणाम विकृतियाँ अर्थात्‌ पाँच स्थूलभूत और ग्यारह इन्द्रयोंके स्थूलरूप अर्थात्‌ समष्टिरूपमें इसकी शाखाएँ स्थूल जगत्‌ नक्षत्रलोक, भूलोक और भुवःलोक और व्यष्टिरूपमें इसके पत्ते जीवोंके स्थूल शरीर हैं जिनको अन्नमय कोश कहते हैं। यह ओइमके पहले पाद जाग्रत्‌ अवस्थावाली अकार मात्रा है (देखो पातञ्जलयोगप्रदीप समाधिपाद सूत्र २८ का विशेष विचार) स्थूल जगत्‌के सम्बन्धसे ईश्वरकी संज्ञा उपास्य विराट और जीवकी संज्ञा उपासक विश्व है। यहाँ यह ध्यानमें रखनेकी है कि भूः और भुवः दोनों स्थूल जात. अर्थात,

३६

दूसरा प्रकरण ] * घड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा

FARRARRARRRAARRAKRARAARRKKRARKRKRAKRKRRKKK FAARARRRRKRRKRKKKK AAARAAAKK

नक्षत्रलोकमें हैं हमको अपनी पृथ्वीका विशेषरूपसे वर्णन करना होता है इसलिये इसको अलग भूः

नामसे पुकारते हैं। दूसरे नक्षत्रवाले हमारी पृथ्वीको भुवःमें शामिल करके अपने लोकको भूः कहेंगे

व्यष्टिरूपसे स्थूल झारीरके अंदर सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म शरीरके अंदर कारण शारीर व्यापक हो रहा है. गो स्थूल जगत्के अंदर सूक्ष्म जगत्‌ और सूक्ष्म जगतूके अन्दर कारण जगत्‌ व्यापक हो ' रहा है।

इस वृक्षका फल जन्म, आयु और भोग है। उसका स्वाद सुख और दुःख है, जिसको जीवरूपी पक्षी चखता रहता है

जीवरूपी पक्षीकी असमर्थतासे धोखा खाना क्रमशः अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, छश, उनसे पाप-पुण्यरूपी सकाम कर्म, सकामकर्मसे कर्माशय, कर्माशयसे जन्म, आयु और भोगके लिये स्थूल शरीररूपी अनन्त, अस्थिर पत्तोंमें घूमना है

योगयुक्त होकर जीवरूपी पक्षीका ईश्वररूपी पक्षी और उसकी महिमाको देखना योगके अङ्गोंका अनुष्ठान तथा ईश्वरप्रणिधान है, जिसका वर्णन योगदर्शन साधनपाद सूत्र ३२ में तथा समाधिपादके सूत्र २३ से २८ तक किया गया है।

“आत्मा ज्ञातव्यः प्रकृतितः विवेक्तव्यः पुनः आवर्तते?

“आत्माको जानना चाहिये, प्रकृतिसे भिन्न उसका विवेक करना चाहिये, वह पुनः नहीं लोटता है ।'

“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वज्ञाः ।' (गीता २७) “सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्रार किये हुए हैं।' “मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्‌ ।' (गीता १०)

'हे कौन्तेय ! मेरी (ईश्वरकी) अध्यक्षताके रहते हुए प्रकृति चराचर जगतको उत्पन्न करती है ।' प्रकृत्यैव कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स॒ पझ्यति (गीता १३। २९) “जो पुरुष समस्त कर्मोको सब प्रकारसे प्रकृतिसे ही किये हुए देखता है तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही तत्त्वज्ञानी है ।' सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः निबध्चन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ (गीता १४ ५) “हे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम- यै प्रकृतिसे उत्पन्न हुए तीनों गुण अविनाशी आत्माको (अविवेकसे) शरीरमें बाँधते हें ।' प्रकृति पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌ (गीता १३। १९) “प्रकृति और पुरुष--इन दोनोंको ही तू अनादि जान और विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोको भी प्रकृतिसे उत्पन्न हुए जान ।' जब स्वयं व्यासजी महाराज अपने स्वरचित गीतामें इस प्रकार प्रकृतिका स्पष्टरूपसे वर्णन. कर रहे हैं तो इन्हीके सूत्रॉमें “अशब्दम्‌” के अर्थ 'प्रमाणरहित' प्रकृति निकालना कितना घोर पक्षपात और (३७)

दूसरा प्रकरण] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमासा

जि है हद कै है शि जद हर शे शिक केणे NRNRARRARRRRKRRARRRKNKARRRARRRARK XRARKKRARRRRKKKRRRK RAARARAARRARRKRRK FARKRKAKKKK NA *

अत्याचार है। यह पाठक स्वयं समझ सकते हैं। श्रुति और स्मृतिद्वारा तो सांख्य और योग ही प्राचीन वेदान्त और ब्रह्मप्राप्तिका साधन सिद्ध होता है। यथा-- [ "तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥' (श्वेता ६। १३) “उस देवको--जो जगतकी उत्पत्ति आदिका निमित्त कारण है और जो सांख्ययोगद्वारा ही जाना जा सकता है--जानकर मनुष्य सारे फाँसोंसे छूट जाता है।' लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌ iF (गीता ३।३) “हे निष्पाप अर्जुन ! इस मनुष्य-लोकमें मैंने पुरातन कालमें (कपिल मुनि और हिरण्यगर्भरूपसे) दो निष्ठाएँ बतलायी हैं। (कपिलमुनिद्वारा बतलायी हुई) सांख्ययोगकी निष्ठा ज्ञानयोगसे होती है और (हिरण्यगर्भरूपसे बतलायी हुई) योगियोंकी निष्ठा निष्काम कर्मयोगसे ।' सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः उच्यते हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः (मः भाः) “सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल हैं और योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं इनसे पुरातन इनका वक्ता और कोई नहीं है ।' ज्ञानं महद्‌ यद्धि महत्सु राजन्‌ वेदेषु सांख्येषु तथैव योगे यच्चापि दुष्टं विविध पुराणे सांख्यागतं तन्निखिलं नरेन्द्र (महाभारत, शान्तिपर्व) हे नरेन्द्र ! जो महत्‌ ज्ञान महान्‌ व्यक्तियोंमें वेदोंके भीतर तथा योगशास्त्रोमें देखा जाता है और पुराणमें भी विविध रूपोंमें पाया जाता है, वह सभी सांख्यसे आया है।' “इस प्रकार श्रीव्यासजी महाराजने स्वरचित गीता ओर महाभारतमें कपिल ऋषिके सांख्यकी महिमा बतलायी है। केवल कपिल मुनिका सांख्य और उसकी प्रकृति ही श्रुतियों और स्मृतियोंसे प्रमाणित है, किन्तु कपिल मुनिको ऋषियोंमें सर्वोच और श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। यथा--

“ऋषिप्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानेर्बिभर्ति ।' द) “जो पहिले उत्पन्न हुए कपिल मुनिको ज्ञानसे भर देता है।'

“सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥' (गीता १० २६) 'सिद्धोमें में कपिल मुनि हूँ |

श्रीगौड़पांदांचार्यजीने भी सांख्यके २५ तत्त्वोंके ज्ञानद्वारा-मुक्तिका होना बतलाया हे यथा-- (३८) | £

दूसरा प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसेत्‌। जटी मुण्डी शिखी वापि मुच्यते नात्र संशय:

'जिसको (सांख्यमें बतलाये हुए) २५ तत्तवोंका ज्ञान हो गया है, वह चाहे किसी आश्रममें स्थित हो, चाहे वह गृहस्थ हो, चाहे संन्यासी हो, बह अवश्य मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।”

उपर्युक्त प्रमाणोंसे पूर्णतया सिद्ध होता है कि श्रीव्यासजीका ' अशब्दम्‌’ से प्रकृतिको प्रमाणरहित सिद्ध करना अभिप्राय कदापि नहीं हो सकता

“अशब्दम्‌' को अव्यक्त’ मूलप्रकृति अथवा मायावादियोंकी “अनिर्वचनीय” मायाका पर्यायवाचक मान लेनेपर भी (यद्यपि श्रीव्यासजीको मायावादका सिद्धान्त किसी सूत्रमें भी अभिमत नहीं है) सांख्यके साथ समन्वयमें ही सूत्रके अर्थ होते हैं कि निराकरणं (खण्डन) में अर्थात्‌ सांख्यकी अव्यक्त मूलप्रकृति अथवा मायावादियोंकी अनिर्वचनीय माया जगतूकी उत्पत्ति आदिका निमित्तकारण नहीं हो

सकती वह केवल उपादानकारण हो सकती है; क्योंकि 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति’ द्वारा चेतन ब्रह्म _ ही जगतूकी उत्पत्ति आदिका निमित्त कारण हो सकता है।

इसी अध्यायके चौथे पादके सूत्रोंक अर्थ भी इन आचायेनि प्रकृतिके अप्रामाणिक सिद्ध करने और साँख्यके निराकरणमें निकालनेका यत्न किया है। इसलिये इनका भी संक्षेपसे स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक प्रतीत होता है।

आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्द्शयति (ब्रह्मसूत्र १)

(एकेषाम्‌) कई शाखावालोंकी शाखाओमें (आनुमानिकम्‌) आगम और अनुमानगम्य स्वतन्त्र प्रकृतिका भी वर्णन पाया जाता है।

यथा-- महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्‌ पुरुषः परः ।'

महत्तत्त्वसे परे अव्यक्त (मूल प्रकृति) है और उससे परे पुरुष है (इति चेत) यदि ऐसा कहो तो (न) यह ठीक नहीं है; क्योंकि (शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः) शारीरके तौरपर रूपकसे बतलायी हुईका ग्रहण होनेसे अर्थात्‌ जिस प्रकार शरीर आत्माके अधीन है इसी प्रकार प्रकृतिको ब्रह्मके अधीन बतलाया गया है। (दर्शयति च) और श्रुतिवाकूसे भी ऐसा ही पाया जाता है

यथा-'आत्मानं रथिनं विद्धि शारीरं रथमेव तु।'

‘आत्माको रथका स्वामी जाने और शरीरको रथ ।'

वि व°--योगियोंको केवल तीनों गुणोंके प्रथम विषम परिणाम महत्तत्वतक ही समाधिद्वारा साक्षात्कार हो सकता है। उससे उसके कारण आगमगम्य गुणोंकी साम्य अवस्था “मूल प्रकृति' का अनुमान किया जाता है इसलिये गुणोंकी साम्य अवस्था मूल प्रकृतिको आगम और अनुमानगम्य कहा जाता है। |

“सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात्‌।' (ब्रह्मसू० १।४।२)

(३९)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

शिशिर शि रि हरे है 0 रै १३ पर परै पर 2 3 पै पट रै परे परे पर उद ति शिश शिश परै जद पर 0 7 पै हुए 7 7 2 0 7 2 है कै है प्र पर तरै है है 0 है 7 2 हरे हु हुए जैर है 7 फ़ैै फ़ैर 7 तरै हर है हरे जै है परै है हर एरा 9५ उद है रै है 7 जे हरे 7 है रे परै 1 पद 2 9: Rik **

पदार्थ:--(तु) किंतु (तत्‌) वह प्रकृति इसी स्थूल जगत्का (सूक्ष्म) सूक्ष्मतत्त्व है (अर्हत्वात्‌) योग्य होनेसे अर्थात्‌ सृष्टिका सूक्ष्मतत्त्व ही अव्यक्त शब्दके योग्य है जिस प्रकार वृक्ष अपने बीजमें अव्यक्तरूपसे स्थित रहता है, इसी प्रकार यह सृष्टि अपने बीज सूक्ष्मतत्त्वमें अव्यक्तरूपसे स्थित रहती है तदधीनत्वादर्थवत्‌ (ब्रह्मसू० १।४।३) (तदधीनत्वात्‌) उपर्युक्त प्रकृतिका ईश्वरके अधीन होनेसे और जगतूकी उत्पत्ति आदिमें ईश्वरके सहायक होनेसे (अर्थवत) सार्थक अर्थात्‌ प्रयोजनवाला होना सिद्ध होता है प्रकृतिका मुख्य प्रयोजन पुरुषका भोग और अपवर्ग है | यथा-- प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दूश्यम्‌ ।' (यो० द° २। १८) “प्रकाश क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और इन्द्रिय जिसका स्वरूप है, भोग और अपवर्ग जिसका प्रयोजन है, वह दुझ्य है ।' ज्ञेयत्वावचनाच्च (न्रह्मसूर १।४।४) (ज्ञेयत्वावचनात्‌) ज्ञेयताके कहे जानेसे भी प्रकृति स्वतन्त्र नहीं है, ब्रह्माधीन ही है अर्थात्‌ पुरुषका अन्तिम ध्येय प्रकृतिकी प्राप्ति नहीं, बल्कि ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी गयी हे (च) इसलिये भी प्रकृति ईश्वरके अधीन ही सिद्ध होती है, कि उससे स्वतन्त्र वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात्‌। (ब्रह्मसू० १।४। ५) (चेत्‌) यदि (इति) ऐसा कहो कि (बदति) श्रुति अव्यक्त मूल प्रकृतिको भी ज्ञेय बतलाती है यथा अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्‌। अनाद्यनन्तं महतः परं धुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते (कठ० १५) “वह जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धसे शून्य अव्यय है, नित्य है, अनादि-अनन्त है, महत्तत्त्वसे परे है, अटल है, उसको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है।' (न) तो यह ठीक नहीं है (हि) क्योंकि (प्रकरणात्‌) प्रकरणसे यहाँ (प्राज्ञः) चेतन है अर्थात्‌ यहाँ चेतन ब्रह्मका प्रकरण ऊपरसे चला रहा है कि जड प्रकृतिका “त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ।' (जज ९९ हे) (च) और (एवम) इस प्रकार (त्रयाणाम्‌) तीन पदार्थोका (एव) ही (उपन्यासः) वर्णन-उत्तर (च) और (प्रश्नः) प्रश्न भी है। इसलिये यहाँ अव्यक्त मूल प्रकृतिका प्रसङ्गसे वर्णन है कि मुख्यतया ज्ञेय होनेसे अर्थात्‌ मृत्यु और नचिकेताके संवादमें नचिकेताके तीन ही प्रश्न है अग्नि, जीवात्मा और परमात्मा उनके तीन ही उत्तर हैं | तीसरे परमात्मतरिषयक प्रश्नका यह उत्तर है; जो 'अशब्दमस्पर्शम' इत्यादि वचनमें दिया गया है। प्रधान अथवा प्रकृतिविषयक तो प्रश्न है और उत्तर ही। इसलिये इस वचनमें - (४०)

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0000 00 नि RK * LISSA nA ARRANAA 202२010 00 0 अमन

प्रधान या प्रकृतिके कारणवादकी शङ्का नहीं हो सकती महद्दद्च

( महदवत्‌) महत्‌ शब्दके समान (च) भी | अर्थात्‌ “महान्तं विभुमात्मानम्‌' (कठः

(ब्रह्मसूर १।४ | ७) त्‌ जैसे महत्‌ शब्द महत्तत्त्वका वाचक है, परंतु २। २२) में आया हुआ महत्‌ शब्द महत्तत्त्वका वाचक नहीं है, इसी

प्रकार अव्यक्त आदि पद भी अपने प्रकरणमें प्रकृतिवाचक हें परमात्माके प्रकरणमें उनको प्रकतिवाचक मानकर अर्थ करना ठीक नहीं है चमसवदविशेषात्‌ (न्रह्मसू? १।४।८) (अविशेषात्‌) विशेषके कहनेसे (चमसवत्‌) चमसके समान जैसे चमस नाम चमसेका है और बृह० २।२।३ में चमसका लक्षण इस प्रकार किया है। 'अर्वाग्बिलश्‌ चमस ऊर्ध्वबुश्चः' अर्थात्‌ जिसमें नीचे बिल हो और ऊपर बुध्न पेंदा हो, वह चमस कहलाता है | चमसके इस लक्षणसे जहाँ पर्वतकी गुहामें अथवा अन्यत्र कहीं नीचे बिल और ऊपर बुष्न अर्थात्‌ पेंदा हो तो उसको चमस नहीं कह सकते इसी प्रकार अव्यक्तका अर्थ इन्द्रियातीत होनेसे मूल प्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं, किंतु परमात्मप्रकरणमें आये हुए ऐसे शब्दोंसे मूल प्रकृतिका ग्रहण नहीं किया जा सकता प्रकरणानुसार परमात्माके ही अर्थ हो सकते हैं। ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके (नरह्मसू १।४।९) (ज्योतिरुपक्रमा) आरम्भ जिसका ज्योति है (तु) निश्चय करके (एके) कई आचार्य (तथा हि) वैसा ही (अधीयते) पाठ करते हैं अजामेकां लोहितशुङ्ककृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः अजो ह्योको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः (शवेताः ४। ५) यहाँ जीवात्मा, ईश्वर और प्रकृति तीनोंको अज=अजन्मा अर्थात्‌ अनादि कहा है | तो क्या कहीं अज विशेषणसे जीवात्माके प्रकरणमें ईश्वरका तथा ईश्वरके प्रकरणमें प्रकृतिका ग्रहण कोई कर सकता है ?. नहीं, क्योंकि कई आचार्योने अपने पाठमें ज्योतिसे उपक्रम अर्थात्‌ आरम्भ करके स्पष्ट पढ़ा है। जैसे कि छान्दोग्यः में तेज, अप्‌ और अन्नका स्वरूप स्पष्ट करनेको कहा है कि “यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्‌ रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्य’ अग्निकी लपटमें लाल रंग तेजस्‌-तत्त्वका, श्वेत अप-तत्त्वका और काला अन्नका रूप है इसीको सत्त्व, रज, तमका शुक्र, रक्त,कृष्णरूप मानकर त्रिगुणात्मक-प्रकृतिका वर्णन अजामेकां लोहित°' इत्यादि वाक्यमें हो जाता है अजा शब्दके प्रयोगमात्रसे प्रकृतिको स्वतन्त्र जगतका कारण नहीं माना जा सकता। कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः (ब्रह्मसू० १।४। १०) (कल्पनोपदेशात्‌) कल्पनापूर्वक उपदेश होनेसे (च) भी (मध्वादिवत्‌) मधु आदि कल्पित उपदेशके समान (अविरोधः) विरोध नहीं है। अर्थात्‌ इन तीनोंके विषयमें “अजा' शब्द आकृति-निमित्तक है, यौगिक है; किंतु. कल्पनासे यह उपदेश है अर्थात्‌ तेज, जल, अन्न (रज, सत्त्व, तम) रूप प्रकृतिको अजा कल्पना किया गया है। जैसे कोई बकरी लोहितशुक्कृष्णा हो और ९) |

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

RNRRRARAAAKKRRKRARRARRRRARARRKK XXAKARARRARRKRRARKRARKARKKRARRRAAKAARAKK RAKKRRRARARRRRRKARAAKARKAKRKKNK डी. नि

अपने-जैसी बहुत-सी संतानवाली हो, कोई अज (बकरा) इसके भोगमें आसक्त हो, कोई भोग रहा हो इस प्रकारकी वह है यह ऐसी कल्पना है जैसे छान्दोग्यः में आदित्यको जो मिठाई नहीं है मधु (शहद) कल्पना किया है तथा बृह० ५। में वाणीको जो गौ नहीं है धेनुरूपकमें कहा है

संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च (बहासू० १1४ ११)

(नानाभावात्‌) अनेक होनेसे(च) और (अतिरेकात्‌) बच रहनेके कारण (संख्योपसंग्रहात) संख्याके साथ कथन करनेसे (अपि) भी (न) नहीं कह सकते [कि प्रकृति स्वतन्त्र कर्ता है]

जिस परमात्मारूप आधारमें प्रकृति रहती है, उसी आधारमें कहीं एक प्रकृतिके बदले अन्य पाँच संख्यावाले पदार्थोकी भी स्थिति कही गयी है इससे एक प्रकृतिके बदले पाँच संख्याके उपसंग्रहसे विरोध आयेगा इसका उत्तर यह है कि यह विरोध नहीं है; क्योंकि (नानाभावात्‌) एक प्रकृतिके अनेक हो जानेसे अनेक कथन करना विरुद्ध नहीं है तथा पाँच संख्या भी अटल नहीं है

यस्मिन्‌ पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्‌ ब्रह्मामृतोऽमृतम्‌॥ (बृह ४।४। १७)

'जिसमें पाँच पञ्चजन और आकाश ठहरा हुआ है, उसीको मैं आत्मा , ब्रह्म, अमृत मानता हूँ उसको जानकर मैं अमृत हुआ हूँ।'

इसमें पञ्चजन शब्दसे पाँच मनुष्य नहीं लेना है; किंतु अगले सूत्रमें बतलायेंगे कि प्राण, चक्षु, श्रोत्र, अन्न और मन- इन पाँचको यहाँ पञ्चजन कहा है परंतु पञ्च पञ्चजन कहनेसे भी आधेयरूपसे पाँच ही पदार्थोको नहीं कहा; किंतु [अतिरेकात्‌] आत्मा और आकाश भी पाँचके अतिरिक्त पढ़े हैं तथा एक प्रकृतिके नानारूप होनेसे एकके पाँच कहना भी विरुद्ध नहीं है

संगति--तो फिर 'पञ्चजनाः' से क्या अभिप्रेत है ? उत्तर

प्राणादयो वाक्यशेषात्‌ (हासू १।४।१२)

(प्राणादयः) पाँच पञ्चजन यहाँ प्राणादि पाँच हैं (वाक्यशेषात्‌) क्योंकि वाक्यरेषमें उनका ग्रहण है “यस्मिन्‌ पञ्च पञ्चजनाः” से उत्तरवाक्यमें ब्रह्मका स्वरूप निरूपण करनेके लिये प्राणादि पाँच कहे हैं

“प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः'

(बुह० १८)

जो प्राणके प्राण, नेत्रके नेत्र, श्रोत्रके श्रोत्र, अन्नके अन्न और मनके मनको जानते हैं' इस वाक्यरोषसे १. प्राण, २. चक्षु, ३. श्रोत्र, ४. अन्न, ५. मन- इन पाँचका नाम पूर्वोक्त वाक्यमें पञ्चजन है।

संगति--यंदि यह कहो कि जिनके पाठमें अन्नकी गणना नहीं है, उनके पाठमें पञ्चजन किससे पूरे होंगे ? तो इसका उत्तर अगले सूत्रमें देते हैं। |

ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने (तेर

(एकेषाम्‌) कई शाखाओंके (अन्ने) अन्न पद (असति) होनेपर (ज्योतिषा) ज्योति पदसे पाँचकी संख्या पूरी की जाती है।

(४२)

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय + [ उत्तरमीमांसा अर्थात्‌ 'प्राणस्य प्राणम्‌' इत्यादि पूर्वोक्त माध्यन्दिन पाठमें तो प्राणादि पाँच पढे हैं पर-- 'धाणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः ।' (बृह | १८) इस काण्व पाठमें अन्न नहीं पढ़ा है। इनकी पाँच संख्या ('ज्योतिषां ज्योतिः’ ४। १६) इस पूर्वशलोकमें पठित ज्योतिसे पूरी करनी चाहिये इन साम्प्रदायिक भाष्योंमें दूसरे अध्यायके प्रथम दो पादोंके लगभग सभी सूत्रोंके अर्थ सांख्य, योग और वैशेषिके खण्डनमें लगाये गये हैं। जो वास्तवमें उनके साथ समन्वयमें हैं इस बातको दर्शानेके

उद्देश्यसे यहाँ दूसरे पादके प्रथम दस सूत्रोंको उनके पदार्थसहित उद्धृत कर देना षड्दर्शनसमन्वयके इस छोटेसे प्रकरणके लिये स्थालीषुलाकन्यायसे पर्याप्त होगा

रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्‌ पदच्छेदः-रचनानुपपत्तेः, च, न, अनुमानम्‌। (च) पहले पादमें शाब्दप्रमाणसे सिद्ध कर आये हैं कि जड प्रकृति जगतका निमित्तकारण नहीं हो सकती, वह केवल उपादानकारण है, निमित्तकारण चेतन ब्रह्म है और अब उसी बातको यहाँ युक्तिसे सिद्ध करते हैं। (रचनानुपपत्तेः) वर्तमान सृष्टिकी सयुक्तिक रचनाके असिद्ध होनेसे (अनुमानम्‌) आगम और अनुमानसिद्ध प्रकृति (न) अचेतन होनेसे जगतका निमित्तकारण नहीं हो सकती बह केवल उपादानकारण है जगतका निमित्तकारण चेतन होनेसे केवल ब्रह्म ही हो सकता है प्रवृत्तेश्च (न्रह्मसूः २।२।२) पदच्छेदः प्रवृत्तेः, (च) और (प्रवृत्तेः) अप्रवृत्त जड प्रकृति बिना किसी चेतन निमित्तकारणके स्वयं प्रवृत्त भी नहीं हो सकती पयोऽम्बुवक्चेत्तत्रापि (ब्रह्मसू० २।२।३) पदच्छेदः -पयोऽम्बुवत्‌, चेत्‌, तत्र, अपि पदार्थ-- (चेत्‌) यदि यह कहा जाय कि (पयोऽम्बुबत्‌) दूध और जलके सदुश जड प्रकृतिकी स्वतः प्रवृत्ति होती है तो (तत्र, अपि) वहाँ भी जड प्रवृत्ति गाय और बछडे आदि चेतनके अधीन ही होती हैं व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात्‌ (नरह्मसूश २।२।४) पदच्छेदः-व्यतिरेकानवस्थितेः, च, अनपेक्षत्वात्‌ (व्यतिरेकानवस्थितेः) प्रकृतिके पृथग्भावसे अवस्थित होनेसे (च) -और (अनपेक्षत्वात्‌) अपेक्षारहित होनेसे भी प्रकृति नहीं; किंतु ब्रह्म ही जगतका निमित्तकारण हो सकता है। अन्यत्राभावाच्च तृणादिवत्‌। ` - (ब्रह्मसू० २।२। ५) पदच्छेद:--अन्यत्राभावात्‌, च, न॑, तृणादिवत्‌ (तृणादिवत्‌) जिस प्रकार गौके पेटमें जाकर जड तूणादि स्वभावसे ही दूध बन जाते हैं इसी प्रकार जड प्रकृतिकी स्वतः प्रवृत्ति हो सकती है ? उत्तर (न) नहीं हो सकती; क्योंकि (अन्यत्र अभावात्‌) (४३)

(ब्रह्मसूश २।२।१)

दूसरा प्रकरण ] , * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमासा

0000 हु जै जौ और जैर एफ फै कै है कै और कर रे और कै जज फै फै कै कै है कै कै है है औै पर जज जज और और कै जैज जै जै कै जहर डक फेज कफ है और कर जे तिला x

गौसे अतिरिक्त बैल आदिके पेटमें तृणादि दूध नहीं बनते हैं इसलिये इस प्रवृत्तिका निमित्तकारण चेतन गौ है अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात्‌। (न्नः सू. २।२।६) पदच्छेदः अभ्युपगमे, अपि, अर्थाभावात्‌

(अभ्युपगमे, अपि) यदि प्रकृतिमें बिना किसी चेतनके स्वतः प्रवृत्ति मान भी ली जाय तो भी (अर्थाभावात्‌) सृष्टि बनानेमें जड प्रकृतिका कोई प्रयोजन नहीं हो सकता

पुरुषाइमवदिति चेत्तथापि (न्नः सू. २।२।७)

पदच्छेदः-पुरुषाइमवत्‌, इति, चेत्‌, तथापि

(पुरुषाशमवत्‌) जिस प्रकार अन्धा किसीसे पूछकर मार्ग चल सकता है या लोहेमें चुम्बककी समीपतासे गति जाती है, उसी प्रकार अचेतन प्रकृति स्वतः जगत्को रच सकती है (इति चेत्‌) यदि ऐसा मानो (तथापि) तो भी ठीक नहीं है; क्योंकि अन्धोंको मार्ग दिखलानेबाले और लोहेको चुम्बककी अपेक्षा होती है, इसी प्रकार जड प्रकृतिको प्रवृत्त करानेमें किसी चेतनकी अपेक्षा होगी !

अङ्कित्वानुपपत्तेश्च (न्नः सू. २।१।८)

पदच्छेदः ङ्गित्वानुपपत्तेः,

(च) और (अङ्भित्वानुपपत्तेः) प्रकृतिके तीन गुण सत्त्व, रजस्‌ और तमस्‌ जड होनेके कारण बिना किसी चेतनके स्वयं अङ्ग ओर अङ्गीभावसे प्रवृत्त नहीं हो सकते, इसलिये उनमें इस क्षोभका निमित्तकारण चेतन ब्रह्म ही हो सकता हे

अन्यथानुमितो च, ज्ञशक्तिवियोगात्‌ (न्नः सूः २।२। ९)

पदच्छेदः-अन्यथा, अनुमितो, ज्ञशक्तिवियोगात्‌

(अन्यथा) अन्य प्रकारसे (अनुमितो) अनुमान करनेमें (च) भी (ज्ञशक्तिवियोगात्‌) चेतनराक्तिके वियोग होनेसे यदि प्रकृतिके तीनों गुणोंका स्वभाव अन्यथा अर्थात्‌ कभी संयोग और कभी वियोग भी अनुमान कर लिया जाय तो भी उनके ज्ञानरहित होनेके कारण बिना किसी चेतनके उनमें ज्ञानपूर्वक क्रिया हो सकेगी, इसलिये चेतन ब्रह्म ही जगत्की उत्पत्ति आदिमें निमित्तकारण है

विप्रतिषेधाद्चासमञ्जसम्‌ (न्नः सूः २।२।१०)

पदच्छेदः विप्रतिषेधात्‌, च, असमञ्जसम्‌।

(विप्रतिषेधात्‌) परस्पर विरोधसे (च) भी (असमञ्जसम्‌) अनियमितता होती है

बिना चेतन ब्रह्मके अस्तित्वको माने हुए तीनों गुणोंके परस्पर विरुद्ध उत्पादन और नाशन धर्म मान लेनेसे भी अनियमिकता होती हे

इसी प्रकार ग्यारहसे सत्रहतक सात सूत्र वैशेषिकके साथ समन्वयमें हैं; कि श्रीकणाद मुनिको नास्तिक सिद्ध करके उनके दर्शनके निराकरणमें इस पादके अन्तके चार सूत्रे सांख्य और बैशेषिकको सेश्वर मानकर भी इन भाष्यकारों्रारा इन दर्शनोंको दूषित ठहरानेका प्रयत्न किया गया है। जिसका मूल सूत्रोमे नाम-निशान भी नहीं है ब्रह्मसूत्र १।३ में 'योग' शब्द देखकर कई साम्प्रदायिक आचायोति

(४४)

दूसरा प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा इस सूत्रका अर्थ योगके निराकरणमें छगानेका यत्न किया है इस भ्रान्तिको मिटानेके लिये दूसरे अध्यायके पहले पादके प्रथम तीन सूत्रोंको उनके सरल और स्पष्ट अर्थसहित उद्धृत कर देना आवश्यक हे स्पृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकारदोषघ्रसङ्कात्‌। (ब्रः सू. २।१। १) (चेत्‌) यदि (इति) ऐसा कहा जाय कि (स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गः ) स्मृतिके अनवकाशरूप दोष अर्थात्‌ असंगतिका प्रसङ्ग होगा तो (न) नहीं; क्योंकि ( अन्यस्मृत्यनवकारदोषप्रसङ्गात्‌) अन्य स्मृतियोंके अनवकाशरूप दोषका प्रसङ्ग होगा यहाँ सूत्रके पूर्वार्धमें यह शङ्का उठायी गयी है कि यदि ब्रह्माको निमित्तकारण माना जाय और प्रकृतिको उसके अधीन उपादानकारण, तो किसी-किसी स्मृतिमें जो केवल प्रकृतिको स्वतन्त्र उपादानकारण माना है, उन स्मृतियोंका अनवकाइरूप दोष होगा | यथा-- इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविरोषभ्ूतपर्यन्तः प्रतिपुरुषविमो क्षार्थ स्वार्थ इव परार्थ आरम्भः (सांख्यकारिका ५६) 'इस प्रकार यह प्रकृतिसे किया हुआ महत्तत्त्वसे लेकर विशेष अर्थात्‌ स्थूल भूतोंतकका आरम्भ प्रत्येक पुरुषके मोक्षके लिये स्वार्थकी तरह परार्थ है ।' अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके (गीता १८) “सम्पूर्णं विश्वमात्र भूतगण ब्रह्माके दिनके प्रवेशकालमें अव्यक्त (मूळ प्रकृति) से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्माकी रात्रिके प्रवेशकालमें उस अव्यक्त नामक मूल प्रकृतिमें ही लय होते हैं ।' प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः (गीता ३। २७) ` (वास्तवमें) सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं।' सूत्रके उत्रार्धमें इस शङ्काका यह समाधान किया गया है कि यदि इन स्मृतियोंके अनवकारदोषका डर है तो अन्य स्मृतियोंमें जहाँ ब्रह्मको निमित्तकारण और प्रकृतिको तदधीन उपादानकारण बतलाया गया है उनको भी तो अनवकाइादोषकी प्राप्ति होगी यथा-- निरिच्छे संस्थिते रल्ले यथा लोहः प्रवर्तते सत्तामात्रेण देवेन तथा चायं जगज्जनः॥ (साः प्रवचन-भाष्य ९६) 'जैसे बिना इच्छावाले चुम्बकके स्थित रहनेमात्रमें लोहा गतिशील होता है, वैसे ही सत्तामात्र ब्रह्मसे जगतूकी उत्पत्ति आदि होती है।' मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्‌ MS हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते (गीता | १०) हे अर्जुन ! मेरी (ब्रह्मको) अध्यक्षतामें प्रकृति चराचरसहित सब जगत्को रचती है इस हेतुसे (४५)

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा

प्रश 2 जु कै फु और जौ 2 शर 2 पट शर शर 2 2 2 7 फै हु 2 परै 73 परै हैए 7 2 कै 2 कै है टर 9 है जौ और हि शर फु 3 शर तरै कै जौ फुै शर तरै है जै शि जै है शि जै जै जे श्र कै शि डे. RARKKRAARARRKKAAKARKRRRKRKKRKN NAARKKNK +

ही यह संसाररूप चक्र घूमता है ।' इतरेषाञ््रानुपलब्धेः (नरह्मसूः २।१।२) (च) और (इतरेषाम्‌) अन्योंके (अनुपलब्धेः) पाये जानेसे | अर्थात्‌ कई वेदविरुद्ध चार्वाक आदि स्मृतिको छोड़कर अन्य स्मृतियोंके अनवकाशका दोष पाया भी नहीं जाता, जैसा कि पहले सूत्रमें सांख्य और गीता दोनों स्मृतियोंमेंस्पष्टरूपसे दिखला दिया गया है इसलिये प्रकृति उपादानकारण और ब्रह्म निमित्तकारण इन दोनोंकी ही व्यवस्था ठीक है एतेन योगः प्रत्युक्तः (ब्रह्मसू> २।१। ३) (एतेन) इस कथनसे (योगः) संयोगके (प्रत्युक्तः) प्रतिवादका खण्डन हो गया; अर्थात्‌ जैसे बिना ब्रह्मके स्वतन्त्ररूपेण केवळ प्रकृति जगतका कारण नहीं बन सकती, इसी प्रकार बिना ब्रह्मके केवल संयोग स्वतन्त्ररूपेण जगतका कारण नहीं बन सकता | इसी बातको श्वेताश्वतर-उपनिषदमें दर्शाया है कालः स्वभावो नियतिर्यदटूच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या संयोग एषां त्वात्मभावादात्माप्यनीहः सुखदुःखहेतोः (श्वेताः १।२) “क्या काल या स्वभाव या नियति (होनी) या यदूच्छा (इतिफाक) या स्थूलभूत कारण हैं अथवा जीवात्मा कारण है, यह विचारणीय है। इनका संयोग भी कारण नहीं हो सकता ; क्योंकि वे अनात्म (जड) पदार्थ हैं और जीवात्मा भी समर्थ नहीं; क्योंकि वह स्वयं सुख-दुःखमें पड़ा है ।' ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्‌ देवात्महाक्तिं स्वगुणेर्निगूढाम्‌। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः (श्वेताः १। ३) “उन्होंने ध्यानयोगमें लगकर उस परमात्माकी निजशक्तिको जो कार्योके अंदर छिपी हुई है, प्रत्यक्ष देखा--जो देव अकेला काल और जीवात्मासमेत इन सारे कारणोंका अधिष्ठाता है ।' जिस योगको ब्रह्मके साक्षात्कारका श्रुति स्पष्टरूपमें प्रशंसाके साथ मुख्य साधन बतलाती है, उसी योगकी ब्रह्मसूत्रद्वारा निराकरण किये जानेकी सम्भावना कितनी आश्चर्यजनक है योगरिखोपनिषद्‌, अध्याय एकमें बतलाया है-- ज्ञाननिष्ठो विरक्तोऽपि धर्मज्ञो विजितेन्द्रियः विना देहेऽपि योगेन मोक्षं लभते विधे॥ २४॥ “हे विधे ! साधक चाहे ज्ञाननिष्ठ, विरक्त, धर्मज्ञ और जितेन्द्रिय क्यों हो, तो भी योग बिना इस देहसे मुक्ति-लाभ कर सकेगा ।' ==

(४६)

तीसरा प्रकरण न्याय ओर वैशेषिक दर्शन

कणाद मुनिप्रवर्तित वैशेषिक दर्शन और गौतम मुनिप्रवर्तित न्यायदर्शनके सिद्धान्त एक-जैसे है न्यायदर्शन एक प्रकारसे वैशेषिक सिद्धान्तकी ही विस्तृत व्याख्या है या यों कहिये कि इन दोनों दर्शनोमें एक ही फिलासफी है जिसका पूर्वाङ्ग वैशेषिक है और उत्तराङ्ग न्याय

इन दोनों दर्शनकारोंका ठीक-ठीक समय निश्चय करना अति कठिन है; किंतु यह सिद्ध है कि ये दोनों भगवान्‌ कपिल और पतञ्जलि मुनिके पीछे हुए हैं; क्योंकि इन्होंने अतीन्द्रिय पदाथेकि वास्तविक स्वरूप जाननेके लिये योगका ही सहारा लिया है और व्यास तथा जैमिनिसे पूर्वकालमें हुए हैं; क्योंकि ब्रह्मसूत्रमें उनके सिद्धान्तोंका वर्णन आया है इन दोनोंमें कणाद गौतमसे पहले हुए हैं; क्योंकि वेशेषिक दर्शन न्यायदर्शनकी अपेक्षा अधिक प्राचीन समयका है।

वैशेषिक दर्शन

नामकरण--इस दर्शनका नाम वैशेषिक, काणाद तथा ओलूक्य है विशेष नामक पदार्थकी

विशिष्ट कल्पना करनेके कारण इसको वैशेषिक संज्ञा प्राप्त हुई है और कणाद तथा उनके पिता उलूक ऋषिके नामपर इसे काणाद और औलूक्य कहते हैं। कणादका कहीं-कहीं काश्यप अर्थात्‌ कश्यप मुनिका पुत्र अथवा कश्यप गोत्रबाला नाम भी मिलता है।

वैशेषिक सूत्रोंकी संख्या तीन सौ सत्तर है, जो दस अध्यायोंमें विभक्त हैं प्रत्येक अध्यायमें दो आहिक हँ प्रथम अध्यायके प्रथम आहिकमें द्रव्य, गुण तथा कर्मके लक्षण तथा विभागका और दूसरेमें सामान्य'- का, दूसरे तथा तीसरे अध्यायमें नौ द्रव्योंका, चौथे अध्यायके प्रथम आहिकमें परमाणुवादका तथा द्वितीयमें अनित्य द्रव्य विभागका, पाँचवें अध्यायमें कर्मका, छठे अध्यायमें वेद-प्रामाण्यके विचारके बाद धर्म-अधर्मका, सातवें तथा आठवें अध्यायमें कतिपय गुणोंका, नवें अध्यायमें अभाव तथा ज्ञानका और दसवेंमें सुख-दुःख-विभेद तथा विविध कारणोंका वर्णन किया गया है

वैशेषिकका अर्थ है पदार्थोके भेदोंका बोधक

पदार्थ जो प्रतीतिसे सिद्ध हो उसे कहते हैं।

वैशेषिक दर्शनमें हेय, हेय-हेतु, हान और हानोपाय--इन चारों प्रतिपाद्य विषयोंके समझनेके लिये छः पदार्थ १-द्रव्य, २-गुण, ३-कर्म, ४-सामान्य, ५-विशेष और ६-समवायका निरूपण किया है तथा उनके सामान्य धर्म और विशेष धर्मके तत्त्वज्ञानसे निःश्रेयस अर्थात्‌ मोक्ष बतलाया है

यथा-—-

धर्मविशेषप्रसूताद्‌ द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्य- वैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम्‌। (वैः १।१।४)

- (४७)

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ वैशेषिक दर्शन

RRARRRRARRKARK KXAXXAARARRRAARRRRKRAKAKARARARRRARARRRRRARRAARRARARARRRRARAARRAKRAARRARRRARARRRKNK Ax *

'धर्मविशेषसे उत्पन्न हुआ जो द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय (इतने) पदार्थोका साधर्म्य ओर वैधर्म्यसे तत्त्वज्ञान, उससे मोक्ष होता है ।'

इन पदार्थोमें केवल धर्मी तो द्रव्य है, अन्य पाँच पदार्थ धर्म हैं। अर्थात्‌ गुण और कर्म द्रव्यके धर्म हैं; सामान्य और विशेष द्रव्य, गुण और कर्म--तीनोंके धर्म हैं; और समवाय पाँचोंका धर्म है। इन छःमेंसे पहले तीन द्रव्य, गुण और कर्म मुख्य पदार्थ हैं; क्योंकि इन्हींसे अर्थ-क्रिया (प्रयोजन) सिद्ध होती है और यही धर्म अधर्मके निमित्त होते हैं शेष तीन उपपदार्थ हैं; क्योंकि उनसे कोई अर्थ--क्रिया सिद्ध नहीं होती; वे केवल शब्दव्यवहारके ही उपयोगी हैं

नो द्रव्य

द्रव्य नौ हैं--

पृथिव्यापस्तेजोबायुराकाइं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि

(वैः १।१।५) पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन--ये नौ द्रव्य है! १-पृथिवीके कारणरूप निरवयव सूक्ष्म परमाणु नित्य हैं और उनका कार्यरूप स्थूल भूमि अनित्य

है। पृथिवीमें गन्ध, रस, रूप, स्पर्श चार गुण हैं | उनमेंसे मुख्य गन्ध है

२-जलकी पहचान शीत स्पर्श है उष्ण जलमें जो उष्णता प्रतीत होती है वह अम्निकी है कारणरूप निरवयव जलके सूक्ष्म परमाणु नित्य हें और कार्यरूप साधारण जल अनित्य है | जलमें रस, रूप और स्पर्श तीन गुण हैं; उनमेंसे मुख्य रस है

३-अग्निकी पहचान उष्ण स्पर्श हे जहाँ उष्ण स्पर्श है वहाँ अवश्य किसी-न-किसी रूपमें अग्नि है कारणरूप निरवयव आग्निके सूक्ष्म परमाणु नित्य हैं और कार्यरूप साधारण अग्नि अनित्य है अग्नमें रूप और स्पर्श दो गुण हैं; उनमेंसे रूप मुख्य है

४-वायुकी पहचान एक विलक्षण स्पर्श है। कारणरूप निरवयव वायुके परमाणु नित्य हैं और कार्यरूप साधारण वायु अनित्य है

इन चारों द्रव्योंसे तीन प्रकारकी वस्तुएँ, बनी हें---शरीर, इन्द्रिय और विषय मनुष्य, पशु-पक्षी आदिके शरीर तथा वृक्ष आदि पृथिवीके हैं, घ्राणेन्द्रिय पृथिवीकी है; शरीर और इन्द्रियके सिवा जितनी मिट्टी, पत्थर आदि रूप पृथिवी है, वह सब पार्थिव विषय है | इसी प्रकार जल-मण्डलस्थ जीवोंके शरीर जलीय हैं, रसना (रस अनुभव करनेवाली इन्द्रिय) जलीय है; नदी, समुद्र, बर्फ, ओले आदि जलीय विषय हैं तेजोमण्डलस्थ जीवोंका शरीर तैजस है नेत्रेन्द्रिय तैजस है, अग्नि, सूर्य और जठराग्नि आदि तैजस विषय हैं। वायु-मण्डलस्थ जीवोंका शरीर वायवीय है, त्वचा इन्द्रिय वायवीय है और बाहर जो वृक्ष आदिको कॅपानेवाला वायु है तथा अंदर जो प्राणरूप वायु है, यह वायवीय विषय है

५- आकाशकी पहचान शब्द है जहाँ शब्द है वहाँ आकाश है शब्द सर्वत्र है, अतएव आकाश विभु (व्यापक) है। विभु निरवयव होनेसे नित्य होता है, अतएव आकाश नित्य और एक है। आकाशका शरीर कोई नहीं, पर उसका इन्द्रिय श्रोत्र है; कर्ण-छिद्रके अदरका आकाश श्रोत्र है

(४८)

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तीसरा प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय + [ वैशेषिक दर्शन

पृथिवी, कि तेज, वायु और आकाश---े पाँचों द्रव्य पञ्चभूत कहलाते हैं इनके क्रमसे गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द--ये पाँच गुण हें घाण, रसना, नेत्र, त्वचा ओर श्रोत्र--ये पाँच इन्द्रियाँ हैं। जिनके क्रमसे गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द--ये पाँच विषय हैं। घाण नासिकाके अग्रवर्ती हे और पार्थिव होनेसे पृथिवीके गुण गन्धकी ही ग्राहक है रसना जिह्ग्रवर्ती है और जलीय होनेसे जलके गुण रसकी ही ग्राहक है नेत्र काली पुतलीके अग्रवर्ती है और तैजस होनेसे रूपका ही ग्राहक है त्वचा सर्वशरीरगत है और वायवीय होनेसे स्पर्शकी ही ग्राहक है।

६-काल--- यह उससे आयुमें छोटा है, बह इससे आयुमें बड़ा है। यह जल्दी हो गया है और वह देरसे हुआ है इत्यादि जो विलक्षण प्रतीतियाँ होती हैं, उनका निमित्त काल है। काल सारे कार्यो

(अनित्यों) की उत्पत्ति, स्थिति और विनाशमेँ निमित्त होता है। काल नित्य, विभु ओर एक हे; किंतु व्यवहारके लिये पल, घड़ी, दिन, रात, महीना, वर्ष और युग तथा भूत, भविष्यत्‌ और वर्त्तमान आदि उसके अनेक भेद कल्पनासे कर लिये जाते हैं अनित्य पदार्थोकी अपेक्षासे कल्पित हैं।

नित्येष्टभावादनित्येषु भावात्‌ कारणे कालाख्येति (वैः २।२।९)

'नित्योमें होनेसे और अनित्योंमें होनेसे कारणमें काल संज्ञ है ।' यहाँ कारणमें कालको भी गिना है

७-दिशा-- यह इससे पूर्व है, दक्षिण है, पश्चिम है, उत्तर है, पूर्वदक्षिण है, दक्षिणपश्चिम है उत्तरपश्चिम है, उत्तरपूर्व है, नीचे है, ऊपर है'--आदि ये दस प्रतीतियाँ जिससे होती हैं बह दिशा है

इत इदमिति यतस्तदिश्यं लिङ्गम्‌। (वेः २।२। १०)

'यहाँसे यह पर है या अपर' यह प्रतीति जिससे होती है वह दिशाका लिङ्ग है सारे कार्योकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाशमें कालवत्‌ दिशा भी निमित्त होती है कालवत्‌ दिशा भी विभु है और एक है; किंतु व्यवहारके लिये उसके भी पूर्वादि भेद कर लिये जाते हैं परिच्छिन्न पदार्थोकी अपेक्षासे कल्पित हैं

८-आत्मा--आत्माकी पहचान चैतन्य (ज्ञान) है ज्ञान शरीरका धर्म नहीं हो सकता; क्योंकि शरीरके कारण जो पृथिवी आदि भूत हैं उनमें ज्ञान नहीं यदि उनमें ज्ञान होता तो उनसे बने हुए घटादिमें भी ज्ञान होता ज्ञान इन्द्रियोंका भी गुण नहीं है, क्योंकि किसी इन्द्रियके नष्ट हो जानेपर भी उसके पहले अनुभव किये हुए विषयकी स्मृति रहती है और स्मृति उसीको होती है जिसने अनुभव किया हो; इसलिये यह अनुभव करनेवाला इन्द्रियोंसे भिन्न है ज्ञान मनका गुण भी नहीं; क्योंकि मन जाननेका' साधन है; ज्ञाता नहीं इसलिये परिशेषसे ज्ञान आत्माका गुण सिद्ध होता है इससे आत्माका अनुमान होता है इसी प्रकार इच्छा, द्वेष, प्रय्न, सुख, दुःख भी शरीरसे भिन्न आत्माका अनुमान कराते हैं हितकी प्राप्ति और अहितके परिहारके लिये शरीरकी चेष्टा भी इस बातको प्रकट करती है कि रथमें रथके सारथिके सदुश अपने हित-अहितको जानकर शरीरको चलानेवाला शरीरसे पृथक्‌ उसका अधिष्ठाता आत्मा है

आकारवत्‌ आत्मा भी विभु (व्यापक) और नित्य है

विभवान्महानाकाइस्तथा चात्मा। (वैः ७। १। २२)

विभु धर्मवान्‌ महान्‌ है आकारा, वैसे (ज्ञानस्वरूप) आत्मा है। |

९-मन जिस प्रकार बाह्यरूपादि ज्ञानके साधन नेत्रादि इन्द्रियाँ हैं, उसी प्रकार सुख-दुःखादिके ज्ञानका साधन जो इन्द्रिय है, वह मन है, मन अणु है-- पा० यो० प्रण ३- (४९)

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ वैशेषिक दर्शन

००७७०७७७७७७०७७०७०७०७००००७७७७००७४०७००७०००००००७००७०७७७७७७७७७७/४४४७४४४७४४४४४४४४४७४७७४७०७७०/०० भजत 000

तदभावादणु मन: (वैः ७। २३)

उसके अर्थात्‌ विभुत्वके अभावसे मन अणु है

इस प्रकार द्रव्य नौ ही हैं यद्यपि तम (अन्धकार, अँधेरा) काले रंगका और चलता हुआ प्रतीत होता है तथापि वस्तुतः वह कोई द्रव्य नहीं | प्रकाशका अभाव ही तम है, प्रकारके होनेसे दीखना ही उसमें कालापन है यदि वास्तवमें उसका कोई अपना रंग होता तो प्रकाशके साथ दीखता जो चलता हुआ प्रतीत होता है, वास्तवमें वह अँधेरा नहीं चलता; किंतु प्रकाशके आगे-आगे चलनेसे अँधेरा चलता हुआ प्रतीत होता है, जैसे पुरुषके चलनेसे छाया चलती हुई प्रतीत होती है।

चौबीस गुण

गुण चौबीस हैं--रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथकृत्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार

रूप--रूप, श्वेत, नीला, पीला आदि कई प्रकारका है यह नेत्रसे ग्राह्य है; पृथिवी, जल और अग्निमें द्रव्यादिका प्रत्यक्ष करानेवाला है

रस--रस मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय-भेदसे छः प्रकारका है, यह रसनेन्द्रियसे ग्राह्य है

गन्ध--गन्ध सुगन्ध और दुर्गन्ध भेदसे दो प्रकारका है और घ्राणेन्द्रियसे ग्राह्य है यह केवल पृथिवीमें रहती है

स्पर्श--स्पर्श तीन प्रकारका है; शीत, उष्ण, अनुष्णाशीत (न ठंडा गर्म); यह त्वगिन्द्रियसे याह्य है और पृथिवी, जल, तेज और वायुमें रहता है

रूप, रस, गन्ध और स्पर्श--पृथिवीमें ये चारों गुण हैं, जलमें गन्ध नहीं, शेष तीनों हैं, अग्निमें गन्ध और रस नहीं शेष दो हैं और वायुमें रूप भी नहीं केवल स्पर्श है

संख्या-- वह एक हे, दो हैं' इत्यादि व्यवहारका हेतु संख्या है संख्या एक द्रव्यके आश्रय भी हे, जैसे 'यह एक वृक्ष है'; और अनेक द्रव्योंके भी, जैसे थे दो वृक्ष हैं' एकत्व संख्या नित्य द्रव्योंमें नित्य है; क्योंकि नित्य द्रव्योंके सदा बने रहनेसे एकत्व संख्या भी सदा बनी रहती है अनित्य द्रव्योंमें एकत्व संख्या अनित्य है; क्योंकि उनके उत्पन्न होनेके साथ उत्पन्न होती है और उनके नाश होनेके साथ नष्ट हो जाती है |

एकमें एकत्व संख्या तो सदा ही होती हे; किंतु द्वित्व, त्रित्वादि संख्या सदा नहीं होती बह तब उत्पन्न होती है जब हम अलग-अलग दो अथवा दोसे अधिक वस्तुओंको इकट्ठा मिलाकर कहना चाहते हैं कि ये दो हैं अथवा तीन हैं इत्यादि द्वित्व-त्रित्वादि संख्या अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्न होती है और अपेक्षाबुद्धिके नाश होनेपर नाश हो जाती है, इसलिये यह अनित्य होती है। यह द्वित्वादि संख्या व्यासज्यवृत्ति कहलाती हैं; क्योंकि बह अपने आश्रयभूत वस्तुओंमें सबमें एक ही हैं, अलग-अलग नहीं संख्या नित्य, अनित्य, मूर्त, अमूर्त सारे द्रव्योंमें रहती हे

परिमाण--यह इतना है' इस व्यवहारका हेतु परिमाण है। परिमाण चार प्रकारका होता है;

(५०)

तीसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय + [ वैशेषिक दर्शन

XAKRAKNRRRARRKNK ARARKRK हक #ू अं कफ कै कै अं औै कै है कै जि फै फु कु कै कफ जै कै कै कर हर कौर कह कै कै कै कैफ कै फै है फै कै है कै कै जैक औैर अर और कक फै है कै # ओर कफ कै कक कै कै के के # # हे #

अणुत्व, महत्त्व, दीर्घत्व और हस्वत्व ये परिमाण एक दूसरेकी अपेक्षासे कहे जाते हैं एक वस्तुको उससे बडी वस्तुकी अपेक्षासे अणु या हस्व कहा जाता है और छोटीकी अपेक्षासे महत्‌ या दीर्घ परमाणुओंमें अणुल आर हस्वत्व तथा आकाश आदि विभु द्रव्योंमें महत्त्व और दीर्घत्व मुख्य हैं परिमाण भी नित्य अनित्य, मूर्त, अमूर्त सब द्रव्योंका धर्म है

षृथकृत्व-- यह इसस पृथक्‌ है! इस व्यवहारका हेतु पृथकत्व हे यह भी सब द्रव्योंका धर्म हे संख्यावत्‌ एक पृथकृत्व नित्य द्रव्योंमें नित्य होता हे और अनित्योंमें अनित्य; क्योंकि आश्रयके नाशसे उसका नाश आवश्यक हे

संयोग-- यह संयुक्त है' इस प्रतीतिका निमित्त संयोग है। यह तीन प्रकारका होता हे-- (क) अन्यतर कर्मज अर्थात्‌ संयुक्त होनेवाले दो पदार्थोमिंसे एकके कर्मसे उत्पन्न होनेवाला, जैसे श्येन पक्षी और पर्वतका संयोग; (ख) उभय कर्मज अर्थात्‌ दोनोंके कर्मसे उत्पन्न होनेवाला, जैसे दो मेढोंका संयोग; (ग) संयोगज अर्थात्‌ संयोगसे उत्पन्न होनेवाला, जैसे हाथ और पुस्तकके संयोगसे शरीर और पुस्तकका संयोग

इनमें अन्यतर कर्मज और उभय कर्मज संयोग भी दो प्रकारका होता है

(अ) 'अभिघात' शब्दका हेतु-संयोग और (ब) 'नोदन' अहेतु-संयोग

संयोग सब द्रव्योंमें रहता है और अनित्य होता है; क्योकि परमाणु आदि नित्य द्रव्योंमें भी नया ही उत्पन्न होता है हर एक संयोग अव्याप्यवृत्ति होता है, अर्थात्‌ जो संयुक्त हैं उनके सारे स्वरूपमें संयोग नहीं होता; किंतु किसी एक या किन्हीं एक प्रदेशोंके साथ होता हे

विभाग-संयोगका नाशक गुणविभाग है संयोगवत्‌ यह भी तीन प्रकारका है- (क) अन्यतर कर्मज जैसे श्येन पक्षीके उड़ जानेसे श्येन और पर्वतका विभाग, (ख) उभय कर्मज, जैसे दो मेढ़ोंके परस्पर पीछे हटनेसे मेढ़ोंका विभाग और (ग) विभागज, जैसे हाथ और पुस्तकके अलग हो जानेसे शरीर और पुस्तकका विभाग

१०, ११ परत्व, अपरत्व--'यह परे है, यह वरे है' इस व्यवहारके निमित्त गुण परत्व और अपरत्व हैं। ये दो प्रकारके हैँ--दैशिक और कालिक दैशिक, दिशासे किये हुए अर्थात्‌ दूर-निकटकी अपेक्षासे, जैसे वह वस्तु इससे परे है (दूर है), यह वरे है (निकट है); और कालिक, कालसे किये हुए अर्थात्‌ आयुकी अपेक्षासे, जैसे वह पर है, बड़ा है और यह अपर है, छोटा है दैशिक और कालिक, सारे परत्व और अपरत्व अपेक्षा-बुद्धिसे उत्पन्न होते हैं और अपेक्षा-बुद्धिके नाशसे नष्ट होते हैं कालिक परत्व और अपरत्व अनित्योंके धर्म हैं, नित्योंके नहीं; दैशिक परत्व और अपरत्व पृथिबी, जल, अग्नि, वायु और मनके धर्म हैं, विभुके नहीं होते

१२ गुरुत्व--गिरनेका निमित्त गुरुत्व (भार) है यह जल और पूथिवीमें रहता है वायुमें गुरुत्वकी प्रतीति पार्थिव और जलीय परमाणुओंके संयोगसे होती है गुरुत्व नित्योंमें नित्य और अनित्योंमें अनित्य है

१३ द्रवत्व--यह बहनेमें निमित्त (नहनेका धर्म) है वह दो प्रकारका है; (क) स्वाभाविक जैसे जलमें और (ख) नैमित्तिक जैसे घृत आदि पार्थिव नस्तुओंमें अग्निके संयोगसे उत्पन्न होता है द्रवत्व

(५१)

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ वैशेषिक दर्शन भी नित्योंमें नित्य और अनित्योंमें अनित्य होता है

१४ स्रेह-स्नेह जलका विशेष गुण है, बिखरे हुए कणोंको मिलानेका हेतु है यह नित्योंमें नित्य और अनित्योंमें अनित्य होता है

१५ शब्द--यह आकाशका गुण है, श्रोत्र-ग्राह्म है और दो प्रकारका हे-- (क) ध्वनि-स्वरूप जैसा मृदंग आदिमें होता है और (ख) वर्ण-स्वरूप जैसा मनुष्योंकी भाषामें

१६ बुद्धि- बुद्धि ज्ञानका नाम है, यह केवल जीवात्माका गुण हे, इसके दो भेद हें--(क) अनुभव, नया ज्ञान और (ख) स्मृति, पिछले जाने हुएका स्मरण

अनुभव दो प्रकारका होता हे-- (अ) यथार्थ, सच्चा, जिसको प्रमा एवं विद्या कहते हैं इसके तीन भेद प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाणके प्रसंगमें बतलाये जायँगे (ब) अयथार्थ, मिथ्या, जिसको अप्रमा या अविद्या कहते हैं। इसके दो भेद संशय और विपर्ययको भी अलग बतलाया जायगा

सांख्य ओर योगने आत्माको ज्ञानस्वरूप तथा बुद्धिको तीनों गुणोंका प्रथम विषम परिणाम माना है, जो सत्त्वमें रज केवल क्रियामात्र और तम उस क्रियाको केवल रोकनेमात्र है सत्त्वके प्रकाश और आत्माके ज्ञानके प्रकाशमें अत्यन्त विलक्षणता है, फिर भी बुद्धिमें सत्त्वकी स्वच्छता एवं निर्मलताके कारण आत्माके ज्ञानके प्रकाशको ग्रहण करनेकी अनादि योग्यता है यह आत्माके ज्ञानसे प्रकाशित हुई बुद्धि किसी-न-किसी ज्ञानेन्द्रियद्वारा बहिर्मुख होकर नाना प्रकारके यथार्थ और अयथार्थ आकारोंमें परिणत होती रहती है यह ज्ञान तथा अज्ञानका परिणाम बुद्धिमें ही होता है इसलिये ज्ञान और अज्ञान दोनों बुद्धिहीके धर्म माने गये हैं; किंतु बुद्धि जड है इसलिये उसको इस ज्ञान और अज्ञानका बोध नहीं होता इसका बोध आत्माको होता है; क्योंकि बुद्धिमें वृत्तिरूपसे यह नाना प्रकारका ज्ञान और अज्ञानका परिणाम उसीके ज्ञाने प्रकाशमें हो रहा है इसलिये आत्माको बुद्धिकी वृत्तियोंका द्रष्टा होता हुआ भी कूटस्थ नित्य ही माना जाता है बुद्धिको आत्माके साथ सम्मिलित करनेसे शबल अर्थात्‌ मिश्रित आत्माकी संज्ञा जीव होती है। इसलिये बुद्धिके धर्मज्ञान आदिक वैशेषिकमें जीवात्माके गुण बतलाये गये हैं। कई समालोचकोंको बुद्धि और आत्मामें विवेकपूर्ण ज्ञान होनेके कारण यह भ्रम हुआ है कि बुद्धिके अलग हो जानेसे वैशेषिकका आत्मा एक जड द्रव्य रह जाता है उनको जानना चाहिये कि बुद्धिकी वृत्तियोंका द्रष्टा रहते हुए भी आत्मा अपने शुद्ध ज्ञान-स्वरूपसे च्युत नहीं होता है, किंतु बुद्धिके जो विकारादि उसमें आरोपित किये जाते हैं, उनका भी बाध हो जाता है।

१७ सुख--सुख इष्ट विषयकी प्राप्तिसे उत्पन्न होता है और सदा अनुकूल-स्वभाव होता है। अतीत विषयोंमें उनकी स्मृतिसे और अनागत विषयोंमें उनके संकल्पसे होता है। सुखमें मुख और नेत्र खिल जाते हैं विज्ञानियोंको जो विषय और उसकी स्मृति तथा संकल्पके बिना सुख होता है वह विद्या, शान्ति, संतोष और धर्म-विशेषसे होता हैं।

१८ ढुःख- यह इष्टके वियोग या अनिष्टकी प्राप्तिसे उत्पन्न होता है और सदा प्रतिकूल-स्वभाव होता ` है। अतीत विषयोंमें स्मृति-जन्य और अनागत विषयोंमें संकल्प-जन्य होता है दुःखमें मुख मुरझा जाता

'है और दीनता जाती है।

(५२)

'तीसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ वैशेषिक दर्शन

१९ इच्छा--अपने लिये या दूसरोंके लिये किसी अप्राप्त वस्तुकी प्रार्थना (चाहना) इच्छा है किसी वस्तुको इष्ट-साधक या अनिष्ट-निवारक जानकर उसमें इच्छा होती है इच्छा दो प्रकारकी होती हे, फलकी इच्छा और उपायकी इच्छा फल, सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्ति है और सब उसके साक्षात्‌ और परम्परासे उपाय हें

२० द्वेष--प्रज्वलन स्वरूप द्वेष है; यह प्रयत्न, स्मृति, धर्म और अधर्मका हेतु है अर्थात्‌ द्वेषसे मारने या जीतनेका प्रयत्न होता है जिससे द्वेष होता है उसकी बार-बार स्मृति होती है दुष्टोसे द्वेषमें धर्म और श्रष्ठोंमें द्वेषसे अधर्म होता है क्रोध, द्रोह, मन्यु, अक्षमा और अमर्ष- ये द्वेषके भेद है

२१ प्रयल्ल- उद्योग, उत्साह प्रयत्न है यह दो प्रकारका होता है-- (क) जीवन-पूर्वक जो सोये हुएके प्राण, अपानादिको चलाता है और जाग्रत्‌-कालमें अन्तःकरणका इन्द्रियोंके साथ संयोग कराता है; (ख) इच्छा-द्वेषपूर्वक हितके साधनोंके ग्रहणमें इच्छापूर्वक प्रयत्न होता है और दुःखके साधनोंके परित्यागमें द्वेषपूर्वक

२२, २३ धर्म, अधर्म-वेद-विहित कर्मोसे धर्म उत्पन्न होता है, यह पुरुषका गुण है, कर्ताके प्रिय, हित और मोक्षका हेतु होता है इसके विपरीत प्रतिषिद्ध कर्मोसे अधर्म उत्पन्न होता है, यह कर्ताके अहित और दुःखका हेतु होता है। धर्म और अधर्मको अदृष्ट कहते हैं

२४ संस्कार--यह तीन प्रकारका होता हे- (क) वेग--यह पृथ्वी, जल, तेज, वायु और मन--इन पाँच द्रव्योंमें कर्मसे उत्पन्न होता है और अगले कर्मका हेतु होता है। (ख) भावना--यह अनुभवसे उत्पन्न होता है, स्मृति और पहचानका हेतु है विद्या, शिल्प, व्यायाम आदिमें बार-बारके अभ्याससे इस संस्कारका अतिशय होता है। उसके बलसे उस-उस विषयमें निपुणता आती है। (ग) स्थितिस्थापक--अन्यथा किये हुएको फिर उसी अवस्थामें लानेवाला संस्कार स्थितिस्थापक कहलाता है जिससे टेढ़ी की हुई शाखा छोड़नेसे फिर सीधी हो जाती है। संस्कार स्पर्शवाले द्रव्योंमें रहता है

इन चौबीस गुणोंमेंसे रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, स्नेह, सांसिद्धिक द्रवत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना, संस्कार और शब्द--ये विशेष गुण हैं; क्योंकि ये एक द्रव्यको दूसरे द्रव्यसे निखेरते हें और संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वेग संस्कार, ये सामान्य गुण हैं; क्योंकि ये एक द्रव्यको दूसरे द्रव्यसे नहीं निखेरते

कर्म--चलना (हरकत) रूप कर्म है; यह पाँच प्रकारका है--

उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि (वैः १। १।७) १-उत्क्षेपण---ऊपर फेंकना, २-अवक्षेपण--नीचे गिराना, ३-आकुञ्चन--सिकोड्ना, ४-प्रसारण--फैलाना और

५-गमन- -अन्य सब प्रकारकी क्रिया ये पाँच कर्म हैं। मनुष्यके कर्म पुण्य-पाप-रूप होते हैं, महाभूतोंके नहीं ये कर्म भी नौ द्रव्योमेंसे किसी-न-किसी द्रव्यके धर्म हें सामान्य--किसी अर्थकी जो जाति (किस्म) है वह सामान्य है, जैसे वृक्षकी वृक्षत्व और (५३)

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ वैशेषिक दर्शन

७७७७ 9७० ०७७०० ००००० ००७७० 9 ७०७०७ 3 अजज जज *

मनुष्यकी मनुष्यत्व जाति है जाति बहुतोंमें एक होती है, जैसे सारे वृक्षोमें वृक्षत्व जाति एक है जो एक ही हो अथवा जो विभु हो उसमें जाति नहीं रहती, जैसे दिशा, काल, आकाश और आत्मामें |

सामान्यके दो भेद है--पर और अपर | एक व्यापक जाति; जिसकी अवान्तर जातियाँ और भी हों, जैसे वृक्षत्व, पर-सामान्य कहलाती है; उसकी अवान्तर जाति, जैसे आम्रत्व, अपर-सामान्य कहलाती है अपर-सामान्यको सामान्य-विहेष भी कहते हैं; क्योंकि वह सामान्य भी है और विशेष भी जैसे आम्रत्व सारे आम्रोंमें सामान्य है, किंतु दूसरे वृक्षोंसे आम्रोंको विशेष (अलग) करती है, इसलिये विशेष भी है।

सामान्य-विशेष (पर, अपर) सापेक्ष हें आम्रत्वादिकी अपेक्षासे वृक्षत्व पर (सामान्य) है और वृक्षत्वकी अपेक्षासे आम्रत्व अपर (विशेष) है; किंतु वृक्षत्व भी पृथिवीत्वकी अपेक्षासे अपर है और आम्रत्व भी अपनी अवान्तर जातियोंकी अपेक्षासे पर है। जिसकी आगे कोई अवान्तर जाति हो, वह केबल अपर होता है, जैसे घटत्वादि और जिसकी व्यापक जाति हो वह केवल पर ही होता है ऐसी जाति केवल सत्ता है, जो सारे द्रव्यों, सारे गुणों और सारे कर्मोमें होती है सत्ता वह है जिससे सत्‌-सत्‌ इस प्रकारकी प्रतीति होती है, अर्थात्‌ द्रव्य सत्‌ है, गुण सत्‌ है, कर्म सत्‌ हे और सारी (द्रव्यत्वादि) जातियाँ सामान्य-विरोष हैं, किंतु इन द्रव्यत्वादि जातियोंमेंसे हर एक जाति अनेक व्यक्तियोंमें रहती है, इसलिये प्रधानतया वे सामान्य ही हैं, किंतु अपने आश्रय (द्रव्यादि) को दूसरे पदार्थोसे अलग भी करती हैं, इसलिये गोणतया विशेष शब्दसे कही जाती हैं, किंतु जो विशेष पदार्थ है वह इनसे अलग ही है

विशेष--जैसे घोड़ेसे गोमें विलक्षण प्रतीति जाति-निमित्तक होती है और एक गोसे दूसरी गौमें विलक्षण प्रतीतिका निमित्त रूपादि या अवयवोंकी बनावट आदिका भेद हे इसी प्रकार योगियोंको एक ही जाति, गुण और कर्मवाले परमाणुओंमें जो एक दूसरेसे विलक्षण प्रतीति होती है उसका भी कोई निमित्त होना चाहिये, परमाणुओंमें और कोई भेद (बनावट आदिका भेद) असम्भव होनेसे, जो वहाँ भेदक धर्म है वही विशेष पदार्थ है वह विशेष सारे नित्य द्रव्योंमें रहता है, क्योंकि अनित्य द्रव्योंमें और गुण-कर्मादिमें तो आश्रयके भेदसे भेद कहा जा सकता है, किंतु नित्य द्रव्योंमें नहीं इसलिये हर एक नित्य द्रव्यमें एक-एक विशेष होता है, जिससे वे एक दूसरेसे विलक्षण प्रतीत होते हैं और देश-कालके भेदमें भी यह वही परमाणु है, यह पहचान जो योगियोंकी होती है इसका निमित्त भी विशेष पदार्थ है अर्थात्‌ पहचान और विलक्षण प्रतीति किसी निमित्तसे होती है, जैसे गौमें गोत्व जातिसे और शुक्रमें शुक्कत्व गुणसे; और वह निमित्त परमाणुओंमें कोई और होनेसे उनमें भी अवश्य कोई अलग ऐसा पदार्थ है जो पहचान और विलक्षण प्रतीतिका निमित्त है, वही विशेष पदार्थ है इस विशेष पदार्थका पता इसी दर्शनने लगाया है, इसीलिये इसको वैशेषिक कहते हें

समवाय--सम्बन्ध सदा दोमें होता है, जैसे कुंडे और दहीका सम्बन्ध है इनमेंसे दही कुंडेसे और कुंडा दहीसे अलग भी रहता है। ऐसे सम्बन्धको संयोग कहते हैं। किंतु जो ऐसा घना सम्बन्ध है कि सम्बन्धी अलग-अलग थे और हो सकते हैं जैसे गुण-गुणीका सम्बन्ध, वहाँ सम्बन्धको समवाय

(५४)

तीसरा प्रकरण ] * षडदर्शनसमन्वय * [ न्याय-दर्शन कहते हैं अर्थात्‌ गुणीमें गुण समवाय-सम्बन्धसे रहता है इसी प्रकार अवयवोंमें अवयवी क्रियावालोंमें क्रिया, व्यक्तिमें जाति और नित्य द्रव्योंमें विशेष समवाय सम्बन्धसे रहता है _ अभाव पदार्थ-पिछले वैशेषिक आचार्येनि उपयुक्त छः भाव पदार्थोके अतिरिक्त “अभाव” भी एक अलग पदार्थ निरूपण किया है अभाव चार प्रकारका है प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव किसी वस्तुकी उत्पत्तिसे पहले उसका अभाव प्रागभाव और नाझके पीछे उसका अभाव

प्रध्वसाभाव है किसी वस्तुका नितान्त अभाव अत्यन्ताभाव है और एक वस्तुमें दूसरी वस्तुका अभाव अन्योन्याभाव हे

न्याय-दर्शन

न्यायसूत्रके रचयिताका गोत्र-नाम गौतम या गोतम है और व्यक्तिगत नाम अक्षपाद है

प्रमाणोंसे अर्थका परीक्षण अर्थात्‌ विभिन्न प्रमाणोंकी सहायतासे वस्तुतत्त्वकी परीक्षा न्याय है।

प्रत्यक्ष और आगमके आश्रित अनुमान (न्याय) है। अनुमानमें परीक्षा करके अर्थकी सिद्धि की जाती है। परीक्षा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे होती है, जैसे अम्निकी सिद्धिमें जब यह प्रतिज्ञा की कि 'पर्वतमें अग्नि है' तो यह शब्दप्रमाण हुआ; जब रसोईका उदाहरण दिया तो वह प्रत्यक्षप्रमाण हुआ; जब 'जेसे रसोई धूमवाली है, वैसे यह पर्वत धूमवाला हे' ऐसा उपनय कहा, तो यह उपमान हुआ इस प्रकार प्रत्यक्ष, उपमान और शब्द, इन सब प्रमाणोंसे परीक्षा करके अग्निकी सिद्धि की गयी इस प्रकार समस्त प्रमाणोंके व्यापारसे परीक्षा करके अग्निकी सिद्धि की गयी इस प्रकार समस्त प्रमाणोंके व्यापारसे अर्थका निश्चय करना न्याय है।

न्यायसूत्र पाँच अध्यायोंमें विभक्त हैं और प्रत्येक अध्याय दो आहिकोंमें इनमें षोडश पदाथेकि उद्देश्य (नाम-कथन) तथा लक्षण (परिभाषा) परीक्षण किये गये हें

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्ताउवयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वा- भासछलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्नि:श्रेयसाधिगम: (न्याय०१ १)

“प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान, इनके तत्त्वज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है।' इनमेंसे प्रमेयके तत्त्वज्ञानसे मोक्ष मिलता है और प्रमाण आदि पदार्थ उस तत्वज्ञानके साधन हें

यथार्थ ज्ञानका साधन प्रमाण है, जाननेवाला प्रमाता, ज्ञान प्रमिति और जिस वस्तुको जानना है वह प्रमेय कहलाती है

न्याय-दर्शनके अनुसार चार मुख्य प्रमाण हैं---१ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम

प्रत्यक्ष प्रमाण--इन्द्रियो और अर्थके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ जो अशब्द (नाममात्रसे कहा हुआ), अव्यभिचारी (न बदलनेवाला) और निश्चयात्मक हो, वह प्रत्यक्ष प्रमाण है

प्रत्यक्षके दो भेद है--निर्विकल्पक और सविकल्पक वस्तुका आलोचनमात्र ज्ञान, जिसमें सम्बन्धकी प्रतीति नहीं होती है, निर्विकल्पक है; और जिसमें सम्बन्धकी प्रतीति होती है, वह सविकल्पक है ।' निर्विकल्पक पहले होता है और सविकल्पक पीछे जैसे गौको देखकर 'गौ' यह ज्ञान पहले-पहल नहीं

(५५)

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ न्याय-दर्शन

होता; क्योंकि 'गौ' इस ज्ञानमें केवल व्यक्तिका ज्ञान नहीं, किंतु एक विशेष व्यक्ति, एक विशेष जाति (गोत्व) से सम्बन्ध रखनेवाली प्रतीत हो रही है यह सम्बन्धका ज्ञानसम्बन्धियोंको पहले-पहल अलग जाने बिना नहीं हो सकता इससे अनुमान होता है कि पहले दोनों सम्बन्धियों (जाति, व्यक्ति) का सम्बन्धरहित ज्ञान अलग-अलग हुआ है, पीछे 'यह गौ है' यह ज्ञान हुआ है इनमेंसे पहला निर्विकल्पक है; पीछे जो सम्बन्धको प्रकट करनेवाला ज्ञान हुआ है, वह सविकल्पक है निर्विकल्पक कहनेमें नहीं आता वह ऐसा ही प्रत्यक्ष है जैसे बालक या गूँगेको होता है इसके विपरीत सविकल्पक कहने-सुननेमें आता है।

अनुमान प्रमाण--साधन-साध्य, लिङ्ग-लिङ्गी अथवा कार्य-कारणके सम्बन्धसे जो ज्ञान उत्पन्न हो, उसे अनुमान कहते हैं।

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जहाँ 'व्याप्ति' अर्थात्‌ साहचर्य (साथ रहने) का नियम पाया जाता है, वहीं अनुमान होता है धूम अञ्निके बिना नहीं होता, इसलिये धूमसे अग्निका अनुमान होता है; पर अग्नि बिना धूमके भी होती है, इसलिये अग्निसे धूमका अनुमान नहीं होता जिसके द्वारा अनुमान करते हैं उसको लिङ्ग (चिल्ल) कहते हैं और जिसका अनुमान होता है, उसको लिङ्गी इस प्रकार धूम लिङ्ग है और अग्नि लिङ्गी लिङ्गी वह होता है, जो व्यापक हो | जहाँ धूम है वहाँ अग्नि अवश्य है, धूममें अम्निकी व्यापकता है, ऐसा होनेसे ही अनुमान हो सकता है। यदि बिना अग्निके भी धूम होता तो उससे अग्निका अनुमान होता जैसे अग्नि बिना धूमके भी होती है, अतएव अ्निसे धूमका अनुमान नहीं हो सकता | इसलिये जहाँ व्याप्ति है वहीं अनुमान होता है चाहे बह सम-व्याप्ति हो चाहे विषम-व्याप्ति हो सम-व्याप्ति, जैसे गन्ध और पृथिवीत्वकी है जहाँ गन्ध है वहीं पृथिवीत्व है और जहाँ पृथिवीत्व है वहीं गन्ध है और विषम-व्याप्ति, जैसे अग्नि और धूमकी है; क्योंकि जहाँ धूम है वहीं अग्नि है, यह ही नियम है, पर जहाँ अग्नि है वहाँ धूम भी हो, यह नियम नहीं है।

अनुमान तीन प्रकारका है--पूर्ववत्‌, शेषवत्‌ और सामान्यतोदुष्ट

पूर्ववत--जहाँ प्रत्यक्षभूत लिङ्ग-लिङ्गीमेंसे एकके देखनेसे दूसरेका अनुमान हो। जैसे धूमसे अग्निका यहाँ दोनों प्रत्यक्षके विषय हें अर्थात्‌ यहाँ अनुमेय (लिङ्गी) जो अग्नि है, वह भी रसोई आदिमें विशेषरूपसे प्रत्यक्ष हो चुका है।

शेषवत्‌- जहाँ-जहाँ प्रसङ्ग जा सकता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर शेष बचे हुएका अनुमान शेषवत्‌ है, जैसे 'शब्द किसका गुण है' इस विचारमें सारे द्रव्योंका प्रसङ्ग आता है उनमेंसे किसीका भी गुण होनेसे परिशेषसे यह आकाशका लिङ्ग (गुण) है (वैः २७) यही परिशेषानुमान शेषवत्‌ कहलाता है

` सामान्यतोदृष्ट--जो सामान्यरूपसे देखा गया हो पर विशेषरूपसे देखा गया हो वह वहाँ होता है जहाँ

लिङ्गीको पहले प्रत्यक्ष देखा हुआ हो--जैसे देखने-सुनने आदि क्रियाओंसे इन्द्रियोंका अनुमान | क्रियाका कोई साधन (करण) अवश्य होता है, जैसे छेदनेका कुल्हाड़ी इसी प्रकार देखना, सुनना आदि क्रिया हैं, उनका भी कोई करण अवश्य होना चाहिये। यहाँ जो करण हैं बही इन्द्रिय हैं। यद्यपि सामान्यरूपसे यह देखा गया है कि जो क्रिया होती है, उसका कोई करण अवश्य होता है, जैसे - (५६)

तीसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ न्याय-दर्शन

छेदने आदिमें कुल्हाड़ा, पर जैसे करणका यहाँ अनुमान करना है, अर्थात्‌ इन्द्रियरूप, वैसा करण कभी भी देखा नहीं गया, इसलिये यह अनुमान सामान्यतोदृष्ट है। इसी प्रकार जगतकी रचनासे इसको रचनेवालेका ज्ञान सामान्यतोदृष्ट है पूर्ववत्‌ वहाँ होता है, जहाँ पहले अनुमेयको भी देखा हुआ है और सामान्यतोदृष्ट वहाँ होता है, जहाँ अनुमेयको कभी देखा नहीं है। इसी अनुमानसे अतीन्द्रिय पदार्थ हैं उनका ज्ञान होता है।

उपमान-प्रमाण-- प्रसिद्ध-सादुर्यसे संज्ञा-संज्ञीके सम्बन्धका ज्ञान उपमान है, यथा--जो गवय (नीलगाय) को नहीँ जानता वह यह सुनकर कि “जैसी गौ वैसी गवय' बनमें जाय और गौ-सद्श व्यक्तिको देखे तो उसको यह ज्ञान होगा कि यह गवय है। यहाँ गवय व्यक्ति प्रत्यक्ष है, पर यह ज्ञान कि “इसका नाम गवय है' प्रत्यक्ष नहीं | यदि यह भी प्रत्यक्ष होता तो सभीको प्रतीत हो जाता यह ज्ञान अनुमानसे भी नहीं हुआ; क्योंकि संज्ञाका कोई लिङ्ग नहीं होता | शब्दसे भी नहीं हुआ; क्योंकि यह किसीने बतलाया नहीं इसलिये जिससे यह ज्ञान हुआ है वह एक अलग ही उपमान-प्रमाण है

आगम-प्रमाण--आप्तके उपदेशको इान्द-प्रमाण कहते हें अर्थके साक्षात्‌ करनेवाले और यथादृष्टका “उपदेश करनेवालेका नाम आप्त है। झाब्दप्रमाण दो प्रकारका है- दृष्ट-अर्थ और अदृष्ट-अर्थ जिस आप्त उपदेशका अर्थ यहाँ देखा जाता है, वह दुष्ट-अर्थ है; जिसका अर्थ यहाँ नहीं देखा जाता, जैसे स्वर्गादि, वह अदृष्ट-अर्थ है लौकिक वाक्य दृष्टार्थ हैं, वैदिक वाक्य प्रायः अददष्टार्थ

न्यायदर्शनमें ऐसे पदार्थांको जिनके न्यायद्वारा तत्त्व-ज्ञानसे निःश्रेयस्‌ हो सकता है, सोलहकी संख्यामें विभक्त किया गया है--

१--प्रमाण--चार हैं इनका वर्णन ऊपर कर दिया गया है।

२--प्रमेय- बारह हैं, इनका वर्णन आगे किया जायगा |

३--संशय--समान धर्मकी प्रतीतिसे, अनेकोंके धर्मकी प्रतीतिसे, विप्रतिपत्ति [परस्पर विरोधी पदार्थोके सहभाव] से, उपलब्धिकी अव्यवस्थासे और अनुपलब्धिकी अव्यवस्थासे विशेषकी आकाङ्क्षावाला विचार संशय है। संशयका साधारण लक्षण एक धर्मीमें विरुद्ध नाना धर्मोका ज्ञान समझना चाहिये

४-प्रयोजन--जिस अर्थको लक्ष्यमें रखकर किसी विषयमें प्रवृत्त होना है, वह प्रयोजन है।

५--दृष्टान्त--लौकिक और परीक्षकोंकी बुद्धकी जिस अर्थमें समता हो, वह दृष्टान्त है जैसे अग्निके आनुमानमें रसोई दुष्टान्तके विरोधसे ही परपक्ष खण्डनीय होता है और दृष्टान्तके समाधानसे ही

स्वपक्ष स्थापनीय होता है ६--सिद्धान्त--शास्त्रके आधारपर अर्थेकि मानेको व्यवस्था सिद्धान्त है सिद्धान्त चार प्रकारका है (क) सर्वतन्त्र-सिद्धान्त--जो सारे शास्त्रोंका सिद्धान्त हो, अर्थात्‌ जिसमें किसी शास्त्रका विरोध हो।

(ख) प्रतितन्त्र-सिद्धान्त--जो अपने-अपने शास्त्रका अलग-अलग सिद्धान्त हो

(ग) अधिकरण-सिद्धान्त-जिसको सिद्धि दूसरे अर्थोकी सिद्धिपर निर्भर हो।

(घ) अभ्युपगम-सिद्धान्त-वादीकी मानी हुई बातको ही मानकर उसपर विचार करना

७--अवयव---प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन--ये पाँच अवयव हैं जैसे 'घट अनित्य (५७)

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ न्याय-दर्शन

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है' यह प्रतिज्ञा है; 'उत्पत्तिवाला होनेसे' यह हेतु है; 'उत्पत्ति-धर्मवाले पट आदि द्रव्य अनित्य देखनेमें आते हे' यह उदाहरण है; 'ऐसा ही घट भी उत्पत्ति-धर्मवाला है' इसको उपनय कहते हैं; ‘इसलिये उत्पत्ति-धर्मवाला होनेसे घट अनित्य सिद्ध हुआ' इसका नाम निगमन (उपसंहार) है। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि पूर्व प्रमाणोंमें जो अनुमान कहा है, यह दो प्रकारका होता है--स्वार्थानुमान अर्थात्‌ अपने लिये अनुमान; और परार्थानुमान अर्थात्‌ दूसरेके लिये अनुमान स्वार्थानुमान-कर्ता जब उस ज्ञानको दूसरेको निश्चय कराना चाहता है, तब उसकी सिद्धिके लिये अपने मुखसे उसे जो वाक्य कहना पड़ता है, उसके ये पाँच अवयव होते हैं और वही अनुमान परार्थानुमान कहलाता है

८--तर्क--जिसका तत्त्व ज्ञात हो उसको जानना चाहते हुए उसमें कारणके सम्भवसे तत्त्वज्ञानके लिये जो युक्ति है, वह तर्क है।

९--निर्णय--संशय उठाकर पक्ष-प्रतिपक्षद्वारा अर्थका अवधारण (निश्चय) निर्णय है

१०--वाद--पक्ष और प्रतिपक्षका वह अङ्गीकार जिसमें प्रमाणोंसे और तर्कसे साधन औरं प्रतिषेध हो, जो सिद्धान्तसे विरुद्ध हो और पाँचों अवयवोंसे युक्त हो, वाद कहलाता है

११--जल्प--जो वादके विशेषणोंसे युक्त हो, किंतु जिसमें छल, जाति और निग्रहस्थानोंसे भी साधन और प्रतिषेध हो, बह जल्प हे

१२--वितण्डा--जल्प जब प्रतिपक्षस्थापनासे हो तो वितण्डा होता है।

इस प्रकार किसी अर्थके निर्णयके लिये वादी-प्रतिवादीकी जो बातचीत होती है, उसका नाम कथा है और वह तीन प्रकारकी होती है, तत्त्व-निर्णयके लिये वाद होता है, दूसरोंको परास्त करनेके लिये वा सिद्धान्तकी रक्षाके लिये जल्प होता है और जहाँ विजिगीषु (जीतनेकी इच्छावाला) छल-जाति आदिका भी प्रयोग करता है और अपने पक्ष-स्थापनसे हीन केवल दूसरेके पक्षपर प्रमाण, तर्क, छल, जाति आदिसे सब प्रकार आक्षेप करता है वह वितण्डा हे

१३-हेत्वाभास-हेत्वाभास वे हैं जो हेतु लक्षणके होनेसे हैं तो अहेतु, किंतु हेतुके समान हेतुवत्‌. भासते हैं। ये पाँच प्रकारके होते हैं-- |

(क) सव्यभिचार हेत्वाभास--जो एकमें अर्थात्‌ केवल साध्यमें ही नियत हो अर्थात्‌ अव्यवस्थामें हो जैसे किसीने कहा “शब्द' नित्य है स्पर्शवान्‌ होनेसे, स्पर्शवाला 'घट' अनित्य देखा जाता है, 'शब्द' वैसा स्पर्शवाला नहीं, इसलिये शब्द नित्य है। यहाँ दृष्टान्तमें स्पर्शत्व और अनित्यत्वरूप धर्म साध्य-साधन-भूत नहीं है; क्योंकि परमाणु स्पर्शवान्‌ है, किंतु अनित्य नहीं, नित्य है। ऐसे ही यदि कहें कि जो स्पर्शवान्‌ नहीं वह नित्य है, जैसे 'आत्मा' तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि बुद्धि स्पर्शवाली नहीं किंतु नित्य नहीं, अनित्य है। इस कारण दोनों दृष्टान्तोंमें व्यभिचार आनेसे स्पर्शत्व होना हेतु सव्यभिचार हुआ |

(ख) विरुद्ध हेत्वाभास--सिद्धान्तको अङ्गीकार करके उसीका विरोधी जो हेतु है, वह विरुद्ध हेतु है। जैसे शब्द नित्य है; क्योंकि कार्य है यह कार्य होना नित्यताका विरोधी है, कि साधक |

(ग) अकरणसम हेत्वाभास- विचारके आश्रय अनिश्चित पक्ष और प्रतिपक्षको प्रकरण कहते है

(५८)

तीसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ न्याय-दर्शन

उसकी चिन्ता संशयसे लेकर निर्णयतक जिस कारण की गयी है वही निर्णयके लिये काममें लाया जाय तो दोनों पक्षोंकी समतासे प्रकरणसे आगे नहीं बढ़ता, इसलिये प्रकरणसम हुआ जैसे किसीने कहा कि “शब्द” अनित्य है, तो नित्य धर्मका ज्ञान होनेसे यह हेतु प्रकरणसम है | इससे दो पक्षोंमें किसी एक पक्षका निर्णय नहीं हो सकता, क्योंकि यदि शब्दमें नित्यत्वधर्मका अहण होता तो प्रकरण ही नहीं बनता, अथवा अनित्यत्व धर्मका ज्ञान शब्दमें होता तो भी प्रकरण सिद्ध होता अर्थात्‌ यदि दो धर्मोमेंसे एकका भी ज्ञान होता तो “शब्द अनित्य है कि नित्य'--यह विचार ही क्यों प्रवृत्त होता

(घ) साध्यसम हेत्वाभास--स्वयं साधनीय होनेके कारण जो साध्यसे कोई विशेषता नहीं रखता वह साध्यसम है जैसे 'छाया द्रव्य है' यह साध्य है, 'गतिवाला' होनेसे यह हेतु है, क्योंकि छायाका गतिमान्‌. होना स्वयं साध्यकोटिमें है, इसलिये यह हेतु साध्यसे विशेष नहीं, इसलिये 'साध्य' के 'सम' हुआ; क्योंकि छायामें जैसे द्रव्यत्व साध्य है बैसे ही गति भी साध्य है।

(ङ) कालातीत हेत्वाभास-जिस अर्थका वर्णन समय चूककर किया गया हो उसे कालातीत कहते हैं हेतुका काल वह है जब अर्थ संदिग्ध हो; किंतु जब अर्थ किसी प्रबल प्रमाणसे निश्चित हो, तो वहाँ हेतु उसे उलटकर कुछ सिद्ध नहीं कर सकता | जैसे कोई कहे कि “अग्नि उष्ण नहीं है, क्योंकि द्रव्य है' तो यह हेतु कालातीत है; क्योंकि जब अग्निका उष्ण होना प्रत्यक्षसे निश्चित है तो यहाँ उष्ण होना सिद्ध करनेके लिये हेतुका काल ही नहीं; क्योंकि अग्निका उष्ण होना प्रत्यक्षसे बाधित है। अतएव नवीन नैयायिक कालातीतको बाधित भी कहते हैं

१४--छल--अर्थको बदल देनेसे वादीके वचनका विघात करना छल हे अर्थात्‌ वादीके कहनेका जो अभिप्राय है उससे विरुद्ध अभिप्राय लेकर उसपर आक्षेप करना छल है यह छल तीन प्रकारका है--

(क) वाक्छल-साधारणरूपसे कहे हुए आर्थमें वक्ताके अभिप्रायसे विरुद्ध अन्य अर्थकी कल्पनाको वाकूछल कहते हैं जैसे किसीने कहा कि यह बालक नवकम्बलवान्‌ हे' कहनेवालेका यहाँ आशय यह है कि इस बालकका कम्बल नया हे'; पर छलवादी वक्ताके अभिप्रायसे विरुद्ध कहता है कि 'इस लड़केके पास तो केबल एक कम्बल है नो कहाँ है'--नव शब्दके नवीन और नौ--ये दो अर्थ हैं। इस छलवादीकी रोक यह है कि नवकम्बल शब्द जो दो विशेष अर्थोका एक सामान्य शब्द है, उसमें जो तुमने एक अर्थकी कल्पना कर ली है, इसका क्या हेतु है; क्योंकि बिना निश्चय किये अर्थ-विरेषका निश्चय नहीं हो सकता है कि यह अर्थ इसको अभिप्रेत है और वह विशेष तुम्हारे अर्थमें नहीं है, इसलिये यह तुम्हारा दूषण नहीं सिद्ध होता |

(ख) सामान्य छल- जो बात बन सकती हे उसके स्थानमें अति समानताको लेकर एक बनती बातकी कल्पना सामान्य छल है जैसे किसीने कहा 'यह ब्रह्मचारी विद्याविनयसम्पन्न हे', इस वचनका खण्डन अर्थ-विकल्पसे ग्रहण तथा असम्भव अर्थकी कल्पनासे करना कि जेसे ब्रह्मचारीमें विद्याविनय-सम्पत्ति सम्भव है वैसा व्रात्य (यज्ञोपवीतके संस्कारसे हीन) में भी है तो व्रात्य भी ब्रह्मचारी है; क्योंकि वह भी विद्याविनयसम्पन्न है इसका खण्डन यह हे कि यह वाक्य प्रशंसार्थक है, इसलिये इससे असम्भव अर्थकी कल्पना नहीं हो सकती; ब्रह्मचारी सम्पत्तिका विषय हे, इसका हेतु नहीं है

(५९)

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ न्‍्याय-दर्शन

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(ग) उपचार छल--धर्मके अमुख्य प्रयोगमें मुख्य अर्थसे प्रतिषेध उपचार छल है यहाँ 'धर्म' से अभिप्राय 'वृत्ति'का है। शब्दकी वृत्ति दो प्रकारकी है--मुख्य और अमुख्य मुख्य अर्थमें मुख्य वृत्ति होती है; जैसे “गङ्गायाँ स्त्राति'--यहाँ गङ्गा शब्द मुख्य वृत्तिसे प्रवाहका बोधक है मुख्य वृत्तिको 'शक्ति' कहते हें और “गङ्गायां घोषः' यहाँ गङ्गा शब्द अमुख्य वृत्तिसे गङ्गातीरका बोधक हे वृत्तिको 'लक्षण' कहते हैं जब लक्षण वृत्तिसे प्रयोग किया गया हो और मुख्य वृत्तिको लेकर कोई निषेध करे, जैसे कहा है गङ्गामे घोष, घोष तो उसके किनारेपर है तो यह उपचार छल है अथवा जैसे किसीने कहा 'मचान चिल्ला रहे हैं।' इसका दूसरा खण्डन करता है कि मचानोंपर बैठे हुए पुरुष चिल्ला रहे हें कि मचान। मचान शब्दके मुख्य अर्थ लकडियोंसे बनी ऊँची बैठकके हैं, जो किसान खेतीकी रखवालीके लिये बना लेते हैं और उसमें शब्दकारिता असम्भव है; इसलिये अमुख्य वृत्ति (लक्षणा) से मञ्चपर बैठे पुरुष बोलते हैं यह वक्ताका अभिप्राय है वादी इसके अभिप्रायको लेकर शंका करता है कि मञ्चपर बैठे पुरुष बोलते हैं कि मञ्च | यह उपचार छल है इसका खण्डन यह है कि यहाँ मचान शब्द मुख्य नहीं, गौण है, मञ्चस्थ पुरुषोंके अर्थमें ही प्रयुक्त हुआ है ! प्रधान और गौण शब्दका प्रयोग वक्ताकी इच्छापर होता है और अर्थ उसीके अभिप्रायसे लिया जाता है

१५--जाति--साधर्म्य और वैधर्म्यसे प्रतिषेध (खण्डन) करनेको जाति कहते हैं असत्‌ उत्तर जाति है, जब कोई सच्चा उत्तर सूझे तो साधर्म्य-वैधर्म्यको लेकर ही जो समय राला जाता है वह जात्युत्तर होता हे जातिके चौबीस भेद हैं जो स्थानाभावसे यहाँ नहीं दिये जाते हैं।

१६--निग्रहस्थान(हारको जगह) -- विप्रतिपत्ति अर्थात्‌ उलटा समझना या अप्रतिपत्ति अर्थात्‌ प्रकरणके अज्ञानको निग्रहस्थान कहते हैं, अर्थात्‌ विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति करनेसे पराजय होती है। प्रतिपत्तिका अर्थ प्रवृत्ति है; विपरीत अथवा निन्दित प्रवृत्तिको विप्रतिपत्ति कहते हैं और दूसरेसे सिद्ध किये पक्षका खण्डन करना अथवा अपने पक्षपर दिये हुए दोषका समाधान करना अप्रतिपत्ति है। निग्रहस्थान बाईस प्रकारका है। स्थानाभावसे उन भेदोंका यहाँ वर्णन नहीं किया जा सकता। निग्रहस्थानका साधारण लक्षण उत्तरका स्फुरण या उल्टा स्फुरण समझ लेना चाहिये

वैश्ेषिकदर्शनके नो द्रव्योंके सदृश न्यायदर्शनके इन सोलह पदार्थोमिंसे वास्तवमें मुख्य बारह प्रमेय ही हैं, जो प्रमाणद्वारा जानने योग्य हैं अन्य सब पदार्थ प्रमेयका प्रमाणद्वारा ज्ञान करानेमें सहायक हें प्रमेय ` आत्या-जिसके पहचानके लिये इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञान और प्रयत्न लिङ्ग हें यही भोगता है

झरीर--जो चेष्टा, इन्द्रियों और अर्थोका आश्रय और भोगका स्थान है।

इन्द्रियाँ प्राण, रसना, चक्षु, त्वचा, श्रोत्र--जिनके उपादान कारण क्रमसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हें ये भोगके साधन (करण) हैं। जज 5

अर्थ--गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द--जो पाँचों इन्द्रियोंके यथाक्रम भोगनेयोग्य विषय और ) नेयोग्य विषय और पांचों भूतोंके यथायोग्य गुण हैं। EE

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तीसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ न्याय-दर्शन

बुद्धि, ज्ञान, उपलब्थि--ये तीनों पर्याय शब्द हैं अर्थौका भोगना अर्थात्‌ अनुभव करना बुद्धि है मन--जिसका लिङ्ग एकसे अधिक ज्ञानेन्द्रियोंसे एक समयमें ज्ञान होना है, जो सारी इन्द्रियोंका सहायक और सुख-दुःखादिका अनुभव करानेवाला हे प्रवृत्ति-मन, वाणी और शरीरसे कार्यका आरम्भ होना प्रवृत्ति है दोष--प्रवृत्त करना जिनका लक्षण है वे राग, द्वेष और मोह तीन दोष हैं। हे ्रेतभाव--पुनर्जन्म अर्थात्‌ सूक्ष्म शरीरका एक स्थूल शरीर छोड़कर दूसरा धारण करना प्रेत- भाव है १० फल-प्रवृत्ति और दोषसे जो अर्थ उत्पन्न हो उसे फल कहते हैं फल दो प्रकारका होता है, मुख्य और गौण मुख्य फल सुख-दुःखका अनुभव है और सुख-दुःखके साधन शरीर, इन्द्रियाँ, विषय आदि गौण फल हें यहाँ दोनों फलोंके ग्रहण करनेके लिये अर्थ कहा है राग, द्वेष और मोह जो दोष हैं, उनमेंसे मोह राग-द्वेषका कारण है और प्रवृत्ति फलकी उत्पादक है ११ दु:ख--जिसका लक्षण पीड़ा हे सुख भी दुःखके अन्तर्गत है; क्योंकि सुख बिना दुःखके नहीं रह सकता १२ अपवर्ग--दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति अर्थात्‌ ब्रह्मप्राप्ति अपवर्ग है इन दोनों दर्शनोंके अनुसार आत्मा, आकाश, काल, दिशा, मन और (वायु, अग्नि, जल और पृथिवीके) परमाणु नित्य हैं; और-डरीर, इन्द्रियाँ, चारों स्थूलभूत अर्थात्‌ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और इनसे बनी हुई सारी सृष्टि अनित्य है। नित्य द्रव्य निरवयव होना चाहिये आत्मा, आकाश, काल और दिशा विभु अर्थात्‌ व्यापक होनेके कारण और मन तथा चारों भूतोंके परमाणु जो अणु हैं, अति सूक्ष्म होनेके कारण निरवयव होनेसे नित्य हैं। इस अंशमें विभु और अणु द्रव्य समान हैं किंतु अणु परिच्छिन्न, एकदेशीय होनेसे सक्रिय होते हैं ओर विभु व्यापक होनेसे निष्क्रिय इस अंशमें अणु और विभु एक-दूसरेसे विरोधी धर्मवाले हैं पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, शरीर, इन्द्रियाँ तथा भूमण्डल आदि समस्त मूर्तिमान्‌ पदार्थ अवयववाले, सक्रिय और अनित्य हैं। इन दोनों दर्शनेनि सांख्यके सदुश परमात्मतत्त्तको आत्मतत्त्वमें सम्मिलित कर दिया है अर्थात्‌ उसका अलग वर्णन नहीं किया है इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि इन्होंने उसके अस्तित्वको अस्वीकार किया है। ईश्वरीय ज्ञान वेदको दोनों दर्शनोंने आगम (शब्द) प्रमाण माना है। इस प्रकार परमात्मतत्त्वका अलग वर्णन करनेका कारण यह है कि इन दोनों दर्शनोंने वेदान्तके समान 'हेयहेतु' अर्थात्‌ दुःखका कारण अविद्या, मिथ्या-ज्ञान या अविवेक माना है। 'हान' अर्थात्‌ दुःखका अत्यन्त अभाव स्वरूप-अवस्थिति, अपवर्ग, निःश्रेय या ब्रह्म-प्राप्ति बतलाया है, किंतु 'हानोपाय' अर्थात्‌ दुःख-निवृत्तिका साधन जहाँ वेदात्तने ब्रह्मज्ञान बतलाया है वहाँ इन दोनों दर्शनोंने जड और चेतनतत्त्वका विवेक अर्थात्‌ तत्त्वज्ञान माना है दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्गः (न्याय १।१।२) सोलह पदार्थेकि तत्त्वज्ञानसे मिथ्या ज्ञान अर्थात्‌ अविद्याका नाश होता है मिथ्या-ज्ञानके नाशसै (६१)

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तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ न्याय-दर्शन

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दोषों (राग, द्वेष, मोह) का नाश होता है। दोषोंके नाशसे प्रवृत्तिका नाश होता है परवृत्तिके नाशसै जन्मका मिलना और जन्मके मिळनेसे सब दुःखोंका अभाव होता है सब दुःखोंका अभाव ही अपवर्ग है आत्पेन्द्रियमनोऽर्थसन्निकर्षात्‌ सुखदुःखे (वैशेषिक ५। २।१५) आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थके सम्बन्धसे सुख-दुःख होते हैं ।* तदनारम्भ आत्मस्थे मनसि शरीरस्य दुःखाभावः योगः (वेशेश ५। १६) मनका आत्मामें स्थित होनेपर उसका (मनके कार्यका) जो अनारम्भ (कार्यका बंद कर देना) है, वह योग है, जो शरीरके दुःखके अभावका हेतु हे अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगाः कार्यान्तरसंयोगाश्नेत्यदृष्टकारितानि (वैशे० ५। १७) (यह जो मरनेके समय मनका पूर्वदेहसे) निकलना और (दूसरे देहमें) प्रवेश करना है तथा (जन्मसे ही) जो खाने-पीनेकी वस्तुओंके संयोग हैं तथा दूसरे शरीरका जो संयोग है, ये (सब मनुष्यके) अदृष्टसे कराये जाते हें यहाँ अदृष्ट (धर्म-अधर्म) मीमांसकोंके अपूर्व और सांख्ययोगके कर्माशयके अर्थमें प्रयोग हुआ है तदभावे संयोगाभावोऽप्रादुर्भावश्च मोक्ष: (वेरः ५।२। १८) (तत्त्वज्ञानसे) उस (अदृष्ट) का अभाव हो जानेपर (पूर्व शरीरसे) संयोगका अभाव और नयेका प्रकट होना मोक्ष है | न्यायमञ्जरीमें मुक्तिके स्वरूपका इस प्रकारका वर्णन किया गया है-- स्वरूपैकप्रतिष्ठानः परित्यक्तो$खिलेर्गुणे: ऊर्मिषद्कातिरं रूपं तदस्याहर्मनीषिणः संसारबन्धनाधीनं दुःरखङ्केशाद्यदूषितम्‌ मुक्त दशामें आत्मा अपने बिशुद्ध (ज्ञान) स्वरूपमें प्रतिष्ठित और अखिल गुणोंसे विरहित रहता हे। ऊर्मिका अर्थ केशविशेष है। भूख-प्यास प्राणके, लोभ-मोह चित्तके, शीत और तप शरीरके कशदायक होनेसे ऊर्मि कहे जाते हैं। मुक्त आत्मा इन छः ऊर्मियोंके प्रभावको पार कर लेता है और दुःख-क्लेशादि सांसारिक बन्धनोंसे विमुक्त होता है | मुक्त अवस्थामें बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, ज्ञान, प्रयल, धर्म, अधर्म तथा संस्कारका मूलोच्छेद हो जाता है। आत्माके इस शुद्ध स्वरूपको वेदान्तमें बतलाया गया है ।'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैः २।१।१) परब्रह्म सत्य ज्ञानस्वरूप ओर अनन्त है यही सांख्य और योगका कैवल्य है और चेदान्तकी शुद्ध, निर्गुण, निर्विशेष ब्रहाके स्वरूपमें अवस्थिति है। सुख, दुःख, ज्ञान, प्रयत्न, धर्म, अधर्म आदि सांख्यमें बुद्धिक धर्म बतलाये गये हैं किंतु न्याय

* ऐसा ही उपनिषदोंमें बतलाया गया है आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः (कठोपः) इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको बुद्धिमान्‌ भोक्ता कहते हैं (६२) |

तीसरा प्रकरण ] "क घड्दर्शनसमन्वय + [ न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त

KXRRATAIOTRRNAR AARRAARRRKRK RAAAARARKKN * x

(सूत्र १। १०) और वैशेषिक (सूत्र २८) में बुद्धिको आत्मामें सम्मिलित करके आत्माके हबल स्वरूपको जड पदार्थोसे भिन्न पहचान करनेके लिये उसके लिङ्ग (चिह्न) के रूपमें वर्णन किये गये हैं यह भ्रममूलक शंका नहीं होनी चाहिये कि मुक्त अवस्थामें ज्ञानके रहनेसे आत्मा एक जड पदार्थ रह जायगा; क्योंकि बुद्धिका धर्मरूप ज्ञान तो त्रिगुणात्मक जड प्रकृतिके तीनों गुणोंमें सत्त्वगुणका सात्त्विक प्रकाशरूप है; और आत्माका ज्ञान उससे अति विलक्षण चेतनरूप है; क्योंकि आत्मा स्वयं चैतन्यस्वरूप है उससे प्रकाशित होनेके कारण बुद्धिमें चेतनताकी प्रतीति होती है मुक्त अवस्थामें दुःख-सुख दोनोंका अभाव होता है, क्योंकि वास्तवमें तो दुःख-निवृत्तिका ही नाम सुख है सुखके साथ राग लगा रहता है और वह बन्धनका कारण हे | तथा-- “परिणामतापसंस्कारदुःसैर्गुणवृत्तिविरोधाञ्च दुःखमेव सर्व विवेकिनः (योः सार पाः १५) क्योंकि (विषयसुखके भोगकालमें भी) परिणामदुःख, तापदुःख ओर संस्कारदुःख बना रहता है और गुणोंके स्वभावमें भी विरोध है, इसलिये विवेकी पुरुषके लिये सब कुछ (सुख भी जो विषयजन्य है) दुःख ही हे त्रिगुणात्मक प्रकृतिके रजसमें दुःख है और सत्त्वमें सुख है इसलिये सुखके बने रहनेमें गुणातीत अवस्था नहीं रह सकती | सुख विषय और विषयभोक्ता दोनोंकी अपेक्षा रखता है इस कारण मुक्त अवस्थामें सुखके माननेसे निर्विशेष, निर्गुण, शुद्ध अट्वैतकी सिद्धि हो सकेगी | उपनिषदोंमें जहाँ ब्रह्मे साथ आनन्दका शब्द आया है वह ज्ञानके अर्थमें है। अथवा वे श्रुतियाँ शबल ब्रह्म अर्थात्‌ अपर ब्रह्मकी सूचक हैं। और वह मुक्तिकी अवस्था शबल ब्रह्मकी प्राप्ति है जो पुनरावर्तिनी है और ब्रह्मलोकतक सूक्ष्म लोकोंके आनन्दको भोगना है और जो सांख्य और योगके अनुसार सम्प्रज्ञातसमाधिका अन्तिम ध्येय है। इसलिये कैवल्यरूप और पुनरावर्तिनी रूप दो प्रकारकी मुक्ति है। जो जिसको अभिमत हो वह उसकी इच्छा करे और उसकी प्राप्तिके लिये यत्न करे | कार्यकारण प्रत्येक संहत्यकारी अर्थात्‌ किसी प्रयोजनके लिये बनी हुई वस्तु, जैसे वस्त्र कार्य कहलाता है निना कारणके कोई कार्य नहीं हो सकता | यह कारण तीन प्रकारका होता है (९) उपादान कारण--जिससे वह वस्तु बनी हो, जैसे तन्तु जिससे वह वस्त्र बना है। यहाँ तन्तु वस्त्रका उपादान कारण है (२) निमित्त कारण--तन्तुओंका संयोग-विशेष करनेवाला जुलाहा निमित्त कारण है (३) साधारण कारण--तन्तुओंका ओतप्रोतरूपमें संयोग-विशेष तथा कर्घा आदि साधारण कारण हैं

न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त

इन दोनों दर्शनोंका सिद्धान्त आरम्भिक उपादान कारण अर्थात्‌ परमाणु-वाद है इनके सिद्धान्तानुसार

सारे स्थूल पदाथेकि मूल उपादान कारण निरवयव सूक्ष्म परमाणु हैं | ऐसे दो परमाणुओंके आपसमें संयुक्त

हो जानेसे द्यणुककी उत्पत्ति होती है, जो अणु परमाणुविशिष्ट होनेसे स्वयं अतीन्द्रिय होते हैं। ऐसे तीन

दणुकोंके संयोगसे त्र्यणुक (त्रसरेणु या त्रुटि) की उत्पत्ति होती है, जो महत्परमाणुसे संयुक्त होनेसे जन्य

पदार्थोंका उत्पादक तथा इन्द्रियगोचर होता है घरके छतके छेदसे जब सूर्यकिरणें प्रवेश करती हैं, तब (६३)

तीसरा प्रकरण ] + पातञ्जलयोगप्रदीप * [ न्याय ओर वैशेषिकका सिद्धान्त

'ै है है कै है पै फै फै फैै औै और कै जैज जैज फ़ैर फुर कै जौ पैर और है फै है पै जैज फुर कै है कै जैक फैै फै जैज कै ज़ैर औौर है फौै फैर ज़र जैर फैर कै फै फै जैर है कै जे जौ फैै कै जैर कै और फै औै जे, है है जज फै है जति SR XN RHA RR RR

उनमें नाचते हुए जो छोटे-छोटे कण नेत्र-गोचर होते हैं, वे ही त्रसरेणु हैं। यथा-- जालान्तरगते भानौ यत्‌ सूक्ष्मं दृश्यते रजः तस्य षष्ठतमो भागः परमाणुः उच्यते त््यणुकका महत्त्व द्यणुकोंकी संख्याके कारण उत्पन्न हुआ माना जाता है, कि उनके अणुपरिमाणसे, चार त्रसरेणुओंके योगसे चतुरणुककी उत्पत्ति होती है, फिर स्थूल पदार्थोकी इत्यादि | इस प्रकार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और उनके सारे स्थूल पदार्थोकी उत्पत्ति होती है ये परमाणु उपादान कारण हैं और इनका विशेष रूपसे संयोग होना साधारण कारण है; और ईश्वर, जिसके ज्ञान और प्रेरणासे यह परमाणु विशेष रूपसे संयुक्त हो रहे हैं, वह और अदृष्ट (पुरुषका भोग और अपवर्ग अथवा कर्माशय) इनका निमित्त कारण है इस प्रकार न्याय और वैशेषिकने सांख्यकी प्रकृति और महत्तत््तको जडतत्त्वके वर्णन करनेकी आवश्यकता देखी जिस प्रकार सांख्यने पाँच तन्मात्राओं और अहंकारको स्थूलभूतों और इन्द्रियों आदिका प्रकृति (उपादान कारण) माना है, इसी प्रकार न्याय और वैरेषिकने परमाणुओंको स्थूलभूत, शरीर और इन्द्रियोंका उपादान कारण माना है किंतु जहाँ सांख्यने अहंकार और तन्मात्राओंको महत्तत्वकी विकृति (कार्य) माना है, वहाँ न्याय और वैरेषिकने मन और परमाणुओंको निरवयव होनेके कारण इनके अतिरिक्त इनके अन्य किसी कारण (प्रकृति) की खोज करनेकी आवश्यकता समझी जिस प्रकार सांख्य और योगने स्थूलभूत और इन्द्रियोंको केवल विकृति (विकार) माना है, वैसे ही इन दोनों दर्शनकारोंने स्थूलभूत और इन्द्रियोंको मध्यम परिमाणवाला और अनित्य माना है। सांख्यके तीनों गुणोंके परिणामके स्थानपर इन्होंने परमाणुओंका विशेष रूपसे संयोग ही साधारण (असमवायी) कारण माना है तीसरा निमित्त कारण ईश्वर, चारों दर्शनकारों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग) को समान-रूपसे अभिमत है यद्यपि उसको विशेष रूपसे वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं समझी हे--जिस प्रकार सुवर्णसे बने हुए आभूषणकी परीक्षाके समय सुवर्णकारकी परीक्षा करनी बुद्धिमत्ता नहीं हे किंतु ईश्वरके अस्तित्वको तो सभी दर्शनकारोंने माना है यथा--

"क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद्‌ घटवत्‌' जिस प्रकार कुम्हार घटका बनानेवाला है उसी प्रकार ईश्वर जगतका बनानेवाला है ईश्वरः कारणं पुरुषकर्माफल्यदर्शनात्‌' (न्यायः ४। १। १९)

मनुष्योंके कमेकि फल जिसके हाथमें हैं बही ईश्वर है। संज्ञा कर्म व्वस्मद्विशिष्टाना लिङ्गम्‌ प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्‌ संज्ञा कर्मणः ।'

(वैशेषिक १८) इन सूत्रोंकी शंकर मिश्रने इस प्रकार व्याख्या की है--

संज्ञा नाम कर्म कार्यक्षित्यादि तदुभयम्‌, अस्मह्विशिष्टानामी श्वरमहर्षीणां सत्त्वेऽपि लिङ्गम्‌। घटपटादिसंज्ञानिवेशनमपि ईश्वरसंकेताधीनमेव। य: शब्दो यत्र ईश्वरेण संकेतितः तत्र साधु: तथा .च सिद्धं संज्ञाया ईश्वरलिङ्गत्वम्‌। एवं कर्मापि लिङ्गम्‌। तथा हि क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद्‌ घटवदिति म्‌। एत्र कर्मापि ईश्वरे (६४)

तीलगाप्रकरणक्ष * घड़्दर्शनसमन्वय * [ न्याय ओर वेशेषिकका सिद्धान्त

संज्ञा अर्थात्‌ नाम और कर्म अर्थात्‌ पृथ्वी आदि कार्य ये दो चीजें हमसे बढ़कर एक विशिष्ट ईश्वर और महर्षि आदिके अस्तित्वको प्रमाणित करती हैं घट, पट आदि नामसे वे ही पदार्थ किस प्रकार समझे जाते हैं। ईश्वरके संकेतसे पृथ्वी, जल जब कार्य हैं, तब इनका कर्ता भी अवश्य होना चाहिये; वही ईश्वर हे तद्‌वचनादाम्रायस्य प्रामाण्यम्‌ | (वैः १। १। ३) में तद्‌ शब्द ईश्वरका बोधक है इन सूक्ष्म परमाणुओको अवकाश देनेवाला एक व्यापक जडतत्त्व चाहिये था उसके लिये न्याय और वैशेषिकने आकाश महान्‌ परिमाणवाला मूल प्रकृति (प्रधान) के स्थानपर माना हे आकाशसे अतिरिक्त इन दोनों दर्शनकारोंने परमाणुओंके संयोगक्रम तथा परत्व-अपरत्व दिखलानेके लिये दिशा और कालको भी महत्परिमाणवाला माना है, जिनको साँख्य और योगने बुद्धिका निर्माण किया हुआ मानकर चौबीस तत्त्वोंमें सम्मिलित नहीं किया हे सांख्य तथा योगके सदृश ये दोनों दर्शन भी आत्माको विभु और शरीर, इन्द्रिय तथा मनसे पृथक्‌ चेतन तत्त्व मानते हैं। आत्माको जड-तत्त्वसे भिन्न दिखलानेवाले चिह्न निम्न प्रकार बतलाये हैँ-- प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदु:खेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्वात्मनो- लिङ्गानि (वैशे० ३।२।४) प्राण, अपान, पलक मींचना-खोलना, जीवन, मनकी गति, एक इन्द्रियके प्रत्यक्षसे दूसरे इन्द्रियमें विकार उत्पन्न होना, सुख, दुःख, इच्छा, द्रेष ओर प्रय्न आत्माके लिङ्ग (चिह्न) हें इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्‌। (न्याय १०) इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आत्माके लिङ्ग (चिह्न, साधक) हैं। आत्मा शरीरसै भिन्न एक चेतन तत्त्व है; क्योंकि श्वासको बाहर निकालना, अंदर ले जाना, पलक झपकाना आदि क्रियाएँ उसी समयतक रहती हैं, जबतक उसका आत्मासे संयोग रहता है आत्मासे संयोग छूटनेपर मृतक शारीरमें क्रियाएँ नहीं होतीं इसलिये जहाँ ये क्रियाएँ हों, वहाँ आत्माका होना सिद्ध होता है। योग और सांख्यने बुद्धि अर्थात्‌ चित्तको पृथक्‌ तत्त्व माना है, किंतु न्याय और वैरेषिकने इसको आत्मामें ही सम्मिलित करके आत्माके शबल स्वरूपके धर्म, ज्ञान, प्रयल आदि बतलाये हैं इसलिये जहाँ सांख्य और योगने आत्माको ज्ञान अथवा चेतनस्वरूप माना है वहाँ न्याय और बैशेषिकने ज्ञान और प्रय्न आदि धर्मवाला माना है; क्योंकि ज्ञान और प्रय्न आदिको आत्माका धर्म माने बिना बैशेषिकके लक्षणानुसार (शुद्ध) आत्माका अस्तित्व इनके प्रमाण और लक्षणसे सिद्ध नहीं हो सकता था; क्योंकि उनके लक्षणानुसार द्रव्य या तो समवायीकरण हो, जैसे परमाणु स्थूल भूतोंके; या क्रियावाला हो जैसे मन तथा परमाणु; या गुणवाला हो जैसे आकाश शब्दगुणवाला है चेतन स्वरूप आत्मामे ये तीनों धर्म होनेसे वैशेषिक और न्यायके लक्षणानुसार जो केवळ भौतिक पदार्थोके वास्तविक स्वरूपको बतलाते हैं, आत्माका वास्तविक स्वरूप नहीं सिद्ध हो सकता था इसलिये इन्होंने बुद्धि (चित्त) को आत्मामें सम्मिलित करके उसके (बुद्धिके) धर्म, ज्ञान, प्रयल आदिसे आत्माके शबल स्वरूपका अस्तित्व बुद्धिके साथ सिद्ध किया | (६५

तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त

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वैशेषिक सूत्र (३।२।४) और न्याय सूत्र (१ १०) में बतलाये हुए लिङ्ग आत्माके धर्म नहीं हैं और इनका आत्माके साथ समवाय सम्बन्ध है। यह आत्माका शरीरके साथ अस्तित्व बतलानेके लिये केवल चिह्ममात्र हैं। जैसे रामके मकानको निर्देश करनेके लिये यह कहा जाय 'जिस मकाममें आमका वृक्ष है वही रामका मकान है' इन दोनों सूत्रोंमें आत्माके सगुण अर्थात्‌ शबल स्वरूपको बतलाया है जिसकी संज्ञा जीव है क्योंकि प्राण, अपान, पलक मींचना, पलक खोलना, जीवन, यह सब प्राणके धर्म हैं मनकी गति मनका धर्म है इन्द्रियोंका विकार इन्द्रियोंका धर्म हे इच्छा, द्वेष, दुःख, सुख, प्रयत्न और ज्ञान बुद्धिके धर्म हैं। ये सब तीनों गुणोंके कार्योके धर्म गुणरूप ही हैं इसी बातको गीता अध्याय के वें तथा वें इलोकोंमें बताया गया है। | नैव किञ्चित्‌ करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्‌। पद्यञ्थृण्वन्‌ स्पृशञ्जिघ्रन्नश्न्‌ गच्छन्स्वपञ्धसन प्रलपन्‌ विसृजन्‌ गृहच्चुन्मिषन्निमिषन्नपि इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌॥ ` तत्वको जाननेवाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखोंको खोलता हुआ और मींचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोमें बर्त रही हैं। इस प्रकार समझता हुआ निःसंदेह ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। आत्माका शुद्ध स्वरूप वैशेषिकके सूत्र (७। १।२२) में बताया गया है। विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा विभु धर्मवान्‌ महान्‌ है, आकाश वैसे (ज्ञानस्वरूप) आत्मा है वैशेषिकके इस सूत्रके अनुसार ही श्रुति-स्मृतियोंमें आत्माके शुद्ध ज्ञानस्वरूपको व्यापक और निष्क्रिय ही माना है। यथा--

आकाशवत्‌ सर्वगतश्च नित्यः। (छन्दोग्य» | १४1३) आकाशके समान आला व्यापक और नित्य है | नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः। गीता २।२४)

यह आत्मा नित्य व्यापक स्थाणु तथा निष्क्रिय और सनातन है। यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्सं प्रकाशयति भारत

(गीता १३। ३२-३३)

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त हुआ आकाश (भी) सूक्ष्म होनेसे लिपायमान नहीं होता है, वैसे ही सर्वत्र देहमें स्थित हुआ (भी) आत्मा गुणातीत होनेके कारण देहके गुणोंसे लिपायमान नहीं होता है।

हे अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता हे |

आत्माके शबल स्वरूपकी पिण्डरूप व्यष्टि शरीरोमें सिद्धिसे सामान्यतोदुष्ट प्रमाणद्वारा परमात्माके (६६)

तीसरा प्रकरण षड्दर्शनसमन्वय [ योगसाधनकी शिक्षा

कई कै मररन RAAKKKK NAAKKAAKKK FAAAAAARARRKRRKRARKRK कै है है है है कै है है है ज़ै जैै फ़ै जै फै है जद ैरै फै है है है है फैै कै है है है और जै जैए और कै है है है फ्ै

शबल स्वरूपको ब्रह्माण्डरूप समष्टि, जगतमें सिद्धि होती है।

लु वैशेषिक और न्यायमें योगसाधनकी शिक्षा आत्मा तथा परमात्माका अस्तित्व प्रमाण और लक्षणसे सिद्ध करनेके पश्चात्‌ इन दोनों दर्शनकारोंने

केवल आत्मा और परमात्माका, किंतु अतीन्द्रिय जड पदार्थोका भी वास्तविक स्वरूप जाननेके लिये योग-साधनाका ही सहारा बतलाया है। यथा--

आत्मन्यात्ममनसोः संयोगविरोषादात्मप्रत्यक्षम्‌। (वैशेषिक ११)

आत्मामें आत्मा और मनके संयोगविशेषसे आत्माका प्रत्यक्ष होता है अर्थात्‌ आत्मा और मनका योग-समाधिद्वारा जब संयोग प्रत्यक्ष होता है, तब उस संयोगविशेषसे आत्माका प्रत्यक्ष होता है

तथा द्रव्यान्तरेषु प्रत्यक्षम्‌ (वैशे० १२)

इसी प्रकार अन्य (सूक्ष्म अतीन्द्रिय) द्रव्योंका प्रत्यक्ष होता है

असमाहितान्तःकरण उपसंहतसमाधयस्तेषां (वैशे० ९।१। १३)

युक्त योगी जो समाधिको समाप्त कर चुके हैं उनके लिये (अतीन्द्रिय द्रव्योंका) बिना समाधिके भी प्रत्यक्ष होता है।

तत्समवायात्‌ कर्मगुणेषु (वैशे० ९४) उन (द्रव्यों) में समवेत होनेसे कर्म गुणोंमें (युक्त और युञ्जान दोनों प्रकारके योगियोंको भी प्रत्यक्ष होता है)

आत्मसमवायात्मगुणेषु (वैरे